समाज समूह कार्य के सिद्धांत. Theory Of Social Group Work. - समाज कार्य शिक्षा

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Tuesday, 7 February 2017

समाज समूह कार्य के सिद्धांत. Theory Of Social Group Work.

सिद्धांत से तात्पर्य सामान्य नियम या कानून एवं सामान्य रूप से माने गये मत है, ये वे साधन है जिनके द्वारा हम एक परिस्थति से दूसरी परिस्थति में प्रवेश करते है। किसी भी कार्य को करने के लिए सर्वमान्य नियमों की आवश्यकता होती है जिनके आधार पर कार्य को सुचारू एवं सुव्यवस्थित रूप से किया जा सकता है अतः समूह कार्य में सिद्धांत ऐसी ही भूमिका का प्रतिपादन करते है जिनके आधार पर समूह कार्य को आसानी से किया जा सकता है। भारत में व्यावसायिक सामाजिक कार्य में प्रमुख रूप से समूह कार्य एक अभिन्न अंग बन गया है । समाज कार्य के प्रत्येक क्षेत्र में समूह कार्य का अभ्यास किया जाने लगा है। अतः इस इकाई का अध्ययन करने के पश्चात आप

   समूह कार्य मे प्रयुक्त किए जाने वाले प्रमुख सिद्धांतों को समझ सकेंगे ।
  सामाजिक समूह कार्य के विभिन्न  प्रारूपों को समझ  सकेगें 
       सामाजिक समूह कार्य की मुख्य विशेषताएँ और प्रमुख क्षेत्रों को समझ सकेंगे। 

मानव समाज के इतिहास में सभी देशों एवं युगों में निर्धन, निराश्रित, अपंग, अनाथ,बेरोजगार, रोगी व्यक्ति रहे है तथा ऐसी अनेक समस्याएँ आई है जहाँ इन व्यक्तियों को अनेक कठिनाईयों का सामना करना पड़ा है। अतः इन व्यक्तियों की समस्याओ का समाधान करने तथा इसके परेशानियों को समझने के लिये आदि‍काल से प्रयास किये जा रहे हैं, समाज कार्य की उत्पत्ति इन्ही प्रयासों के फलस्वरुप हुई है। मानव और समाज पूर्ण रुप से एक-दूसरे पर आश्रित है। जिस प्रकार समाज ने मनुष्य को अनेक प्रकार के मानवीय अस्तित्व प्रदान किये है वहीं समाज द्वारा अनेक प्रकार की समस्याएँ जैसे बेरोजगारी आदि भी व्याप्त है। परन्तु आज समाजकार्य के लिये केवल दया, करुणा, प्रेम की भावना की पर्याप्त नहीं है आज समाजकार्य ने व्यवसाय का रुप ले लिया है। सामाजिक समूह कार्य समाज कार्य की एक प्रणाली के रूप में प्रयुक्त किया जाता है समाज कार्य में कुछ सिद्धांतों का पालन किया जाता है जिनके अभाव में व्यावसायिक समाज कार्य को नहीं किया जा सकता इसी भांति समूह कार्य के भी कुछ महत्वपूर्ण सिद्धांत होते है जिनका पालन किये बिना कोई भी सामाजिक कार्यकर्ता समूह कार्य प्रक्रिया को सम्‍पन्‍त नहीं कर सकता। सिद्धांतों का पालन कार्य ऐच्छिक नहीं होता, क्योंकि इन सिद्धांतों को प्रयोग में लाये बिना लक्ष्यों को प्राप्त नही किया जा सकता । इसलिए इस इकाई में हम सामाजिक समूह कार्य के विभिन्न सिद्धांतों और प्रारूपों पर चर्चा करेंगे।  

सामाजिक समूह कार्य में प्रयुक्त किये जाने वाले प्रमुख सिद्धांत
            सामाजिक सामूहिक कार्य के निम्नलिखित आधारभूत सिद्धांत है जिनके आधार पर समूह कार्य में लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सकता है:-
