समाज मनोविज्ञान तथा समाजशास्त्र के मध्य सम्बन्ध - Relationship between social psychology and sociology

समाज मनोविज्ञान तथा समाजशास्त्र के मध्य सम्बन्ध - Relationship between social psychology and sociology


फिशर (Fisher. 1982) ने समाज मनोविज्ञान को समाजशास्त्र तथा मनोविज्ञान दोनों को ही एक उपविषय माना है. तब यह बिल्कुल ही स्वाभाविक है की समाज मनोविज्ञान का सम्बन्ध अपने पैत्रविषय यानि समाजशास्त्र तथा मनोविज्ञान दोनों के साथ अधिक हो. वास्तव में समाज मनोविज्ञान अपनी विषय वस्तु का वैज्ञानिक अध्ययन करने के लिए समाजशास्त्र तथा मनोविज्ञान दोनों की सहायता लेता है.


समाजशास्त्र और मनोविज्ञान को हम एक दूसरे के पूरक विषयों के रूप में अध्ययन कर सकते हैं. समाजशास्त्र सम्पूर्ण समाज का व्यवस्थित एवं क्रमबद्ध अध्ययन करता है. इनमे सामाजिक संरचनाओं तथा सामाजिक संबंधों का अध्ययन किया जाता है. एल. एफ. वार्ड (L.F. Ward) ने समाज के वैज्ञानिक अध्ययन को समाजशास्त्र कहा है. उसी तरह से गिडिंग्स (Giddings) के अनुसार "समाजशास्त्र समग्र रूप से समाज का क्रमबद्ध वर्णन एवं व्याख्या है." इन परिभाषाओं से स्पष्ट है की समाजशास्त्र समाज का समग्र रूप से अध्ययन किया जाता है.

सचमुच में समाज कोई एक अखंड तंत्र नहीं है उसके अंतर्गत परिवार, समुदाय, नगर, गाँव, संस्कृति, सभ्यता, जाति, आर्थिक संस्थाएं, राजनैतिक संस्थाए एवं भिन्न भिन्न प्रकार की समितियों का समावेश होता है. इस तरह समाजशास्त्र समाज के भिन्न-भिन्न पहलुओं का अध्ययन करके एक खास सामाजिक परिस्थिति को जन्म देता है. एक समाजशास्त्रीय इन परिस्थितियों में भिन्न-भिन्न तरह के अध्ययन कर समाज मनोवैज्ञानिकों को उनके स्वरुप के बारे में विशेष रूप से वैज्ञानिक जानकारी प्रदान करते है जिसका उपयोग करके समाज मनोवैज्ञानिक उन विभिन्न सामाजिक परिस्थितियों में व्यक्तियों के व्यवहार का अध्ययन करते है. इस तरह से समाजशास्त्र समाज मनोविज्ञान को अपनी विषय वस्तु समझने में मदद करता है. दूसरी तरफ समाजशास्त्र जिन सामाजिक संबन्धों अन्तः क्रियायों आदि का अध्ययन करता है उनका कोई न कोई मनोवैज्ञानिक आधार होता है. समाज मनोविज्ञान उन मनोवैज्ञानिक आधार की विस्तृत व्याख्या कर समाजशास्त्र को अपनी विषयवस्तु को समझने में मदद करता है. इस तरह से हम देखते हैं की समाज में मनुष्य द्वारा की गयी अन्तः क्रियायों एवं उनके भिन्न-भिन्न तरह के सामाजिक संबंधों को समझने के लिए एक समाजशास्त्री को समाज मनोविज्ञान द्वारा प्रदत्त आकड़ों एवं सिद्धांतों का सहारा लेना पड़ता है.

