तीन स्तरों का नियम - Law of Three Stages , types
तीन स्तरों का नियम , प्रकार - Law of Three Stages, types
समाजशास्त्र में सामाजिक विचारधारा के अंतर्गत तीन स्तरों का नियम कॉम्ट की एक महत्वपूर्ण देन है। यह नियम कॉम्ट के समाजशास्त्र का प्रमुख आधार है। इस नियम का प्रतिपादन कॉम्ट ने 1922 में किया था। इस समय उनकी आयु मात्र 24 वर्ष की थी। इस नियम के प्रतिपादन के साथ ही कॉम्ट ने छोटी सी उम्र में ही अपने आपको सामाजिक विचारक के रूप में स्थापित कर लिया था। हालांकि इस नियम का उल्लेख सेंट साइमन के विचारों में भी मिलता है पर इसे समाजशास्त्रीय स्वरूप कॉम्ट ने प्रदान किया। कॉम्ट ने इसे समूह स्वभाव का एक प्रमुख समाजशास्त्री कारक माना है। उसके अनुसार मानव के बौद्धिक विकास के स्तर के आधार पर सामाजिक विकास का अध्ययन किया जा सकता है। कॉम्ट ने अपने तीन स्तरों के नियम की अवधारणा में यह बताया कि एक के बाद एक तीन विभिन्न स्तरों से गुजरने के बाद ही कोई भी अवधारणा या ज्ञान की शाखा वैज्ञानिक स्तर पर पहुंचती है।
यह तीन स्तर इस प्रकार हैं
तीन स्तर के प्रकार
1. धार्मिक / आध्यात्मिक या काल्पनिक स्तर (Theological Stage )
2. तात्विक या अमूर्त अवस्था (Mataphysical Stage)
3. प्रत्यक्ष या वैज्ञानिक स्तर (Positive or scientific Stage )
उपरोक्त तीनों स्तरों के आधार पर बौद्धिक विकास की व्याख्या करते हुए कॉम्ट लिखते हैं कि “सभी समाजों में सभी युगों में मानव के बौद्धिक विकास का अध्ययन करने पर उस महान आधारभूत नियम का पता चलता है। जिसके अधीन मनुष्य की बुद्धि आवश्यक रूप से होती है। जिसका ठोस प्रमाण हमारे संगठन के तत्वों और हमारे ऐतिहासिक अनुभवों में विद्यमान है।”
इसी आधार पर फ्लेचर (Flether) ने लिखा है "मानसिक तथा सामाजिक विकास की तीन अवस्थाएं सहयोग की अनुभूति, व्यक्ति तथा समाज के चिंतन और क्रिया से संबंधित होती है।”
कॉम्ट ने समाजशास्त्र की शुरूआत में ही लिखा कि सभी समाजों में अधिकांश व्यक्ति लगभग एक समान रूप से चिंतन करते हैं। अतः एक निश्चित अवधि में समाज को चिंतन की किसी विशेष अवस्था से ही संबंधित माना जा सकता है। कॉम्ट के अनुसार “हमारी प्रत्येक प्रमुख अवधारणा और ज्ञान की प्रत्येक शाखा एक के बाद एक तीन सैद्धांतिक दशाओं से होकर गुजरती है और ए तीनों सैद्धांतिक दशाएं धार्मिक, तात्विक और वैज्ञानिक हैं। अर्थात मानव मस्तिष्क का विकास प्रत्येक युग में इन्ही तीन निश्चित अवस्थाओं के अनुसार होता है। सामाजिक घटनाओं की जानकारी प्राप्त करने के लिए प्रत्येक मानव समाज का मानसिक दृष्टिकोण इन्ही तीन अवस्थाओं के अनुसार परिवर्तित होता रहता है। इसे ही अगस्त कॉम्ट ने चिंतन का त्रिस्तरीय नियम या त्रिस्तरीय अवस्था कहा है।
धार्मिक या काल्पनिक अवस्था (Theological Stage)
