न्यादर्श अथवा प्रतिदर्श के प्रकार (Types of Sampling ) : संभाविता और असंभाविता प्रतिदर्शन

 न्यादर्श अथवा प्रतिदर्श (Sample) :

जीवसंख्या की समस्त इकाइयों में से अध्ययन हेतु कुछ इकाइयों को एक निश्चित विधि द्वारा चुन लिया जाता है। उन संकलित इकाइयों के समूह को न्यादर्श कहते है। इस न्यादर्श के आधार पर ही अध्ययनगत निष्कर्ष घटित होते हैं तथा इन्हीं न्यादर्श आधारित निष्कर्षो के आधार पर जीवसंख्या अथवा समष्टि के विषय में उददेश्यों के अनुरूप सामान्यीकरण किया जाता है। इसके पीछे अवधारणा यह रहती है कि जो कुछ न्यादर्श के विषय में पाया गया है वो उस जीवसंख्या पर भी समान रूप से लागू होगा परन्तु यह बात सदैव सही नहीं होती यह तभी सम्भव है जब न्यादर्श का चयन वैज्ञानिक विधि से किया गया हो क्योंकि तभी चयनित न्यादर्श पूर्णरूप से प्रतिनिधि न्यादर्श (Representative Sample) होंगे। यदि इस विधि से न्यादर्श का चयन नहीं किया गया है तो वह जीवसंख्या का प्रतिनिधित्व नहीं करेगा और उस स्थिति में जो अध्ययनगत निष्कर्ष निकलेगा वह जीवसंख्या के विषय में सही नहीं होगा और ऐसा न्यादर्श अभिनत्यात्मक न्यादर्श (Biased Sample) कहा जाता है।


अभिनत्यात्मक न्यादर्श की स्थिति में जो सांख्यिकीय न्यादर्श प्राप्त होता है वह उस सांख्यिकीय मान से बहुत भिन्न होता है, जो सम्पूर्ण जीवसंख्या के अध्ययन पर उपलब्ध होता है। उदाहरण के लिये यदि कोई अध्ययन उत्तर प्रदेश के माध्यमिक स्तर में पढ़ने वाले छात्रों पर किया जाय और न्यादर्श के रूप में सिर्फ उन्हीं विद्यालयों को लिया जाय जो सिर्फ शहरों में स्थित है अर्थात गाँव एवं कस्बे के विद्यालयों को न लिया जाय, तो ऐसा न्यादर्श अभिनत्यात्मक न्यादर्श (biased sample) कहलायेगा और ऐसे प्रतिदर्श से प्राप्त निष्कर्ष को उत्तर प्रदेश के सभी माध्यमिक स्तर के विद्यालयों पर समान रूप से लागू नहीं किया जा सकेगा

क्योंकि इन पर आधारित मापांकों में स्थायी (fixed) अथवा स्थिर (Constant) त्रुटि ( error) का समावेश रहता है।



प्रतिनिधि न्यादर्श वह न्यादर्श होता है जिसमें समष्टि का प्रतिरूप अथवा उसकी प्रतिकति से सम्बन्धित सभी लक्षणों, गुणों एवं विशेषताओं आदि का न्यूनाधिक मात्रा में समावेश हो। यदि न्यादर्श का चयन समसम्भाविक विधि (Random Method) से किया जाता है तो उससे प्राप्त न्यादर्श प्रतिनिधि न्यादर्श होता है और ऐसे न्यादर्श पर आधारित जीवसंख्या से सम्बन्धित सांख्यिकीय मान का पूर्वानुमान (Prediction) अधिक सही सही किया जा सकता है। उसमें यदि त्रुटि की सम्भावना होती भी है तो उसका अनुमान लगाया जा सकता है।



प्रतिदर्श के प्रकार (Types of Sampling ) :



