अनुवाद का अर्थ और सिद्धान्त - Meaning and Principles of Translation

अनुवाद का अर्थ और सिद्धान्त - Meaning and Principles of Translation


जैसा कि स्पष्ट है अनुवाद शब्द वद धातु में अनु उपसर्ग लगने से बना है। वद का अर्थ है कहना और अनु अर्थ है बाद अथवा पश्चात् का। अतः अनुवाद का अर्थ हुआ कही हुई बात को फिर से कहना। भारतीय परम्परा में देखें तो 'शब्दार्थ चिंतामणि कोष' नामक पुस्तक में भी अनुवाद का यही अर्थ दिया हुआ है 'प्राप्तस्य पुनः कथते' अथवा 'ज्ञातार्थस्य प्रतिपादने यानी जो अर्थ प्राप्त हुआ या जो ज्ञात अर्थ है उसे फिर से कहना भारत में अनुवाद के कतिपय प्राचीन अर्थसन्दर्भ भी हैं, जिनके अनुसार एक ही भाषा में विषयवस्तु का जटिल से सरल रूप में अंतरण भी अनुवाद है। इस तरह भारतीय परम्परा में टीका अथवा व्याख्या के लिए भी अनुवाद पद का प्रयोग होता रहा है, किंतु आधुनिक परिप्रेक्ष्य में इसका सम्बन्ध दो भाषाओं से है और अनुवाद शब्द का प्रयोग प्रायः अंग्रेज़ी के Translation के अर्थ में किया जाता है। Translation शब्द अंग्रेज़ी में Translatum से बना है, जिसका अर्थ है एक भाषा के पार दूसरी भाषा में ले जाना अनुवाद का सामान्य और व्यापक अर्थ भाषान्तरण है। एक भाषा की सामग्री को दूसरी भाषा में प्रस्तुत करना ही अनुवाद है।


अनुवाद के लिए हिंदी में भाषान्तर शब्द का प्रयोग भी मिलता है और उर्दू वाले उसे तर्जुमा भी कहते हैं। पर इंस प्रक्रिया के लिए अनुवाद को ही अब मानक मान लिया गया है। बींसवी शताब्दी में भाषावैज्ञानिक दृष्टि से अनुवाद पर विधिवत चिंतन हुआ और विद्वानों ने इस प्रक्रिया को परिभाषित करने के प्रयास किए। ब्रिटिश विद्वान जे.सी. कैटफर्ड ने कहा कि एक भाषा की पाठ्यसामग्री का दूसरी भाषा की पाठ्यसामग्री में समतुल्य प्रतिस्थापन ही अनुवाद है (the replacement of textual material in one language by equivalent textual material in another language.)


रूसी विद्वान फाइदारोव ने एक भाषा के माध्यम में पहले से व्यक्त की गई। बात को दूसरी भाषा के माध्यम में पूर्णरूपेण और निष्ठापूर्वक व्यक्त करने को अनुवाद माना- (to translate means to express faithfully and fully with media of one language what has been already said with media of another language.) एक अन्य रूसी विद्वान बर्खुदारोव ने कहा है कि एक भाषा के कथन का दूसरी भाषा के कथन में वह रूपान्तरण ही अनुवाद है, जिसमें अर्थबोध का मूल स्वरूप बरकरार रहे - ( Translation is the transformation of an utterance in one language into utterance in another language,)


दरअसल अनुवाद एक भाषा की विषयवस्तु की दूसरी भाषा में पुनर्रचना है, जिसमें शर्त है कि मूल भाव अथवा अर्थबोध में कोई परिवर्तन नहीं होना चाहिए। इस प्रकार दो भाषाओं के बीच प्रतिस्थापन, अंतरण, पुनसृष्टि, पुनर्रचना आदि सभी शब्द अनुवाद में समाहित हैं।