कॉम्ट के अनुसार चिंतन एवं बौद्धिक विकास की प्रथम अवस्था काल्पनिक अवस्था है। कॉम्ट ने लिखा है कि इस प्रथम अवस्था में सृष्टि की अनिवार्य प्रकृति की समस्त घटनाओं के आदी और अंतिम कारणों अर्थात उत्पत्ति और उद्देश्य की संपूर्ण ज्ञान की खोज करने में जिसमें मनुष्य यह मान लेता है, की समस्त घटनाचक्र अलौकिक प्राणियों की तात्कालिक क्रियाओं का परिणाम है।"
इस अवस्था में घटना की व्याख्या धार्मिक आधार पर की जाती है। इस अवस्था में मानव यह सोचता है कि संसार में घटित होने वाली घटना के पीछे शक्तियों का हाथ है न कि संसार के व्यक्तियों, प्राणियों एवं वस्तुओं का मानवीय चिंतन के स्तर पर अर्थात प्रथम अवस्था में मनुष्य प्राकृतिक या सामाजिक संसार में जो कुछ भी घटित होता है। उसका कारण संसार की वस्तुओं या प्राणियों में न मानकर किसी परालौकिक शक्तियों में मानता है।
वह प्रत्येक घटना के पीछे किसी न किसी अलौकिक शक्ति की कल्पना करता है। उसे किसी अलौकिक शक्ति की क्रिया का परिणाम मानता है। उसे लगता है कि सम्पूर्ण प्रकृति में कोई बाहरी शक्ति निवास करती है। जिससे सारा संसार संचालित हो रहा है। वर्षा तूफान सर्दी-गर्मी, दिन-रात का होना, नदियों का बहना, बिजली का चमकना, बादल का गरजना, पेड़ पौधों को उगते एवं फलते-फूलते देखना आदि, अलौकिक शक्ति का ही परिणाम मानता है। ऐसी शक्ति जो घटनाओं को नियंत्रित एवं निर्देशित करती है। इस अवस्था में व्यक्ति के विवेक या विचारों का कोई स्थान नहीं रहता।
कल्पना के आधार पर ही इन्हें देवी-देवता, ईश्वर की क्रिया का प्रभाव और परिणाम मानता है।
कॉम्ट ने इस अवस्था को तीन उप भागों में बांटा है।
1. जीव सत्तावाद या प्रेतवाद (Fetichism)
2. बहु देवत्व वाद (Polytheism)
3. एकेश्वरवाद या अद्वैतवाद (Monotheism)
जीव सत्तावाद या प्रेतवाद (Fetichism )
आज हम संसार की सभी वस्तुओं को दो भागों में विभाजीत करते हैं चेतन और अचेतन। हर अवस्था में मानव मानता है कि कोई भी वस्तु जड़ नहीं होती। इस अवस्था में मनुष्य संसार के प्रत्येक पदार्थ में जीवन की कल्पना करता है। इस आधार पर वह मानता है कि पत्थर, पेड़-पौधे, नदी, तालाब, बादल, चाँद तारे, सूर्य, नक्षत्र सभी में जीवन व्याप्त है। किसी को भी निर्जीव नहीं माना। सामाजिक विकास की आरंभिक अवस्था में सभी वस्तुओं को चेतन माना जाता था। इसका अर्थ यह हुआ कि संसार में जितनी भी वस्तुएं हैं, उन सभी में जीवन है। यही कारण है कि आदिम समाजों में धर्म की उत्पत्ति के संबंध में माना" सिद्धांत का महत्व अधिक है। मानावाद का अर्थ यह है कि प्रत्येक वस्तु में जीवन है। जीवन में शक्ति का होना नितांत आवश्यक है।
इस आधार पर यह माना जाता है कि संसार में जितने पदार्थ है उतनी ही शक्ति है। इस स्तर पर यह माना जाता था कि किसी भी वस्तु के नष्ट हो जाने पर उसमें प्रेतात्मा की बात स्वीकार की जाती थी। प्रेत प्रत्येक वस्तु में निवास करते थे। इस अवस्था में जादू-टोने पर अधिक विश्वास किया जाता है। जनजातियां भी प्रत्येक वस्तु में आत्मा या अलौकिक शक्ति के निवास को मानती हैं जो प्रत्यक्ष रुप से दिखाई नहीं देती। जिसे वे प्रेतआत्मा भी कहते हैं इसलिए इसे प्रेतवाद कहा जाता है।