व्यवहारपरक शोधों में प्रयुक्त होने वाले प्रतिदर्शन या न्यादर्शन (Sampling) को मूलतः दो विस्तृत भागों में बाँटा जाता है इन दोनों तरह के प्रतिदर्शन परियोजनाओं (Sampling Plans) का वर्णन निम्नांकित है।

(अ) संभाविता प्रतिदर्शन (Probability Sampling)

(ब) असंभाविता प्रतिदर्शन (Non Probability Sampling)



संभावविता प्रतिदर्शन (Probability Sampling)



जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है संभावित प्रतिदर्शन वैसे प्रतिदर्शन परियोजना (Sampling Plan) को कहा जाता है जिसमें जीवसंख्या (Population के सदस्यों का प्रतिदर्शन (Sampling) में सम्मिलित किये जाने की संभावना (Probability ) ज्ञात होती है। आदर्शतः (ideally) संभाविता प्रतिदर्शन में शोधकर्ता ( researcher) निम्नांकित शर्तों से संतुष्ट होना आवश्यक है।



(i) जीवसंख्या जिससे प्रतिदर्श का चयन किया जाने वाला है, उसका आकार अवश्य ही ज्ञात होना चाहिये।

(ii) प्रतिदर्श की वांछित संख्या निर्दिष्ट हो तथा

(iii) जीवसंख्य के प्रत्येक सदस्य का प्रतिदर्श में सम्मिलित किये जाने की संभावना (Probability) हो।

उपरोक्त तीन शर्तों में से पहली और तीसरी शर्त कुछ ऐसी है कि कभी कभी शोधकर्ता उसे ठीक ढंग से पूर्ण नहीं कर पाता है। फिर भी संभाविता प्रतिदर्शन का एक धनात्मक गुण यह है कि इससे प्राप्त होने वाले प्रतिदर्श प्रतिनिधि त्व (representative) होते हैं। फलस्वरूप इने मिलने वाले निष्कर्ष (Conclusion) को काफी विश्वास के साथ उस जीवसंख्या (Population) जिससे प्रतिदर्श का चयन किया गया है तथा उस तरह की समान जीवसंख्या (Similar Population ) पर लागू किया जा सकता है।



संभाविता प्रतिदर्श के निम्नाकित तीन प्रमुख प्रकार है। -



(1) साधारण यादृच्छिक प्रतिदर्शन (Simple random sampling)

(ii) स्तरित यादृच्छिक प्रतिदर्शन (Stratified random sampling)

 (iii) क्षेत्र या गुच्छ प्रतिदर्शन (Area or cluster sampling)



असंभावविता प्रतिदर्शन (Non Probability Sampling )

असंभावित प्रतिदर्शन वैसी प्रतिदर्शन परियोजना है जिसमें जीवसंख्या के सदस्यों को प्रतिदर्श (Sample) में सम्मिलित किये जाने की संभावना ज्ञात नही होती है। इसके अलावा इस तरह के प्रतिदर्शन में शोधकर्ता जीवसंख्या को स्पष्ट पहचान करने की चिन्ता नहीं करता है और उसे अपनी आवश्यकतानुसार एवं इच्छानुसार कुछ सदस्यों का चयन कर प्रतिदर्शन में शामिल कर लेता है।



असंभाविता प्रतिदर्शन का सबसे प्रमुख लाभ यह है कि इसे कम समय, धन एवं श्रम के साथ सरलतापूर्वक तैयार किया जा सकता है। इसकी सबसे प्रमुख परिसीमा यह है कि इस प्रकार प्राप्त प्रतिदर्श अपनी जीवसंख्या का सही सही प्रतिनिधित्व नहीं कर पाते हैं। फलस्वरूप, इससे प्राप्त निष्कर्ष का सामान्यीकरण उस सम्पूर्ण जीवसंख्या या उससे मिलती जुलती जीवसंख्या की इकाइयों के लिये सही-सही ढंग से नहीं किया जा सकता है।



