परिकल्पना की परिभाषा एवं विशेषताएँ - Definition and Characteristics of Hypothesis

परिकल्पना की परिभाषा एवं विशेषताएँ - Definition and Characteristics of Hypothesis


अत्यंत सरल अर्थ में, परिकल्पना या उपकल्पना किसी प्रघटना के बारे में एक परीक्षण योग्य, अनुमान या अटकल या एक सुझावात्मक स्पष्टीकरण होता है। यह अनुमान या स्पष्टीकरण यह दर्शाता है कि इस प्रघटना के क्या कारण हो सकते हैं। विभिन्न विद्वानों ने परिकल्पना को अपने-अपने नज़रिए से परिभाषित किया है-


डोब्रिनर के विचारों में "परिकल्पना ऐसे अनुमान हैं जो यह बताते हैं कि विविध तत्व किस तरह अंतसम्बंधित हैं।"


गुड़े तथा हॉट के शब्दों में "परिकल्पना एक ऐसी प्रस्थापना है जिसकी प्रमाणिकता को साबित करने के लिए उसकी परीक्षा की जा सकती है।"


वेबस्टरकोश के अनुसार, "परिकल्पना या उपकल्पना एक काम चलाऊ अनुमान है, जिसकी रचना इसके तार्किक अथवा अनुभवपरक परिणामों को निकालने पर परीक्षण करने के लिए की जाती है।" 


लुंडबर्ग के अनुसार, "परिकल्पना एक काल्पनिक सामान्यीकरण है जिसकी प्रमाणिकता की जांच करना अभी शेष है। प्रारंभिक स्तर पर एक परिकल्पना प्रतिभा, अनुमान, काल्पनिक विचार या सहज ज्ञान हो सकता है जो क्रिया या शोध का आधार बन सकता है।" 


बोगार्डस ने लिखा है कि "प्राक्कल्पना परीक्षण की जाने वाली एक प्रस्तावना है।"


मन्न के अनुसार, "प्राक्कल्पना एक अस्थाई अनुमान है।"


बैली के शब्दों में. "प्राकल्पना एक ऐसी प्रस्थापना है जिसे परीक्षण के रूप में रखा जाता है और जो दो अथवा अधिक पक्षों के विशेष संबंधों के विषय में भविष्यवाणी करती है।"


गिनर के शब्दों में, "एक परिकल्पना घटनाओं के बीच कारणात्मक या अंतसंबंधों के विषय में एक अनुमान है। यह एक ऐसा अस्थाई कथन है जिसकी प्रमाणिकता या मिथ्या प्रमाणिकता कुछ साबित नहीं किया जा सकता है।"


पी.वी. यंग के अनुसार, "एक अस्थाई लेकिन केंद्रीय महत्व का विचार जो उपयोगी अनुसंधान का आधार बन जाता है, उसे हमें एक कार्यकारी परिकल्पना कहते हैं।"


थियोडोरसन के अनुसार, "कुछ तथ्यों के बीच संबंध में दावे के साथ किया हुआ एक प्रयोगार्थ कथन है।"


कैरलिंगर ने इसकी व्याख्या इस प्रकार की है, "प्राक्कल्पना अनुमान से कहा गया कथन है जो कि दो या दो से अधिक चरों के बीच संबंधों को बताता है।"


ब्लैक और चैंपियन इसे इस प्रकार कहा है "किसी वस्तु के विषय में प्रयोगार्थी कथन जिसकी वैधता आमतौर पर अज्ञात हो।"


उपर्युक्त परिभाषाएं स्पष्ट करती हैं कि परिकल्पना किसी विषय से संबंधित एक सामान्य अनुमान अथवा विचार है जिसके संदर्भ में ही संपूर्ण अध्ययन किया जाता है। प्रारंभिक स्तर पर एक परिकल्पना अनुसंधान का कार्य मार्ग निर्देशन करती है, अध्ययन के बीच में यह अध्ययनकर्ता को इधर-उधर भटकने से रोकती है तथा अध्ययन के अंत में यह उपयोगी निष्कर्ष प्रस्तुत करने तथा पूर्व निष्कर्षों का सत्यापन करने में सहायता देती है। अध्ययन के द्वारा एकत्रित तथ्यों के आधार पर यदि कोई परिकल्पना सत्य प्रमाणित होती है तो उसे एक सिद्धांत के रूप में स्वीकार कर लिया जाता है और यदि वह सत्य प्रमाणित नहीं होती तो उसे अस्वीकार कर दिया जाता है। इसी आधार पर परिकल्पना को अक्सर कार्यकारी परिकल्पना भी कहा जाता है।


सामाजिक और बौद्धिक जीवन में प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी परिकल्पना को लेकर अपना कार्य करता है, यद्यपि ऐसी परिकल्पना सदैव वैज्ञानिक नहीं होती। वैज्ञानिक प्रयोग के लिए भी परिकल्पना में कुछ विशेषताओं का होना आवश्यक है। गुड़े तथा हॉट ने उपयोगी परिकल्पना की निम्न पांच विशेषताओं का उल्लेख किया है :