बहुदेववाद (Polytheism)
अनेक शताब्दियों तक मानव का चिंतन प्रेतवाद के दायरे में ही रहा। विकास की प्रक्रिया में जब मानव के चिंतन का विकास हुआ तब भी उसने अपने को प्रेतों से घिरा हुआ पाया और इन शक्तियों से घबरा सा गया तथा वह इनसे छुटकारा पाने के उपाय ढुंढने लगा। उस समय प्रेतवाद में जितनी वस्तुएं व पदार्थ होते थे, उतनी ही शक्तियां मानी जाती थी और जादु-टोने से संबंधित अनेक क्रियाओं में विश्वास व्यक्त किया जाता था। प्रेतवाद की इस अवस्था में मानव मस्तिष्क अधिक चिंतनशील और विकसित हो गया और धीरे-धीरे समाज में इस तरह की धारणा विकसित होने लगी कि एक ही प्रकार के या संबंधित पदार्थों में एक विशिष्ट देवी देवता का निवास होता है।
इस कारण जीवन के विभिन्न पक्षों से जुड़े हुए पदार्थों में एक विशिष्ट देवी देवता के प्रति विश्वास पनपने लगता है। धार्मिक चिंतन की इस अवस्था को कॉम्ट ने बहुदैवत्ववाद कहा है। इसे प्रेतवाद की विकसित अवस्था कहा जाता है। इस चरण को कॉम्ट ने बृहद साम्राज्यों का काल भी कहा है।
एकेश्वरवाद या अद्वैतवाद (Monotheism )
धार्मिक व काल्पनिक स्तर की यह अंतिम कड़ी है। इस स्तर पर मानव मस्तिष्क एवं चिंतन पर्याप्त रूप से विकसित हो गया। प्रेतवाद या बहुदेववाद में जो अलग-अलग देवी देवताओं की कल्पना की गई थी। वह तार्किक नहीं थी और मनुष्यों में भ्रम व उलझन की स्थिति उत्पन्न हो गई थी। इससे बचने के लिए एक सार्वभौमिक एवं सर्वत्र शक्ति में विश्वास किया जाने लगा। मानव ने सोचा कि संसार की प्रत्येक घटना का संचालन एक ही ईश्वर के द्वारा हो रहा है। सभी जड़ एवं चेतन उसी के द्वारा उत्पन्न है। संसार की व्यवस्था उसी के द्वारा संचालित है। इसी आधार पर एकेश्वरवाद का जन्म हुआ। इससे मानव चिंतन सूक्ष्म गहन और गंभीर हो गया। यहां मानव का ध्यान वस्तु से हटकर सर्वशक्तिमान देवता पर केंद्रित हो गया और माना गया की ईश्वर एक है। वही संपूर्ण संसार का रचयिता एवं सहायक है। संहारक है। यह विश्वास ही एकेश्वरवाद या अद्वैतवाद के नाम से जाना जाता है। इसमें समस्त चराचर एवं घटनाओं को ईश्वर की रचना माना गया है। कॉम्ट ने धर्मकाल के तीसरे चरण को एकेश्वरवादी कहा है। यह काल उनके अनुसार ईसाई धर्म के आविर्भाव का काल था।
यह काल सार्वभौमिक सर्वशक्तिमान ईश्वर की कल्पना का काल था। इस काल को कॉम्ट ने रोमन काल अथवा रोमनों का काल कहा है।
दार्शनिक तात्विक या अमूर्त अवस्था (Mataphysical)