अनुवाद का सामान्य सिद्धान्त एक ही है और वह यह कि अनुवाद केवल शब्दान्तरण अथवा भाषान्तरण करता है। अनुवाद की प्रक्रिया में यह सुनिश्चित होना चाहिए कि किसी भी दशा में अर्थान्तर न हो। विषयवस्तु तथा उसके अर्थबोध को अनूदित भाषा में जस का तस बनाए रखना ही अनुवाद का निर्णायक सिद्धान्त है। इस सिद्धान्त के भीतर ही एक कुशल अनुवादक के लिए कई सिद्धान्त उपस्थित हैं, जैसे कि उसे अनुवाद की जाने वाली सामग्री के विषय का पर्याप्त ज्ञान होना चाहिए, उसे दोनों भाषाओं की प्रकृति और शब्दभंडार का अच्छा ज्ञान होना चाहिए, उसकी अपनी अभिव्यक्ति में स्पष्टता अथवा सम्प्रेषणीयता होनी चाहिए और उसे अनूदित सामग्री के प्रति किसी हद तक तटस्थ भी होना चाहिए अन्यथा वह अनुवाद की प्रक्रिया में स्वयं के मनोभावों को शामिल कर देने से खुद को रोक नहीं पाएगा।


प्रायः देखने में आता है कि साहित्य से सम्बन्धित विषयवस्तु के अनुवाद में अनुवादक वर्णित देशकाल का रूपान्तरण भी करने लगता है जो सिद्धान्त के विपरीत है - अनुवाद सिर्फ भाषा से सम्बन्धित वस्तु है, उसे देशकाल और समाज पर लागू नहीं किया जाना चाहिए। पात्र स्थान आदि का नाम तथा परिस्थितियों का विवरण अनिवार्यतः वही होना चाहिए जो स्त्रोतभाषा में है। एक सार्थक अनुवाद का तात्पर्य यही है कि स्रोत भाषा में हो रहे सम्प्रेषण और अर्थबोध को लक्ष्यभाषा में जस का तस और बनाए रखा जाए। पत्रकारिता चूँकि तथ्य आधारित होती है इसलिए यहाँ इस सम्प्रेषण और अर्थबोध का महत्व और भी बढ़ जाता है। 







पत्रकारिता में सार्थक और उपयोगी अनुवाद की कुछ विशेषताओं को बिंदुवार इस तरह समझा जा सकता है - 


• सही और शुद्ध अनुवाद के लिए सामग्री की मूल भाषा तथा जिस विषय में अनुवाद होना है, उसका अच्छा ज्ञान होना आवश्यक है।


• विषय का आधारभूत ज्ञान अच्छे अनुवाद में सहायक होता है। 


• अनुवाद होने वाली विषय सामग्री को समझना अच्छे अनुवाद की अनिवार्य शर्त है। 


• मूल विषयवस्तु की भाषा तथा अनुवाद की भाषा अथवा लक्ष्य भाषा में प्रयुक्त मुहावरों, लोकोक्तियों, वाक्यांशों तथा उसमें चुके विदेशी शब्दों का ज्ञान भी आवश्यक है।


• एक पत्रकार को अनुवाद किताबी शब्दों के अनावश्यक प्रयोग से बचना चाहिए।


• यह ध्यान रखना आवश्यक है कि अनुवाद में प्रयुक्त शब्द रचना की भावना से मेल खाते हों।


• यदि अनुवाद के समय मूल रचना में प्रयुक्त किसी शब्द का सही प्रतिस्थापन्न न मिल रहा हो तो मूल रचना की भाषा (लक्ष्य भाषा) में उसके अर्थ के पर्यायवाची ढूढ़ने से सही अनुवाद मिल सकता हैं।


• विषयवस्तु की मूल भाषा, लक्ष्य भाषा तथा रचना की मूल भाषा से लक्ष्य भाषा वाले शब्द कोश व पर्यायवाची कोश अनुवादक के कार्य में सहायक होते हैं। 


• एक पत्रकार के पास अनुवाद कार्य के लिए विषय विशेष के शब्दकोशों तथा पारिभाषिक कोश का अच्छा संग्रह होना भी उपयोगी रहता है।