नियोजन का सिद्धांत :-   नियोजन किसी भी कार्य को करने का एक सुव्यवस्थित और सुनियोजित तरीका है जिससे लक्ष्यों को आसानी से प्राप्त किया जा सके। नियोजन के अंतर्गत विद्यमान स्थितियों तथा सम्भावित परिवर्तनों की उपयोगिता को ध्यान में रखकर एक व्यवस्थित तथा सुसंगठित रुपरेखा तैयार की जाती है जिससे भविष्य के परिवर्तनों को अपेक्षित लक्ष्यों के अनुरुप नियंत्रित, निर्देशित तथा संशोधित किया जा सके । समूह का निर्माण हमेशा ही सुनियोजित होना चाहिए सामुहिक कार्यकर्ता सुनियोजित तरीके से समूह निर्माण का कार्य करते है यदि सामूहिक कार्यकर्ता नियोजित तरीके से कार्य करेगा तो निश्चित ही उसे लक्ष्य प्राप्त हो जायेगा। लक्ष्य नियोजन का सिद्धांत लक्ष्य प्राप्ति में अत्यंत ही सहायक होता है। कार्यकर्ता निम्न लिखित बिंदुओं के माध्यम से ही कार्य करता है जिससे उसे कार्य करने में आसानी होती है-

  v विकास के लक्ष्यों एवं मूल्यों का निर्धारण करना ।
  v परिस्थितियों का विश्लेषण करना।
  v वर्तमान सेवाओं में गुणात्मक एवं परिमाणात्मक दृष्टि से पाई जाने वाली कमियों की जानकारी ।
  v विशिष्ट उद्देश्यों तथा रणनीतियों का निर्धारण।
  v आगत लक्ष्यों, क्षेत्रों, साधन आदि का निर्धारण ।
  v प्रशिक्षण तथा संचार प्रक्रिया की सीमाओं की जानकारी ।
  v क्रिया नियोजन तथा कार्यों का दस्‍तावेजीकरण करने के महत्व का ज्ञान होना।
  v कार्य करने हेतु आवश्यक उपकरणों के निर्माण की जानकारी का होना।
  v संभावित साधनों संसाधनों की उपलब्धता की जानकारी ।
  v शक्ति के साधनों का निर्धारण।
  v समूह के सदस्यों की आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक,भौगोलिक और वर्तमान स्थिति के ज्ञान, अनुभव एवं जीवन स्तर की पहचान करना।
इसके अतिरिक्त समूह कार्यकर्ता को समूह सदस्य संख्या, शक्ति के स्‍त्रोत, उद्देश्य तथा लक्ष्यों के बीच संतुलन स्थापित हो यह ध्‍यान रखना चाहिए।
लक्ष्यों की स्पष्टता का सिद्धांत :- सामुदायिक कार्यकर्ता के लिए स्पष्ट लक्ष्यों का ज्ञान होना नितांत आवश्यक होता है जिससे वह कार्य को आसानी से कर सकता है । इससे स्पष्ट हो जाता है कि कौनसा सदस्य किस प्रकार का कार्य करेगा, वह क्या कार्य करेगा, कब करेगा, कैसे करेगा ? यह सब कुछ स्पष्ट हो जाता है जिससे प्रत्येक सदस्य को कोई शंका नहीं होती है कि उसे क्या करना है ? यह संपूर्ण क्रिया कार्यपूर्णता के लिए आवश्यक है। लक्ष्यों की स्पष्टता निम्न लिखित कारणों से भी महत्वपूर्ण मानी जाती है -
  v लक्ष्य ही कार्यकर्ता को अपने मार्ग में चलने के लिए हमेशा प्ररित करते रहते है तथा हमेशा आगे बढ़ने के लिए उत्साहित करते है।
  v लक्ष्यों की स्पष्टता उपलब्ध साधनों का समुचित उपयोग करने पर बल देती है।
  v लक्ष्यों पर ही कार्य निर्भर करते है ।
  v कार्य का प्रारम्भ, उसका स्वरूप तथा प्रकृति उद्देश्यों पर निर्भर होने के कारण लक्ष्यों को स्पष्ट होना आवश्यक होता है ।
  v लक्ष्य स्पष्ट होने से नियंत्रण एवं निर्देशन दोनों बेहतर रहते हैं।
  v समूह सदस्यों की भागीदारी यथोचित होती है।
  v मूल्यांकन करने में आसानी होती है।