असंभाविता प्रतिदर्शन के मुख्य रूप से निम्नांकित प्रकार हैं।

(1) कोटा प्रतिदर्शन (Quota sampling)

(ii) आकस्मिक प्रतिदर्शन (Accidental or incidental sampling)

(iii) उद्देश्यपूर्ण प्रतिदर्शन (Purposive sampling)

(iv) क्रमबढ़ प्रतिदर्शन (Systematic sampling)

(v) हिमकंदुक प्रतिदर्शन (Snowball sampling)



(अ) संभावविता प्रतिदर्शन (Probability Sampling)

(i) साधारण यादृच्छिक प्रतिदर्शन (Simple random sampling)



साधारण यादच्छिक प्रतिदर्शन संभाविता प्रतिदर्शन का एक प्रमुख प्रकार है। इसमें जीवसंख्या के प्रत्येक सदस्य के प्रतिदर्श (Sample) में सम्मिलित किये जाने की संभावना बराबर होती है तथा किसी एक सदस्य का चयन दूसरे सदस्य के चयन को बाधित या प्रभावित नहीं करता है।

साधारण यादृच्छिक प्रतिदर्शन चूँकि सम्भाव्यता या संभाविता प्रतिदर्शन है। अतः इसमें न्यादर्श के चयन में मानव विवेक का स्थान नही होता है। अतः इस विधि में इकाइयों का चयन कुछ यांत्रिक या संयोगिक क्रिया द्वारा किया जाता है। साधारण यादच्छिक प्रतिदर्शन की मुख्यतः दो विधियां है



(1) लॉटरी विधि

 इस विधि में एक ही आकार की उतनी ही गोलियाँ या पर्चियाँ होती है जितनी जीवसंख्या में इकाइयाँ है और प्रत्येक गोली या पर्ची पर ढाँचे (frame) के अनुसार क्रमांक लिखे होते हैं। इन गोलियों या पर्चियों को फिर एक अर्ध गोलाकार बर्तन (bowl) में रखकर उसे अच्छी तरह हिला दिया जाता - है अब इसमे से यादच्छया किसी भी एक गोली / पर्ची का चयन किया जाता है। और फिर उस गोली पर ढाँचे की सहायता से लिखे गये क्रमांक की इकाई को न्यादर्श में सम्मिलित कर लिया जाता है और फिर बर्तन को हिला दिया जाता है इसी प्रकार से न्यादर्श के अनुसार, वांछित इकाइयों का चयन कर लिया जाता हैं।



( 2 ) यादृच्छिकी संख्या सारिणी विधि 

इस समसंभाविका संख्या तालिका भी कहते हैं इस विधि का प्रयोग वहाँ अधिक होता है जहाँ समष्टि का विस्तार अधि क हो तथा चयनित न्यादर्श का आकार भी बड़ा हो इसके लिये एक तालिका का प्रयोग करते हैं जो प्रायः सांख्यिकी की सभी पुस्तकों में उपलब्ध होती है। इस तालिका में जो संख्याएँ लिखी होती है उन्हें समसभाविक विधि द्वारा तैयार किया जाता है। वे अभिनतिमुक्त ( free from bias) होती है। ये संख्याएँ स्तम्भों में लिखी रहती है परंतु इन्हें पंक्तिवार, स्तम्भवार किसी प्रकार से भी प्रयोग में लाया जा सकता है। नीचे तालिका के एक छोटे अंश को प्रस्तुत किया गया है। -