यह धार्मिक अवस्था एवं वैज्ञानिक अवस्था के बीच की स्थिति है। इसे कॉम्ट ने प्रथम स्तर का संशोधित रूप माना है। आध्यात्मिक अवस्था के पूर्व विकसित होने पर मानव तर्क शक्ति का विकास प्रारंभ हो गया था और उसके मन में अनेक प्रश्न उत्पन्न होने लगे थे। जैसे ईश्वर कौन है? उसका स्वरूप क्या है? कहां है? जब मनुष्य के मन में ऐसे प्रश्न उत्पन्न होते हैं तो वह उसका समाधान ढूंढने के लिए चिंतन एवं मनन करने लगता है। इसके बाद उसे विश्वास होने लगता है। ईश्वर निराकार अमूर्त एवं अदृश्य है, जिसे देखा नहीं जा सकता, उस पर विश्वास ही किया जा सकता है। इस अवस्था में मस्तिष्क के विकास के साथ-साथ मनुष्य की तर्कशक्ति बढ़ती गई और इस अवस्था में मनुष्य यह सोचने लगा कि प्रत्येक घटना के पीछे ईश्वर प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित नहीं होता। वरन् अमूर्त स्वरूप में सभी जगह विद्यमान होता है। मनुष्य संसार में जो भी कुछ घटित होता है, उसकी व्याख्या ईश्वर के आधार पर नहीं वरन् अदृश्य निराकार या अमूर्त शक्तियों के आधार पर करता है।
अमूर्त और निराकार शक्ति के आधार पर जो कुछ भी हो रहा है, वह शाश्वत और स्वंय में पूर्ण है। प्रथम और दूसरी अवस्था में अंतर केवल यह है कि प्रथम अवस्था में ईश्वर की कल्पना मूर्त के रूप में की जाती है। जबकि दूसरी अवस्था में ईश्वर को अमूर्त व अज्ञेय माना गया है। जो सभी वस्तुओं मे उपस्थित होता है। इस अदृश्य अमूर्त शक्ति एवं सत्ता में विश्वास करना एवं उसे संसार का आधार मानना ही दार्शनिक व अमूर्त अवस्था है। कॉम्ट के अनुसार “यह अवस्था प्रथम अवस्था का संशोधन मात्र है क्योंकि मानव मस्तिष्क यह मान लेता है कि आलोकिक प्राणियों के स्थान पर अमूर्त शक्तियां सभी जीवो में अंतर्निहित होती हैं और यह सभी प्रकार के घटना चक्र को उत्पन्न करने में समर्थ है।”
इस अवस्था में अलौकिक शक्ति का स्थान अदृश्य शक्ति ले लेती है। धार्मिक अवस्था दार्शनिक अवस्था में परिवर्तित होने लगती है। माना जाने लगता है कि अमूर्त एवं निराकार शक्ति के आधार पर जो कुछ भी हो रहा है। वह शाश्वत एवं स्वयं में पूर्ण है। इस अवस्था का विवेचन करते हुए जॉन स्टुअर्ट मिल ने लिखा है “इस अवस्था में कोई ऐसा देवता नहीं रहता है जो प्रकृति के विभिन्न अंगों को उत्पन्न एवं संचालित करता हो बल्कि वह एक सत्ता होती है या एक शक्ति अथवा एक रहस्यपूर्ण गुण जिसकी वास्तविक स्थितियां मानी जाती हैं एवं यह साकार वस्तुओं में विद्यमान होते हुए भी उससे पृथक है।" इस अवस्था में ईश्वर को अमूर्त माना गया है। जो सभी वस्तुओं में उपस्थित रहता है।
इस स्तर में कोई ऐसा ईश्वर नहीं रहता जो विभिन्न प्राकृतिक अंगो को उत्पन्न एवं निर्देशित करता है। अपितु यह एक शक्ति है। एक सत्ता अथवा एक रहस्यपूर्ण गुण, जिसकी वास्तविक स्थितियां मानी जाती है। जो साकार वस्तुओं में विद्यमान होकर भी उनसे पृथक है। इस स्तर में मानव मस्तिष्क में भावना की प्रधानता होती है। विवेक की नहीं, दूसरे शब्दों में इस अवस्था में अलौकिक और दैवीय शक्तियों का स्थान अमूर्त सत्ता ग्रहण कर लेती है। प्रथम और दूसरी अवस्था में अंतर केवल यह है कि प्रथम अवस्था में ईश्वर की कल्पना मूर्त रूप में की जाती। जबकि दूसरी अवस्था में ईश्वर को अमूर्त व अज्ञेय माना गया है। जो सभी वस्तुओ में उपस्थित होता है। इस स्तर का सामाजिक संगठन प्रथम स्तर के सामाजिक संगठन की तुलना में प्रगतिशील होता है।
