व्यवस्थापन का अर्थ, प्रकृति, प्रकार, सहायक, कारक, महत्व - Meaning, Nature, Type, Assistance, Factor, Significance Of Administration. - समाज कार्य शिक्षा

समाज कार्य शिक्षा

Post Top Ad

Post Top Ad

Monday, 11 June 2018

व्यवस्थापन का अर्थ, प्रकृति, प्रकार, सहायक, कारक, महत्व - Meaning, Nature, Type, Assistance, Factor, Significance Of Administration.



व्यवस्थापन एकीकरण करने वाली प्रक्रिया है। यह प्रक्रिया संघर्ष के पश्चात अथवा संघर्ष टालने के लिए उपयोग में लायी जाती है। दोनों पक्ष अपने-अपने विचारों में परिवर्तन एक दूसरे की इच्छानुसार कर लेते हैं। पति पत्नी विवाह के पश्चात यदि विरोधी स्थिति पाते हैं तो उस समय दोनों पक्ष अपने में परिवर्तन थोड़ा-थोड़ा कर लेते हैं जिससे समायोजन सम्भव होता है।

 व्यवस्थापन का अर्थ 
गिलिन तथा गिलिन: ष्ष्व्यवस्थापन यह प्रक्रिया है जिसके द्वारा प्रतियोगी तथा संघर्षरत व्यक्ति और समूह एक दूसरे के साथ अपने सम्बन्धों को अनुकूल करते हैं जिससे प्रतिस्पर्धा, अतिक्रमण या संघर्ष के कारण उत्पन्न कठिनाइयों को पार किया जा सकें।


जोन्स, ई0एम0: अर्थ में व्यवस्थापन असहमत रहने के लिए समझौता कहा जा सकता है।ष्ष् आगर्बन तथा निम्काफ ने व्यवस्थापन प्रक्रिया को विश्लेषित करते हुए लिखा है कि संघर्ष समूह की एकता को धक्का पहुंचता है अतः इसको रोकने के लिए व्यवस्थापन प्रयोग किया जाता है।

     व्यवस्थापन एक ऐसा यंत्र व साधन है जिसके द्वारा विरोधात्मक तथा संघर्षात्मक विचारेां का समन्वय ,समझौता तथा हस्ताक्षेप के द्वारा होता है। इससे विचारों में परिवर्तन आता है तथा नये विचारों का विकास होता है।

व्यवस्थापन की प्रकृति

व्यवस्थापन एक चेतन तथा निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है। इन विशेषताओं को निम्न प्रकार से समझा जा सकता हैः
1. व्यवस्थापन में निश्चित व्यक्तियों तथा दलों का ज्ञान होता है।

संघर्ष की स्थिति तथा परिणाम ज्ञात होते हैं।

व्यक्ति अथवा समूह अपनी शक्ति का अनुमान लगा लेता है।

हार जीत की लगभग स्पष्टता होती है।

हानि का अनुमान होता है।

घृणा का तत्व पाया जाता है परन्तु उसे प्रेम में परिवर्तित कर देते हैं।

व्यवस्थापन में श्रेष्ठता तथा निम्नता बनी रहती है।

 व्यवस्थापन के प्रकार

 गिलिन तथा गिलिन ने दो प्रकार के व्यवस्थापन का उल्लेख किया है:

1. समपदस्थ व्यवस्थापन

 जब दो शक्तियों में संघर्ष होने के उपरान्त किसी प्रकार का व्यवस्थापन होता है तो उसे समपदस्थ व्यवस्थापन कहते हैं क्योंकि इसमें दोनों पक्षों की स्थिति समान रहती है। उदाहरण के लिए उद्योगपतियों तथा श्रमिकों में समप्रदस्थ व्यवस्थापन होता है। शक्तिशाली राष्ट्र जैसे अमेरिका तथा रूस यदि कोई संधि-पत्र तैयार करते हैं तो व्यवस्थापन का यही रूप होता है।

जब दो शक्तियों में एक निर्बल तथा दूसरी सशक्त होती है तो सशक्त-शक्ति दूसरे को दबा लेती है, पराजित कर देती है, अपनी सुविधानुसार परिवर्तन के लिए बाध्य करती है। जिसकी शक्ति अधिक होती है समझौता उसी के अनुसार होता है। उदाहरण के लिए मुगल सम्राटों ने अनेकों शक्तियों जैसे मराठों, राजपूतों  आदि को पराजित कर व्यवस्थापन के लिए मजबूर कर दिया था।


 व्यवस्थापन की पद्धतियाँ  निम्न पद्धतियाँ संघर्ष को समाप्त करने अथवा संघर्ष टालने के लिए उपयोग में लायी जाती हैः

1. मध्यस्थता - तटस्थ व्यक्ति को समझोता कराने के लिए नियुक्त किया जाता है। वह न तो निर्णय लेता है और न ही अपनी इच्छा प्रकट करता है। वह केवल संदेशवाहक का कार्य करता है।