तालिका का प्रयोग इस प्रकार से है। माना जीवसंख्या में कुल इकाइयों की संख्या 500 है जो सूचीबद्ध एवं क्रमांकित है। अब यदि इन 500 इकाइयों में से 12 इकाइयाँ चुननी है तो इसके लिये सबसे पहले आँख बंद करके किसी भी संख्या पर उंगली रख देते हैं। माना कि यह संख्या उपरोक्त तालिका के तीसरे स्तम्भ की तीसरी संख्या 19833 आयी हम इसे छोड़ देंगे क्योंकि इसके अंतिम तीन अंक 500 से ऊपर है। (यहाँ यह स्मरण रखना होगा कि हम तालिका संख्याओं के अन्तिम तीन अंकों का ही प्रयोग कर रहे हैं क्योंकि हमारी समष्टि संख्या भी तीन अंको की ही है। चूकि 833 अंक 500 से ऊपर है अतः हम इसका त्याग कर देगे। अब आगे चलते हैं तो क्रमशः 833, 958 और 565 अंक मिलते हैं इन्हें भी छोड़ देंगें। इनके आगे चलने पर अगला अंक 369 मिलता है चूँकि यह 500 से कम है। अतः इसे नोट कर लेगे। इस प्रकार हमें 369, 278, 297, 206, 283, 225, 292, 137 207 256 215, 32 से 12 संख्याये मिलेगी इन क्रमसंख्याओं वाली इकाइयों को हम सूची में से छाँटकर न्यादर्श तैयार कर लेंगे।


(ii) स्तरित यादृच्छिक प्रतिदर्शन (Simple random sampling)



किसी भी न्यादर्श को जीवसंख्या का प्रतिनिधित्व पर्याप्त रूप से करना। चाहिए। पर्याप्तता के लिये यह आवश्यक है कि न्यादर्श का मानक विचलन या अन्य विचलन कम हो। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए तथा अन्य कई कारणों से जीवसंख्या को कभी कभी कमवायी स्तरों में विभाजित कर दिया जाता है। इसके लिये प्रत्येक स्तर में पड़ने वाली इकाइयों का ढाँचा तैयार करते हैं और उन भिन्न स्तरों के ढाँचे मे से इकाइयों को यादच्छिकी न्यादर्शन विधि से चुन लेते हैं। इस विधि को स्तरीकप्त यादर्षच्छक प्रतिदर्शन कहते है।



अब इस प्रतिदर्शन में स्तरीकरण करने की आवश्यकता क्यों और क्या यह जानना भी आवश्यक है। जीवसंख्या को स्तरीकप्त करने के चार मुख्य कारण है:

(1) कभी कभी भिन्न-भिन्न स्तर की जीवसंख्याओं के लिये समष्टियों के ज्ञान की आवश्यकता होती है। उदाहरण के लिये बुद्धि मापन में हम पुरूषों एवं स्त्रियों या शहरी/ग्रामीण क्षेत्र के लिये अलग-अलग माध्य बुद्धि-लब्धि ज्ञात करना चाहते हैं। ऐसी स्थिति में सम्पूर्ण जीवसंख्या को स्त्री-पुरुष एवं ग्रामीण शहरी चार स्तरों में विभाजित कर देंगे, जैसे


(2) प्रशासनिक सुविधा के लिए भी स्तरीकरण किया जाता है। जब स्तर समवायी होते हैं तो उनका सर्वेक्षण करने के लिये उचित व्यक्तियों को ढूंढा जा सकता है। उदाहरण के लिये एक ही व्यक्ति नगर के धनी-वर्ग और गाँव की सामान्य जनता का साक्षात्कार नहीं कर सकता है। भाषा, संस्कृति, पष्ठभूमि एवं अनुभव विचार विनमय में बाधक होते हैं।


(3) न्यादर्श में प्रतिनिधित्व होने की सम्भावना अधिक प्रतीत होती है।



(4) न्यादर्श अथवा प्रतिदर्श की इकाइयों के मान का प्रसार (dispersion) कम हो जाता है जिससे मानक त्रुटि कम हो जाती है और छोटे न्यादर्श से अनुमान में वही दक्षता प्राप्त होती है जो सरल यादपच्छिकी प्रतिदर्शन में बड़े न्यादर्श से यह स्तरीकरण का सबसे बड़ा उपयोग है। क्योंकि यदि स्तरीकरण से जनसंख्या समवायी उपसमूहों में विभक्त नहीं होता है तो स्तरीकरण करना निरर्थक होता है।