अतः समाजशास्त्र तथा समाज मनोविज्ञान एक दूसरे से सम्बंधित हैं क्योंकि एक बिना किसी दूसरे को सही से समझना संभव नहीं है. इन दोनों के संबंधों पर अकोलकर ( Akolkar. 1960) ने टिप्पणी करते हुए कहा था समाज मनोविज्ञान इस तथ्य को स्वीकार करता है कि मानवीय प्रकृति एवं व्यवहारों की एक संतोषजनक व्याख्या के लिए हमें समाज की संरचना, संगठन तथ संस्कृति को समझना चाहिए जिनसे व्यक्ति सम्बंधित होता है." इसी घनिष्ट सम्बन्ध के कारण कुछ समाज मनोवैज्ञानिकों ने यह भी कहा है की समाज मनोविज्ञान तथा समाजशास्त्र को किसी भी तरह से अलग करने का प्रयास एक सफल प्रयास नहीं हो सकता है. क्रेच तथा क्रेचफील्ड (Kretch and crutchfield, 1948) ने इस तथ्य के बारे अपना विचार प्रकट करते हुए कहा है, समाज मनोवैज्ञानिकों एवं समाजशास्त्रियों को उनके द्वारा किये गए विशिष्ट शोध या तथ्यों की प्रकृति और उनकी विभिन्न धाराओं के सामान्य निष्कर्षों के आधार पर अलग करने का प्रयास असफल ही होगा।"


इन समानताओं के बावजूद समाजशास्त्र तथा समाज मनोविज्ञान में अंतर है,

यह भिन्नता मूल रूप से दोनों विज्ञानों की विषयवस्तु एवं उसके अध्ययन की विधियों से सम्बंधित है जैसा की ऊपर कहा गया है की समाजशास्त्र के अध्ययन की विषयवस्तु समग्र समाज है जबकि समाज मनोविज्ञान के अध्ययन की विषयवस्तु समाज में रहने वाले व्यक्तियों के व्यवहार एवं भिन्न-भिन्न तरह की अन्तः क्रियायें हैं। मेयर्स (Myers, 1988) के अनुसार समाज मनोविज्ञान तथा समाजशास्त्र में दूसरा अंतर इन दोनों विज्ञानों द्वारा अपनाई गयी विधियों से सम्बंधित है समाज मनोवैज्ञानिक व्यक्ति के सामाजिक व्यवहार से सम्बंधित समस्यायों का अध्ययन करने के लिए प्रायः प्रयोगात्मक विधि का उपयोग करते हैं। इस विधि में वे कुछ चरों में जोड़-तोड़ करके उसका प्रभाव दूसरे चरों पर देखते हैं और तब दोनों चरों के बीच कारण-प्रभाव सम्बन्ध के बारे में वे एक निश्चित निष्कर्ष पर पहुचते हैं।


मनोविज्ञान का मानवशास्त्र से सम्बन्ध समाज मनोविज्ञान का संबंध मानव शास्त्र से भी है. मानवशास्त्र एक न है, इसमें मानव जाति के शारीरिक, सामाजिक, सांस्कृतिक पहलुओं का अध्ययन किया जाता है। इस संक्षिप्त परिभाषा से यह स्पष्ट है कि मानवशास्त्र में मानव जीवन के मूल पक्षों के अध्ययन पर अधिक बल डाला जाता है।

शारीरिक, समाजिक एवं सांस्कृतिक यह तीनों पक्ष ऐसे हैं जिन पर भिन्न-भिन्न तरह के मनोवैज्ञानिक प्रभाव स्पष्ट रूप से दीख पड़ते हैं। लिंटन 1936 के अनुसार मानव शाख की मुख्य दो शाखाएं हैं शारीरिक मानव शास्त्र तथा सांस्कृतिक मानवशास्त्र। इन दोनों शाखाओं की विषयवस्तु के अध्ययन में समाज मनोविज्ञान एक वैज्ञानिक आधार प्रदान करता है। शारीरिक मानवशास्त्र में प्रजाति विभेद (racial differentiation), संकरण ( hybridization), व्यक्तित्व पेटर्न्स (personality patterns), आदि का अध्ययन किया जाता है। शारीरिक मानवशास्त्र के इन सारे पहलुओं का प्रभाव व्यक्तियों के व्यवहार पर पड़ता है परिणामस्वरूप व्यक्तियों में अंतः क्रियाएं होती हैं जो समाज मनोविज्ञान के अध्ययन का विषय वस्तु बनता है। दूसरी तरफ शारीरिक मानवशास्त्री अपनी विषय वस्तु जैसे प्रजातीय विभेद, तथा मूल व्यक्तित्व पेटर्न को समझने के लिए समाज मनोविज्ञान के सिद्धांतों नियमों का विशेष रूप से सहारा लेते हैं, इस तरह दोनों विज्ञान आपस में संबंधित हैं। सांस्कृतिक मानवशास्त्र में मानव के सांस्कृतिक पक्षों के अध्ययन पर अधिक बल डाला जाता है।