 समूह कार्य में लक्ष्यों की स्पष्टता से कार्यकर्ता के लिए यह जानना अत्यंत आवश्यक होता है कि सामूहिक अनुभव से प्रत्येक सदस्य को क्या प्राप्त करना चाहिए और उनमें किस प्रकार के अनुभव प्राप्त करने की क्षमता है? इससे समूह सदस्यों की शक्तियों एवं कमजोरियों को ज्ञात किया जा सकता है। उदाहरण के लिए-यदि सामूहिक कार्यकर्ता किसी विशेष स्थान पर समूह कार्य द्वारा स्वच्छता कार्यक्रम चलाना चाहता है तो सर्वप्रथम समूह के सदस्य यह स्वयं अनुभव करें कि वे स्वयं इस दिशा में प्रयत्न करें अन्यथा यह कार्यक्रम सफल नहीं हो पायेगा । जब तक समूह का प्रत्येक सदस्य यह महसूस न कर ले कि यह मेरा काम है ना कि दूसरे का, तब तक लक्ष्यों को प्राप्त नहीं किया जा सकता। इस मानसिकता से कार्यों द्वारा लक्ष्यों को आसानी से प्राप्त किया जा सकता है।
सौद्देश्य संबंध का सिद्धांत :- मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है वह समाज में ही रहकर अपना जीवन-यापन कर सकता है इसी आवश्यकता को ध्यान में रखकर वह संबंधों का निर्माण करता है एवं अपनी आवश्यकताओं की संतुष्टि सम्बन्ध के माध्यम से करता है। अतः प्रत्येक सामाजिक स्थिति मे संबंधों का विशेष महत्व है। सामुहिक कार्य में भी कार्यकर्ता तथा समूह के बीच संबंधों का अत्यंत महत्व है लेकिन यह संबंध उद्देश्यों के आधार पर होना चाहिए जिससे आगे किसी भी प्रकार का कोई मतभेद कार्यकर्ता और सदस्यों के बीच उत्पन्न ना हों । समूह के सदस्य निश्चित कियें जाय तथा उन्हीं के आधार पर संबंधों की स्थापना एवं विश्‍लेषण हों । कार्यकर्ताओं के लिए भी ध्यान देने वाली बात यह है कि कार्यकर्ता एवं समूह के बीच संबंध तभी घनिष्ठ होंगे जबकि कार्यकर्ता समूह सदस्यों को जैसे है वैसे ही स्वीकार करे । सामान्यतः सोद्देश्य संबंध के निम्न लिखित लक्षण होते हैं-
  v सर्वप्रथम कार्यकर्ता का समूह द्वारा स्वीकार किया जाय ।
  v समूह को कार्यकर्ता द्वारा स्वीकार किया जाय।
  v स्नेह एवं आत्मसंचार का पूर्ण भाव व्याप्त हो।
  v समस्या सुलझाने की इच्छा का विकास हो।
  v समूह सदस्यों की भागीदारी तथा कार्यकर्ता द्वारा व्यावसायिक ज्ञान का उपयोग।
  v सदस्यों की इच्छा को सर्वोपरि माना जाय एवं उन्हें आत्मनिश्‍चय का अधिकार हो।
  v सदस्यों को आत्म निर्णय का अधिकार हो।
  v सामूहिक रूचि तथा भागीदारी में निरन्तर वृद्धि हो।
  v कार्यकर्ता द्वारा सदस्यों की बातों एवं शिकायतों को ध्यान पूर्वक सुना जाय।
  v कार्यकर्ता को सदस्यों की सामाजिक, सांस्कृतिक स्थिति का ज्ञान हो।
  v कार्यकर्ता को उसी बौद्धिक स्थिति के आधार पर बात करना चाहिए जिस बौद्धिक स्थिति का समूह-सदस्य हों।                        
निरंतर व्यक्तिकरण का सिद्धांत :-
 प्रत्येक व्यक्ति अपने अलग-अलग पर्यावरण, ज्ञान एवं वंशानुक्रम से भिन्न होता है प्रत्येक व्यक्ति कि अपनी अलग विशिष्टता होती है ।अतः कार्यकर्ता का दायित्व होता है कि वह प्रत्येक सदस्य की ओर अपना ध्यान रखें जिससे समूह अपने लक्ष्य पर अग्रसर रहें। सामाजिक समूह कार्य में निरंतर व्यक्तिकरण का सिद्धांत एक महत्वपूर्ण सिद्धांत के रूप में जाने जाता है जिसके माध्यम से समूह कार्यकर्ता ऐसे समूह के सदस्यों की सहायता करता है, जो सदस्य समूह में सामंजस्य स्थापित नहीं कर सकते हैं, उन्हें समूह के सदस्यों के साथ सामंजस्य स्थापित करने के लिए प्रेरित करता हैं। इसके अलावा समूह सदस्यों की विभिन्न इच्छाओं और आवश्यकताओं को भी वह निरंतर व्यक्तिकरण के माध्यम से जान सकता है। वैयक्तीकरण करने के लिए कार्यकर्ता में निम्नलिखित लक्षणों का होना अत्यंत आवश्यक हैं -
