वैदिक काल की शिक्षा की विशेषताएं - Features of Vedic Period Education

वैदिक काल की शिक्षा की विशेषताएं - Features of Vedic Period Education

 वैदिक कालीन शिक्षा व्यवस्था की निम्नलिखित विशेषताएं थी


• वैदिक काल में शिक्षा लक्ष्य छात्रों की शारीरिक मानसिक तथा आध्यात्मिक शक्तियों का विकास इस तरह से करना था जिससे मोक्ष प्राप्त हो सके। वैदिक शिक्षा में छात्रों के सर्वांगीण विकास पर बल दिया जाता था। उन्हें नैतिक, चरित्र, पवित्रता, धर्मिकता, व्यक्तित्व, सामाजिक कुशलता संस्कृति के संरक्षण जीविकोपार्जन की शिक्षा दी जाती थी।


• वैदिक काल में उपनयन संस्कार के साथ शिक्षा प्रारंभ की जाती थी जिसका अर्थ होता था बालक को शिक्षा के लिए अध्यापक के पास ले जाना। इस अवसर पर ब्राह्मणों को गायत्री मंत्र क्षत्रियों को त्रिष्टुप मंत्र तथा वैश्यों को जगती मंत्र का पाठ कराया जाता था। उपनयन संस्कार के पश्चात् ही उसे ब्रह्मचर्य आश्रम में प्रवेश मिलता था और वह ब्रह्मचारी कहलाता था। इसे बालक का दूसरा जन्म माना जाता था

जिसके बाद उसका आध्यात्मिक जीवन प्रारंभ होता था। उपनयन गम्भीर संयमित व अनुशासित जीवन व्यतीत करने का संकल्प होता था। उपनयन संस्कार न कराने वाले बालकों का सामाजिक बहिष्कार किया जाता था इससे मालूम पड़ता है कि वैदिक युग में शिक्षा का कितना महत्व था।


• इस काल में बालक की प्रथम अनौपचारिक शिक्षा घर पर होती थी. इसके बाद की शिक्षा गुरुकुल अथवा आश्रम में होती थी बालक को आश्रम में ही रहकर पढ़ना पड़ता था वहाँ उनके खान-पान रहने कपड़े आदि की व्यवस्था होती थी ये आश्रम नगर से दूर एकान्त में होते थे। गुरु पत्नी माता की तरह शिष्यों की देखभाल करती थी इस काल में मिथिला, काशी, काँची, कैकप उज्जैन, प्रयाग तन्जौर,मालखंड आदि नगर शिक्षा के लिए प्रसिद्ध थे।

• गुरुकुल में प्रवेश केवल सदाचार तथा योग्यता के आधार पर होता था। छात्र सामान्यः गुरुकुल में 12 वर्ष तक अध्ययन करते थे। प्रत्येक वेद के अध्ययन में 12 वर्ष लगते थे। एक वेद अध्ययन करने वाले को स्नातक, दो वेद का अध्ययन करने वाले को वस्तु तीन वेद का अध्ययन करने वाले को रुद्र तथा चार वेद का अध्ययन करने वाले को आदित्य कहते थे।


• वैदिक काल में गुरुकलों में रहने वाले छात्रों की वेष भूषा निश्चित थीं। शरीर के ऊपरी भाग पर मृगचर्म का तथा निश्चले हिस्से में वस्त्र का प्रयोग करते थे। तथा यद्योपवीत (जनेऊ) पहनते थे। उनके हाथ में एक डंडा होता था।


• गुरुकुल में छात्र ब्रह्म मुहूर्त में उठकर शौच आदि नित्यकर्मों से निवृत होकर, हवन, अध्ययन, पूजा, आश्रम कार्य मिक्षाटन, संध्या आदि कार्य करते थे।


• वेद तथा उनकी समीक्षायें ही वैदिक काल में पाठ्यक्रम का मुख्य अंग थी। इसके अतिरिक्त, धर्म, दर्शन, वेद, वेदांग नीतिशास्त्र, जीव, आत्मा परमात्मा जैसे विषय प्रमुख थे। इसके अतिरिकत, यज्ञ, अन्य संस्कार विधियाँ, इतिहास, ज्योतिष गणित, जीव विज्ञान, वनस्पति विज्ञान, भूगर्म विद्या, भौतिक शास्त्र कृषि, चिकित्सा आदि विषय पढ़ाये जाते थे। इस समय शिक्षा का माध्यम संस्कृत था। वर्ण के हिसाब से विषय पढ़ाये जाते थे।


• इस समय, व्याख्यान विधि सबसे अधिक प्रचलित थी. इसके अतिरिक्त प्रश्नोत्तर, कथा, सस्वर पाठ, अन्योक्ति, व्याख्यान वाद-विवाद, क्रियात्मक विधियों का प्रयोग पढ़ाने में किया जाता था इस काल की प्रमुख विधियाँ तय तथा श्रुति थी।


• वैदिक काल में औपचारिक परीक्षायें सामान्यतः नहीं होती थी छात्रों का दैनिक मूल्यांकन होता था ओर उसकी गलती को तुरन्त सुधारा जाता था। जब तक उसमें आवश्यक सुधार नहीं हो जाता था

तब तक वह आगे नहीं बड़ता था। जब शिक्षक यह समझ लेता था कि छात्र ने आवश्यक ज्ञान प्राप्त कर लिया है तब छात्र का उस विषय का अध्ययन समाप्त हो जाता था। छात्र विद्वानों की सभा, अथवा राजदरबार में शास्त्रार्थ के द्वारा अपने ज्ञान को प्रमाणित करता था।


• वैदिक काल में गुरु शिष्य के बीच अत्यन्त मधुर एवं आध्यात्मिक संबंध होते थे। गुरुकुल में पारिवारिक वातावरण होता था। गुरु-शिष्य में पिता-पुत्र जैसे स्नेही संबंध था। 


• वेदिक काल में नारी शिक्षा को पर्याप्त महत्व दिया गया था. उनके अध्ययन की पूर्ण व्यवस्था थी। गृहस्थ आश्रम में प्रवेश से पहले तक लड़कियाँ अध्ययन करती थी।


• अध्यापन कार्य के पश्चात् छात्र घर लौटते थे घर आने के पहले उनका समावर्तन संस्कार होता था इसमें शिष्य गुरु को गुरु दक्षिणा देते थे। और गुरु उन्हें अन्तिम उपदेश देते थे,आगे के जीवन के कर्तव्यों का स्मरण कराते थे, इस उपदेश को समावर्तन उपदेश कहते थे। जिससे आज हम दीक्षान्त समारोह कहते हैं।


• इस काल में दण्ड की आवश्यकता नहीं होती थी। इस काल में शारीरिक दण्ड पुर्णतः निषेध था। आवश्यकता पढ़ने पर गुरु छात्र की शुद्धि के लिए उद्दालक व्रत का पालन करने का दण्ड देते थे।


• आश्रम में भोजन वस्त्र आवास निःशुल्क उपलब्ध था, छात्र, भिक्षाटन, पशुपालन, कृषि आदि से आश्रम के लिए घन संग्रह करते थे. राजा, व्यापारी एवं समृद्ध लोग आश्रम को धन, भूमि, पशु, अन्न आदि दान करते थे। इस प्रकार आश्रम व्यवस्था चलती थी।