इस स्तर पर ईश्वर की व्यक्तिगत शक्ति की धारणा का लोप हो जाता है। ईश्वर का चिंतन व्यक्ति के रूप मे न होकर एक अमूर्त शक्ति के रूप में होता है। जो कुछ भी संसार में हो रहा है। वह एक व्यक्ति के रूप में ईश्वर के कारण नहीं बल्कि एक अदृश्य या निराकार शक्ति के कारण हो रहा है। इस शक्ति का अस्तित्व है पर इसका संबंध किसी शरीर विशेष या व्यक्ति विशेष से नहीं है। उस अमूर्त निराकार शक्ति के आधार पर जो कुछ भी हो रहा है, वह शाश्वत है, और स्वंयपूर्ण है। इस स्तर की कोई विशिष्ट विशेषता उल्लेखनीय नहीं है क्योंकि यह स्तर धार्मिक और प्रत्यक्षात्मक स्तर के बीच का है।
प्रत्यक्षवादी या वैज्ञानिक अवस्था (Positive or Scientific Stage)
मानव चिंतन के विकास का यह तीसरा एवं वैज्ञानिक स्तर है। इस अवस्था में मानव मस्तिष्क धार्मिक एवं काल्पनिक विचारों को छोड़कर घटनाओं की व्याख्या तर्क एवं वैज्ञानिक आधार पर करने लगता है। यहां मानव पूरी सृष्टि को बौद्धिक दृष्टि से दिखने लगता है। मानव घटनाओं के विवेचन में कल्पना एवं भावना के स्थान पर निरीक्षण एवं परीक्षण को महत्व देने लगता है अर्थात समाज वैज्ञानिक अवस्था व प्रत्यक्षवाद के स्तर पर आ जाता है। तात्विक विचार शाश्वत या स्वंयपूर्ण हो सकता है पर वास्तविक तर्को तथा तथ्यों पर आधारित नहीं हो सकता। जब व्यक्ति तात्विक विचारों को छोड़कर निरीक्षण और तर्कों के आधार पर इस संसार की घटनाओं को समझने और परिभाषित करने लगता है। तभी उसका वैज्ञानिक और प्रत्यक्षात्मक स्तर में प्रवेश होता है। कॉम्ट का कथन है कि तर्क और निरीक्षण संयुक्त रूप से वास्तविक ज्ञान का आधार है। जब हम किसी घटना की व्याख्या करते है तो कुछ सामान्य तथ्यों और कुछ उस घटना विशेष के बीच के संबंधों को ढुंढने का प्रयास करते हैं। यह अन्वेषण निरीक्षण के द्वारा ही यथार्थ हो सकता है। निरीक्षण ही प्रमाण है क्योकि वह वास्तविक है न की काल्पनिका मानव कार्य-कारण संबंधों के आधार पर तथ्यों और घटनाओं का निरीक्षण, परीक्षण व वर्गीकरण करके घटनाओं को प्रभावित एवं संचालित करने वाले सामान्य नियमों की खोज करता है और ज्ञान का संग्रह ही उसका उद्देश्य हो जाता है। कॉम्ट के अनुसार विश्व के विभिन्न तथ्यों घटनाओं आदि को समझने का वास्तविक तथा निर्भर योग्य साधन निरीक्षण, परीक्षण और वर्गीकरण है। प्रत्यक्षात्मक स्तर पर मनुष्य इसलिए न तो काल्पनिक किला बनाता है और न ही तात्विक दृष्टि से संसार विभिन्न तत्वों को देखने का प्रयास करता है। इस स्तर पर ज्ञान का संग्रह ही एक मात्र साध्य या अंतिम उद्देश्य है। कॉम्ट के अनुसार “अंतिम प्रत्यक्षात्मक अवस्था में मानव का मस्तिष्क निरपेक्ष धारणाओं विश्व की उत्पत्ति एवं लक्ष्य तथा घटनाओं के कारणों की व्यर्थ खोज को त्याग कर देता है