  v अभिमत तथा पूर्वाग्रहों से स्वतंत्र होना चाहिए।
  v मानव-व्यवहार का ज्ञान होना चाहिए।
  v सुनने तथा अवलोकन करने की क्षमता होनी चाहिए।
  vसमूह सदस्यों की भावनाओं को समझने की योग्यता होनी चाहिए ।
  v सदस्यों में आत्मीयता की भावना उत्पन्न करने की योग्यता होनी चाहिए।
  v समस्या के अध्ययन,निदान तथा चिकित्सा में समूह सदस्यों का सहयोग प्राप्त करने की योग्यता होनी चाहिए।
कार्यकर्ता व्यक्तिकरण के माध्यम से सामूहिक सदस्यों की कठि‍नाइयों को ध्यान में रखता है और उनके अनुसार कार्यक्रम आयोजित करता है जिससे कि प्रत्येक सदस्य कार्यक्रम का हिस्सा बन सकें ।                                  
निर्देषित सामुहिक अंतःक्रिया का सिद्धांत :- सम्पूर्ण समूह कार्य प्रक्रिया सामूहिक गतिविधियों के माध्यम से नियोजित की जाने वाली प्रक्रिया है जिसके माध्यम से संपूर्ण कार्य सम्पन्न किये जाते है। यह सामूहिक प्रक्रिया कार्यकर्ता और समूह सदस्यों के मध्य होने वाली अन्तःक्रियाओं पर ही निर्भर करती है। इन अन्तः क्रियाओं का स्वरूप इस बात पर निर्भर करता है कि समूह के सदस्य तथा सामूहिक कार्यकर्ता की इच्छाएँ, क्षमताएँ तथा कार्य के ढंग इत्यादि किस प्रकार के हैं? जहाँ कहीं भी दो पक्ष विद्यमान होते हैं, अन्तः क्रियाएँ होती ही है। यदि ये अंतः क्रियाऐं निर्देशित ना हो अर्थात इनकी दिशा सही ना हो तो सामूहिक उपलब्धियों को प्राप्त नही किया जा सकेगा। इसलिए कार्यकर्ता का कार्य रहता है कि वह किस प्रकार समूह सदस्यों एवं कार्यकर्ताओं के मध्य होने वाली अन्तःक्रियाओं को सही दिशा प्रदान करें।  समूह के कार्य एवं उद्देश्य समूह में होने वाली अन्तः क्रिया का स्वरूप तथा इनको दिशा समूह के सदस्यों तथा कार्यकर्ताओं की क्षमताओं, इच्छाओं, आशाओं तथा कार्य करने के ढंग पर निर्भर रहती है । अतः कार्यकर्ताओं को इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि समूह के सदस्यों मे आपसी संबंध सकारात्मक रूप में हो तथा अन्तःक्रिया का प्रभाव एक ही दिशा में हो अन्यथा नकारात्मक अंतःक्रिया समूह कार्य प्रक्रिया में व्यवधान उत्पन्न कर सकती है।                  
जनतंत्रीय सामूहिक आत्मनिश्‍चयीकरण का सिद्धांत :- जनतंत्रीय सामूहिक क्रिया में कार्यकर्ता समूह का, समूह के लिए, समूह द्वारा कार्य करने पर कार्यकर्ता द्वारा बल प्रदान किया जाता है। कार्यकर्ता को इस आधार पर तैयार करना चाहिए कि‍ वह स्वयं अपने निर्णय लेने में सक्षम हो सके, अपनी क्षमताओं एवं योग्यताओं के अनुरूप कार्य कर सकें । यह सिद्धांत इस तथ्य पर आधारित होता है कि समूह तथा व्यक्ति को सामाजिक उत्तरदायित्व ग्रहण करने के अवसर उपलब्ध करायें जाये। लेकिन यह भी निर्धारित करना अत्यंत आवश्यक है कि उत्तरदायित्व किस प्रकार का होगा और किन आधारों में दिया जायेगा ? यह निर्धारित करना कार्यकर्ता के लिए आवश्यक होगा। सामूहिक कार्य