मानव संस्कृति की उत्पत्ति कैसे होती है? उसमें कौन-कौन से ऐसे कारक उत्पन्न हो जाते हैं जिनसे सांस्कृतिक परिवर्तन में तीव्रता आ जाती है। मानव के धर्म, विश्वास, रीति रिवाज, आदि का कैसे विकास होता है? का अध्ययन सांस्कृतिक मानवशास्त्र में होता है। सांस्कृतिक मानवशास्त्र के सभी पक्ष कुछ ऐसे हैं जिनका प्रभाव व्यक्तियों के व्यवहारों पर पड़ता है। इस तरह से सांस्कृतिक मानवशास्त्र अपनी विषय वस्तु के भिन्न-भिन्न पक्षों का अध्ययन करके समाज मनोविज्ञान के लिए महत्वपूर्ण आंकड़ा प्रदान करते हैं। दूसरी ओर समाज मनोविज्ञानिक भी सांस्कृतिक मानवशास्त्री को व्यक्तियों के स्वाभाव के बारे में अध्ययन करके उसे संस्कृति के मूल तत्वों से अवगत कराते हैं।


किसी भी समाज की यथार्थता को तब तक नहीं समझा जा सकता है जब तक की उस समाज के व्यक्तियों के व्यवहारों के मूल तत्व को ना समझा जाए। इस तरह से सांस्कृतिक मानवशास्त्र एवं मनोविज्ञान एक दूसरे से काफी संबंधित हैं अर्थात कहा जा सकता है कि समाज मनोविज्ञान का संबंध समाजशास्त्र था मानव शास्त्र दोनों से ही गहरा है। वर्तमान समय में समाज मनोविज्ञान उतना ही महत्वपूर्ण है जितना की शिक्षा की अन्य प्रयुक्त क्या वैज्ञानिक विषय इकाइयां।

एक प्रयुक्त विज्ञान के रूप में समाज में विज्ञान का संबंध वास्तविक परिस्थिति में किए जाने वाले ऐसे सामाजिक मनोवैज्ञानिक शोध तथा अभ्यासों से होता है इसका उद्देश्य मानव सामाजिक व्यवहार को समझना तथा सामाजिक समस्याओं के लिए समुचित समाधान प्रदान करना होता है। समाज मनोवैज्ञानिक प्रमुख सामाजिक समस्याओं का अध्ययन कर समुचित समाधान का प्रयत्न करते हैं, उनमें गरीबी बढ़ती जनसंख्या की समस्या, अंतर समूह संघर्ष, अपराध, पूर्वाग्रह, तथा विभेद, आक्रामकता, वैश्यावृत्ति आदि ही प्रधान है। प्रयुक्त समाज मनोविज्ञान के रूप में समाज मनोविज्ञान के मुख्य दो मूलाधार हैं। सभी मानवी समस्याओं में कोई ना कोई मानसिक तत्व सम्मिलित होता है दूसरे शब्दों में सभी मानवीय समस्याओं में सामाजिक अंतः क्रिया के तत्व सम्मिलित होते हैं। समाज में मानवीय संबंधों को उन्नत बनाने के लिए धीरे-धीरे इनके सामूहिक प्रयासों की भूमिका जोर पकड़ते जा रही हैं। इन दोनों मूलाधार के संदर्भ में समाज मनोविज्ञान एक प्रयुक्त विज्ञान के रूप में विकसित हो रहा है और सामाजिक समस्याओं को समझने तथा उसका समुचित समाधान ढूंढने में निरंतर प्रयत्नशील है। अपने इस प्रयास समाज मनोविज्ञान मानवीय मूल्यों पर अधिक बल डाल रहे हैं, अधिकतर समाज मनोवैज्ञानिक यह मान कर चलते हैं कि व्यक्ति में आलोचनात्मक तर्कणा की क्षमता होती है जो उन्हें सामाजिक समस्याओं के समाधान में मदद करता है।