तथा उसके नियमों अर्थात अनुक्रम तथा समरूपता के स्थिर संबंधों के अध्ययन में लग जाता है।” चिंतन की इस अवस्था में
निरीक्षण एवं परीक्षण को ही केवल सत्य का आधार माना जाता है। जिन तथ्यों का स्पष्टीकरण अवलोकन के आधार पर नहीं होता है, उन्हें अस्वीकार कर दिया जाता है। अगस्त कॉम्ट स्वयं लिखते हैं कि “जिस समय मानवीय बुद्धि विश्व के समस्त घटनाक्रम को नियमित और निर्देशित करने वाले किसी अकेले नियम को खोज लेती है। उस समय वैज्ञानिक अवस्था अपने विकास के चरम छोर पर होती है।"
कॉम्ट का कहना है कि एक परिपक्व एवं वयस्क मस्तिष्क हमेशा उन्ही तथ्यों पर विश्वास करता है। जिसमें की निरीक्षण, परीक्षण और तर्क की विशेषताएं सम्मिलित हो । मानव चिंतन के इस वैज्ञानिक स्तर में निरीक्षण, परीक्षण और तर्क के महत्व को स्पष्ट करते हुए कॉम्ट कहते हैं कि तर्क एवं निरीक्षण का अपेक्षित सम्मेलन ही इस ज्ञान का साधन है। निष्कर्ष के रूप में हम कह सकते हैं कि वस्तुएं जिस रूप में हैं उसी रूप में अवलोकन करना प्रत्यक्षवाद या वैज्ञानिक चिंतन का मूल आधार है।
इस स्तर का सामाजिक संगठन प्रथम दो स्तरों की तुलना में अलग होता है। भिन्न होता है। उन्नत किस्म का होता है। सामाजिक पुनर्निर्माण वास्तव में इसी अवस्था से प्रारंभ होता है। थियोडोर एबल के अनुसार कॉम्ट के सामाजिक गत्यात्मक का प्रमुख आधार मानव विकास का तीन स्तरों का नियम ही है। यद्यपि यह नियम ऐतिहासिक अधिक है और सामाजिक कम तथा साथ ही मानवीय जीवन के सामाजिक पहलुओं की अपेक्षा बौद्धिक पहलुओं को अधिक महत्व देता है। फिर भी समाजशास्त्रीय सिद्धांत के विकास में इस नियम का महत्त्वपूर्ण स्थान है। वास्तव में कॉम्ट धार्मिक, तात्विक व वैज्ञानिक शब्दों का प्रयोग दार्शनिक व्यवस्थाओं के रूप में न करके समाज के सदस्यों के विचारों एवं विश्वासों के रूप में करते हैं। ए विचार और विश्वास समूह द्वारा मान्य होते है। इसलिए सामाजिक जीवन को प्रभावित करते हैं।
समाजशास्त्री अगस्त कॉम्ट ने विकास के इन तीनों स्तरों की व्याख्या अपनी पुस्तक 'पॉजिटिव फिलॉसफी' में विस्तृत रूप से की है। इनके अनुसार, हमारे ज्ञान की तीनों शाखाएं सतत रूप से तीन विभिन्न सैद्धांतिक अवस्थाओं धार्मिक या काल्पनिक अवस्था तांत्रिक या अमूर्त अवस्था और प्रत्यक्षवादी या वैज्ञानिक अवस्था है। कॉम्ट के अनुसार उक्त तीनों अवस्थाओं का सिद्धांत व्यक्ति समाज बौद्धिक एवं सामाजिक जीवन पर लागू होता है। सभी समाज इन तीनों स्तरों से गुजरते हैं। विज्ञान की विभिन्न शाखाओं का विकास भी इसी स्तर से हुआ है।
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