प्रक्रिया में समूह के प्रथम चरण से लेकर समापन तक संपूर्ण प्रक्रिया में जो निर्णय लिये जाते हैं वे जनतंत्रीय प्रणाली के आधार पर ही सुनिश्चित किये जाते हैं। संपूर्ण प्रक्रिया में जो निर्णय लिये जाते हैं वह सामूहिकता की भावना को ध्यान में रखकर ही लिये जाते हैं। समूह का प्रत्येक सदस्य इसमें बराबर का भागीदार होता है। वे स्वयं यह निर्धारित करते है कि किस प्रकार कार्य करना है और क्या निर्णय लेना है, कार्यकर्ता केवल सही दिशा देने का कार्य करता है। इस प्रक्रिया के संदर्भ में प्रो. राजाराम शास्त्री ने कहा था कि – समूह अथवा समूह के सदस्य स्वयं से, स्वयं के बारे में और स्वयं के लिए जो कुछ भी, जब भी करें, वह इस प्रकार होना चाहिए कि उनमें से प्रत्येक की भावना को कम से कम आघात पहुँचाते हुए तथा उन्नत समाजगत स्वीकृति मूल्यों तथा प्रेम, सौहार्द, शालीनता, सज्जनता से युक्त होकर करें, अर्थात आपस में शिष्ट आचार विचार के माध्यम से प्रकृतिगत विकृतियों के दमन और सद्वृतियों के विकास द्वारा करें। जब कार्य में भी इस अपेक्षित स्थिति में कमजोरी के लक्षण दिखें तो सामूहिक कार्यकर्ता को भी कथित जनतान्त्रिक तरीकों से ही समय सेवार्थियों अथवा सदस्यों के ज्ञान-धरातल को उन्नत कर या परिवेशगत परिमार्जन द्वारा अन्तःक्रियाओं की स्थिति एवं स्वरूप को ऐसी दिशा देनी चाहिए जो अधिकाधिक अधिकारी हों।                             
 लोचदार कार्यात्मक संगठन का सिद्धांत :- लोचदार कार्यात्मक संगठन सिद्धांत के द्वारा समूह कार्यकर्ता इस प्रकार का प्रयास करता है कि किसी भी गतिविधि को इतना सरल व आसान बनाया जायें जिससे प्रत्येक सदस्य गतिविधि‍यों का हिस्सा बन जायें और समय व आवश्यकतानुसार कार्यक्रम में परिवर्तन संभव हो सके । समूह कार्य में समूह का निर्माण कुछ विशिष्ट उद्देश्यों के साथ किया जाता है। इन्हीं उद्देश्यों को प्राप्ति के लिए कुछ औपचारिक संगठनों का निर्माण कराया जाता है क्योंकि इन्‍हीं औपचारिक संगठनों के माध्यम से समूह सदस्यों की शक्तियाँ एक दिशा में प्रवाहित होती है। साथ ही साथ सामूहिक जीवन में भी स्थायित्व आता है। कुछ समूहों में भिन्नता भी होती है। समूहों में समयानुसार आवश्यकताएँ बदलती रहती है तथा नवीन इच्छाओं का भी जन्म होता हैं अतः समूह संगठन की रचना में लचीलापन होना अत्यंत ही आवश्यक होता हैं। 
प्रगतिशील कार्यक्रम अनुभवों का सिद्धांत :- समूह कार्य एक प्रगतिशील प्रक्रिया है और यह प्रक्रिया बिना रचनात्मक कार्यक्रमों के संभव नहीं हो पाती है । जब समूह कार्य प्रक्रिया को प्रारंभ किया जाता है और उसमें कार्यक्रमों का प्रारंभ किया जाता है तो ध्यान देने वाली बात यह होती है कि कार्यक्रम इस प्रकार का हों जिसमें समस्त रुचियां,आवश्यकताएँ, अनुभव निपुणता तथा दक्षता होती जाय। जैसे -जैसे इन शक्तियों मे विकास होता जायेगा वैसे-वैसे कार्यक्रमों में भी परिवर्तन किया जायेगा । प्रत्येक स्तर पर समूह को कार्यक्रम का हिस्सा बनने के लिए प्रेरित किया जाता है जिससे कि प्रत्येक सदस्य कार्यक्रम का हिस्सा बन जाय और सदस्यों में आत्मनिर्णय की क्षमता का विकास हो। संपूर्ण प्रक्रिया प्रगतिशील समूह एवं कार्यकर्ता की योग्यता पर निर्भर करता है। अतः प्रगतिशील कार्यक्रम अनुभवों के सिद्धांत को समूह कार्य में एक विशिष्ट स्थान दिया जाता हैं ।        