स्तरीकरण का आधार स्तरीकरण का मुख्य उद्देश्य जनसंख्या को ऐसे उपसमूहों में विभाजित करना है कि प्रत्येक उपसमूह में चर का प्रसार कम हो अथात इकाइयाँ समवायी हों। अब हमें चर के मान का वितरण पहले से ज्ञात नहीं होता है। ऐसी अवस्था में स्तरीकरण हमें किसी दूसरे ऐसे चर के आधार पर करना चाहिए जो अभीष्ट चर से सम्बन्धित हो उदाहरण के लिये बालकों की उपलब्धि का परीक्षण उनकी बुद्धिलब्धि के स्तरीकरण के आधार पर किया जा सकता है क्योंकि उपलब्धि एवं बुद्धि लब्धि में उच्च सहसम्बन्ध होता है। कभी कभी दो चरों जैसे- ग्रामीण / शहरी स्त्री / पुरुष आदि के आधार पर भी किया जा सकता है।



स्तरीकृत यादषच्छकी प्रतिदर्शन के निम्न तीन प्रकार है


( अ ) समानुपाती (Proportionate) - इसमें किसी स्तर से लिये गये प्रतिदर्श में इकाइयों की संख्या उसी अनुपात में होती है जिसमें उस स्तर में जीवसंख्या की कुल इकाइयाँ जैसे यदि किसी जीवसंख्या के स्तर क, , ग में क्रमशः 400, 500 600 इकाइयाँ है तो न्यादर्श में तीन स्तरों से इकाइयाँ क्रमश: 4:56 के अनुपात में होगी।


(ब) असमानुपाती (Disproportionate) - इसमें इकाइयाँ निश्चित अनुपात में नहीं होती है किंतु उचित सांख्यिकीय सूत्रों की सहायता से शुद्ध परिणाम निकालने का प्रयास किया जाता है।


(स) महत्तम विभाजन (Maximum Allocation ) - इसमें प्रत्येक स्तर से चुनी गयी इकाइयों की संख्या उस स्तर में जनसंख्या की संख्या और उस स्तर के मानक विचलन पर निर्भर होती है। यही सबसे उपयुक्त विधि है।



(iii) क्षेत्र या गुच्छ प्रतिदर्शन (Area or Cluster Sampling)



कभी-कभी प्रतिदर्श की इकाइयाँ चर की प्राकृतिक इकाइयाँ न होकर उनके स्वभाविक समूह या गुच्छे (Cluster) होते हैं। प्रतिदर्शन की इस विधि में गुच्छों का ही ढाँचा बनाया जाता है और इस ढाँचे में से यादच्छिकी प्रतिदर्श चुना जाता है। तत्पश्चात गुच्छों में पड़ने वाली प्रत्येक इकाई का अध्ययन किया जाता है यदि इकाइयाँ आवश्यकता से अधिक हैं तो आवश्यक इकाइयों का चयन यादच्छिकी विधि द्वारा कर लिया जाता है। इसे उपप्रतिदर्शन (Sub-sampling) कहते है।



उदाहरण के लिये यदि किसी नगर के कक्षा 10 में पढ़ने वाले विद्यार्थियों पर कोई अध्ययन किया जाना है तो कक्षा 10 तक के सभी विद्यालय इस अध्ययन की इकाई अथवा जीवसंख्या होगें। अब इन सभी विद्यालयों में से कुछ विद्यालयों का यदृच्छया चयन करके उनकी कक्षा 10 की क्लासों का भी यदच्छया चयन कर लिया जायेगा अब प्राप्त कक्षायें जो कि अलग-अलग गुच्छ के रूप में होगी, में इन सभी गुच्छों के समस्त छात्रों को अध्ययन के लिये प्रतिदर्श के रूप में चुन लिया जायेगा । और यदि ये प्रतिदर्श अपेक्षित प्रतिदर्श से अधिक है तो इन्हीं गुच्छो में से पुनः यादृच्छिक रूप से वाक्षित प्रतिदर्श प्राप्त कर लिया जायेगा।