(1) स्पष्टता : परिकल्पना का अवधारणात्मक रूप से बिल्कुल स्पष्ट होना आवश्यक है। एक अध्ययनकर्ता अपने अध्ययन के लिए जिस परिकल्पना का निर्माण करता है, उसकी भाषा और अर्थ इतना स्पष्ट और निश्चित होना चाहिए जिससे उसकी मनमाने अर्थों में विवेचना ना की जा सके। गुडे तथा हॉट का विचार है कि परिकल्पना को स्पष्ट बनाने के लिए इसमें दो विशेषताओं का समावेश होना आवश्यक है- प्रथम यह कि परिकल्पना में प्रयुक्त किए गए शब्दों को स्पष्ट रूप से परिभाषित होना चाहिए तथा दूसरी विशेषता यह है कि अवधारणा को परिभाषित करते समय ऐसी भाषा का प्रयोग किया जाना चाहिए जिससे सभी लोग उसे समान अर्थ में समझ सके।


(2) अनुभवसिद्धता: परिकल्पना में अनुभवसिद्ध प्रमाणिकता का होना अत्यधिक आवश्यक है। इसका तात्पर्य यह है कि परिकल्पना का निर्माण करते समय अनुसंधानकर्ता को यह ध्यान रखना चाहिए कि परिकल्पना किसी आदर्श को प्रस्तुत करने वाली ना हो बल्कि उसके द्वारा किसी विचार अथवा अवधारणा की सत्यता की परीक्षा की जा सके। गुड़े तथा हॉट में लिखा है कि ऐसी परिकल्पनाएं आदर्शात्मक होती हैं कि "सभी पूंजीपति श्रमिकों का शोषण करते हैं" अथवा "सभी अधिकारी भ्रष्ट होते हैं।

" ऐसी परिकल्पनाएं प्रयोग सिद्ध अथवा अनुभव सिद्ध नहीं होती और इसलिए इन्हें वैज्ञानिक परिकल्पना नहीं कहा जा सकता है। इस दृष्टिकोण से यह ध्यान रखना आवश्यक है कि वैज्ञानिक अवधारणा केवल वे होती हैं जिसमें अंतिम रूप से अनुभवसिद्धता का समावेश होता है।


(3) विशिष्टता: परिकल्पना सामान्य ना होकर विशिष्ट होनी चाहिए। यदि अध्ययन विषय के सभी पक्षों को लेकर एक सामान्य परिकल्पना का निर्माण कर लिया जाता है तो अध्ययनकर्ता एक समय में ही विषय के सभी पक्षों का यथार्थ अध्ययन नहीं कर सकता। इस दृष्टिकोण से परिकल्पना का निर्माण करते समय यह ध्यान रखना आवश्यक है कि परिकल्पना अध्ययन विषय के किसी विशेष पक्ष से ही संबंधित हो। केवल इसी प्रकार अध्ययन करना अपना ध्यान विषय के एक विशेष पक्ष पर केंद्रित करके वास्तविक सूचनाएं प्राप्त कर सकता है।


(4) उपलब्ध प्रवृत्तियों से सम्बद्ध परिकल्पना का निर्माण करते समय यह ध्यान रखना भी आवश्यक है कि परिकल्पना ऐसी होनी चाहिए जिसका उपलब्ध प्रविधियों द्वारा परीक्षण किया जा सके।

इस संदर्भ में गुडे और हॉट ने लिखा है कि "एक सिद्धांत बनाने वाला जो यह नहीं जानता कि उसकी परिकल्पना की जांच करने के लिए कौन सी प्रविधियां उपलब्ध हैं. उपयोगी प्रश्नों के निर्माण में असफल ही रह जाता है।" वास्तविकता यह है कि यह प्रश्न प्रत्येक स्थिति में उपयुक्त नहीं है। सामाजिक घटनाओं की प्रकृति इतनी जटिल और परिवर्तनशील है कि कभी-कभी उपलब्ध प्रविधियों के अनुरूप परिकल्पनाओं का निर्माण करना असंभव नहीं होता। ऐसी स्थिति में यदि अनुसंधानकर्ता अपनी परिकल्पना की सत्यता की जांच करने के लिए नई प्रविधियों को भी विकसित कर सके तो इसमें कोई हानि नहीं होती। सच तो यह है कि अक्सर अनेक परिकल्पनाएं नई अध्ययन प्रविधियों के विकास में भी सहायक होती हैं।


(5) सिद्धांतों से संबंधित: परिकल्पना का निर्माण करते समय यह ध्यान रखना आवश्यक है

कि वह पहले प्रस्तुत किए गए किसी सिद्धांत अथवा सिद्धांतों से संबंधित हो। यदि कोई परिकल्पना सिद्धांत से संबंधित नहीं होती तो उसकी सत्यता की परीक्षा करना असल में बहुत कठिन हो जाता है। यही कारण है कि परिकल्पना का निर्माण करने से पहले अध्ययन विषय से संबंधित साहित्य और ज्ञान को समझना आवश्यक होता है। पूर्व स्थापित सिद्धांतों के संदर्भ में बनाई गई परिकल्पना अधिक क्रमबद्ध होती है। यदि सभी अध्ययनकर्ता स्वतंत्र रूप से परिकल्पनाओं का निर्माण करने लगे तो इनके आधार पर विकसित ज्ञान की प्रकृति कठिनता से ही वैज्ञानिक हो सकती है। इस संबंध में गुडे और हॉट का विचार है कि "जब अनुसंधान व्यवस्थित रूप से पूर्व स्थापित सिद्धांतों पर आधारित होता है तो ज्ञान में यथार्थ योगदान की संभावना अधिक हो जाती है।"