साधनों के उपयोग का सिद्धांत :- किसी भी प्रक्रिया में साधनों का उपयोग एक सामाजिक कार्यकर्ता के लिए अत्यंत ही आवश्यक होता है। इस प्रकिया द्वारा कार्यकर्ता यह अनुभव प्राप्त करता है कि किसी भी समूह या सामुदायिक प्रक्रिया में उपलब्ध साधनों का उपयोग कैसे किया जायें जिससे लक्ष्य को आसानी से प्राप्त किया जा सकें । साधनों का उपयोग कुशलता पूर्वक करना चाहिए जिससें किसी भी प्रकार की कोई समस्या उत्पन्न ना हो और साधनों का उचित उपयोग किया जा सकें । संस्था एवं सम्पूर्ण वातावरण और समुदाय मिलकर बहुत से साधन रखते हैं।  सामाजिक सामूहिक कार्य में संस्था तथा समुदाय के इन साधनों का प्रयोग व्यक्तियों और समस्त समूह के हित के लिए जाता है। कार्यकर्ता की भूमिका केवल समूह में ही नहीं होती वरन वह समूह से बाहर भी उतनी ही भूमिका को अदा करता है ।वह समुदाय से संबंधित सभी आवश्यक जानकारी को एकत्रित करता है तथा समस्त सदस्यों को वह जानकारी साझा करता है जिससें वह एक प्रकार से मध्यस्थता की भूमिका भी अदा करता है और आवश्यकता पड़ने पर समूह को उपलब्ध साधनों के उपयोग के लिए प्रेरित भी करता है।                       
           
मूल्यांकन का सिद्धांत :- मूल्यांकन एक सतत् और निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। यह प्रक्रिया कार्य प्रारंभ होने के साथ ही प्रारंभ हो जाती है। इस प्रक्रिया द्वारा यह तय किया जाता है कि कार्य में कितनी सफलता प्राप्त हुई है और कार्य के दौरान क्या कमियाँ रह गई है जिसे कार्यकर्ता द्वारा दूर करने का प्रयास किया जाना हैं । यह एक निर्णय करने वाली प्रक्रिया भी है, जो निश्चित करती है कि समूह कार्यकर्ता तथा संस्था का क्या उत्तरदायित्व है, उनको पूरा करने की कितनी क्षमता है, क्या-क्या शक्तियाँ है तथा क्या-क्या कमजोरियां है, कौन कौन से कार्य रचनात्मक सहयोग प्रदान करते है। मूल्यांकन द्वारा समूह की अंतःक्रियाओं, समूह की शक्तियों ,सदस्यों की कमजोरियों, समूह के अनूभव एवं उनकी क्षमताओं का आकलन किया जाता है। समूह कार्यकर्ता निम्न लिखित तीन स्थितियों का मूल्यांकन करता है -
    v कार्यक्रम का मूल्यांकन
    v सदस्यों की भागीदारी का तथा अनुभव का मूल्यांकन
    v कार्यकर्ता द्वारा स्वयं अपनी भूमिका का मूल्यांकन 

               उपर्युक्त समूह कार्य के सिद्धांतों समूह कार्य को सरलता पूर्वक सम्पन्न करने में कार्यकर्ता की सहायता करते हैं                 जिससे समूह कार्य प्रक्रिया को सरलतापूर्वक सम्पन्न किया जा सकता है। ये सिद्धांत समूह कार्यकर्ता को अनुकूल             दशा प्रदान करते है । ये कोई स्थिर सिद्धांत नहीं है वरन आवश्यकतानुसार परिवर्तनशील भी है अनुभवों, ज्ञान                निपुणता तथा प्रविधियों के साथ इनमें बदलाव होते रहते हैं। परन्तु यह वे साधन है जिनका उपयोग कर कार्यकर्ता            लक्ष्य की प्राप्ति आसानी से कर सकता है। 

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