 2. सुलह - सुलह कराने वाला व्यक्ति प्रभावकारी होता है। निर्णय की ओर संकेत करता है। मानना या न मानना विरोधी व्यक्तियों पर निर्भर होता है।

3. निर्णायक - इस पद्धति में निर्णायक की बात मानना दोनों दलों के लिए अनिवार्य होता है।

4. बल का प्रयोग - शक्तिशाली पक्ष दूसरे को व्यवस्थापन के लिए विवश कर देता है। व्यक्ति इन तरीकों के अतिरिक्त कुछ तरीकों का उपयोग समायोजन तथा अस्तित्व रक्षा के लिए करता है।

5. युक्तीकरण -  व्यक्ति जब उद्देश्य प्राप्त करने में असफल रहता है तो कोई न कोई कारण ढूंढता है जिससे सन्तोष प्राप्त होता है। वह जिस स्थिति में होता है उसी को उचित मान लेता है।

6. स्थिति परिवर्तन - असंतोष को दूर करने के लिए व्यक्ति स्थिति में परिवर्तन कर लेता है। उदाहरण के लिए दल परिवर्तन।

7. स्थानापन्नता - जब व्यक्ति एक उद्देश्य प्राप्त करने में असफल रहता है तो उसके स्थान पर उससे भिन्न उद्देश्य निश्चित करता है और अपने को परिस्थिति से समायोजित कर लेता है।

 व्यवस्थापन के सहायक कारक 

व्यवस्थापन की प्रक्रिया निम्न सामूहिक क्रियाओं द्वारा तेज की जा सकती है।

 1. सूचना, शिक्षा तथा प्रचार - सही सूचनायें दोनों पक्षों को प्राप्त हों।

 अनुकूल प्रचार कार्य हो।

 अफवाहों को रोका जाय।

 शिक्षात्मक प्रयत्न किये जाय।

 2. राजनैतिक एवं वैधानिक दबाव  राजनैतिक प्रभाव का उपयोग हो।

 कानूनों में संशोधन हो।

कानूनी कार्यवाही साधारण हो।

3. व्यवसायों एवं पेशों में अंतः समूह सम्पर्कों का संगठन इन संगठनों का निर्माण कारखानों तथा आफिसों में किया जा सकता है क्योंकि यहाँ विभिन्नतायें अधिक होती हैं।

1. राष्ट्रीय फेडरेशन तथा रीजनल कांउसिल

2. सार्वजनिक प्रशंशा तथा पारितोष।

3. व्यक्ति तथा समूह की मानसिक चिकित्सा।

4. व्यवस्थापन के परिणाम

4.संघर्ष तथा प्रतिस्पर्धा पर रोक 

1. विघटनकारी शक्तियों पर रोक लगती है।

2. सामाजिक एकता को प्रोत्साहन मिलता है।

3. विरोधात्मक क्रियायें एवं विचार समाप्त होते हैं।

4. नये कानून बनते हैं।

5. सम्बन्धों का रूप परिवर्तित होता है।



5.विरोधी दमन 

1. विजेता समूह पराजित समूह को दबाकर रखता है।

 2. अधिकार दमन होता है।

 3. मानसिक पराजिता का पुट होता है।

 4. विविध व्यक्तित्वों का एकीकरण



   6.-व्याक्तित्व सम्पन्न व्याक्तियों का सहयोग

  1. विभिन्न विचारों, भावनाओं वाले व्यक्तियों में सम्बन्ध स्थापित होता है।

2. अंतरों को कम करते हैं।

3. प्रयत्नों में सहायता करते हैं।



7.संस्थाओं में परिवर्तन

1. नयी परिस्थिति के अनुसार नयी संस्थाओं का विकास।

2. नये कानूनों की रचना।



8.परिस्थिति में परिवर्तन

 1. संघर्ष से उत्पन्न विघटित स्थिति को पुनः गठित होने का अवसर मिलता है।

2. नयी स्थितियों का निर्धारण होता है।



9.सात्मीकरण की तैयारी 

 1. व्यवस्थापन से समरूपता आती है।

2. जीजवन पद्धति एक सी होने लगती है।

 3. अपनापन आने लगता है।



10.व्यवस्थापन का महत्व

 व्यवस्थापन एक अनिवार्य प्रक्रिया है क्योंकि संघर्ष से जो हानि होती है उसको रोकना आवश्यक होता है। यह कार्य व्यवस्थापन द्वारा ही सम्भव है:

1. विघटन रुकता है।

2. विरोधी क्रियायें समाप्त होती है।

3. आर्थिक हानि से बचाव होता है।

 4. शक्ति का संचय होता है।

5. समाजिक एकता आती है।

 6. आंतरिक संघर्ष समाप्त होते हैं।

7. नयी संस्थाओं का विकास होता है।

8. जीवन पद्धति में परिवर्तन आता है।

9. व्ययस्थापन पक्ष तथा विपक्ष की स्थिति को औपचारिक बनाता है।

 10.व्यक्तित्व समायोजित होता है। 4

No comments:

Post a comment

Post Top Ad