प्रतिदर्शन की यह विधि तब अधिक लाभदायक है जब इकाई तक पहुँचने का व्यय अधिक एवं इकाई के अध्ययन का व्यय कम होता है।



(ब) असंभावविता प्रतिदर्शन (Non Probability Sampling) 

(i) कोटा प्रतिदर्शन / प्रतिचयन (Quota Sampling)


कोटा प्रतिदर्शन जिसे अंश न्यादर्शन भी कहते हैं, में जीवसंख्या का स्तरीकरण उसी प्रकार किया जाता है, जैसे कि स्तरीकृत यादृच्छिकी प्रतिदर्शन (Straitified Random Sampling) में किन्तु इस विधि में शोधकर्ता प्रत्येक स्तर से कोटा अथवा अंश में इकाइयों का चयन अपने विवेक से करता है।

(ii) आकस्मिक प्रतिदर्शन / प्रतिचयन (Accidental or Incidental Sampling)


आकस्मिक प्रतिदर्शन में जीवसंख्या से सम्बन्धित जो कोई भी इकाई सुविधापूर्वक उपलब्ध होती है, उसका प्रतिचयन कर लिया जाता है। यहाँ शोधकर्ता की सुविधा को ध्यान में रखा जाता है।


(iii) उद्देश्यपूर्ण प्रतिदर्शन / प्रतिचयन (Purposive Sampling)

उद्देश्यपूर्ण अथवा सोद्देश्य प्रतिदर्शन में शोधकर्ता जीवसंख्या के उस समूह की इकाइयों का चयन करता है जिसे वह पूर्वज्ञान के आधार पर उस जीवसंख्या का प्रतिनिधि समझता है।



(iv) क्रमबद्ध प्रतिदर्शन / प्रतिय - (Systematic Sampling)

क्रमबद्ध प्रतिदर्शन (Systematic Sampling) एक ऐसी प्रतिदर्शन परियोजना है जिसमें यादच्छिकीकरण (Ramdomness ) का कुछ गुण होता है। और साथ ही साथ इसमें असंभाविता गुण (Non-probability trait) भी होते हैं। ब्लैक तथा चैम्पियन (Black and Champion 1977) अनुसार एक ऐसी के प्रतिदर्शन परियोजना जिसमें यादष्च्छीकरण के गुण हो तथा साथ ही साथ असंभाविता शीलगुण भी उनमें मौजूद हो, उसे क्रमबद्ध प्रतिदर्शन परियोजना कहा जाता है। क्रमबद्ध प्रतिदर्शन व्यक्तियों की पूर्वनिर्धारित सूची से प्रत्येक (nth) nवाँ व्यक्ति को चयन करते हुए उनका एक समूह तैयार करने की प्रक्रिया को कहा जाता है।"

उदाहरण के लिये यदि किसी फैक्ट्री में कार्यरत 1000 कर्मचारियों पर कोई सर्वेक्षण करना है तो इन कर्मचारियों की एक सूची प्राप्त कर ली जायेगी और इसमें किसी भी एक कर्मचारी का यदच्छया चयन कर लिया जायेगा माना ये कर्मचारी सूची क्रम में वाँ है तो प्रतिदर्श में इसका चयन करने बाद हर 5वाँ या 10वाँ व्यक्ति शामिल कर वांछित न्यादर्श प्राप्त कर लिया जायेगा ।



(v) हिमकंदुक प्रतिदर्शन / प्रतिचयन (Snowball Sampling) हिमकंदुक प्रतिदर्शन एक ऐसा असंभाविता प्रतिदर्शन है जिसका प्रयोग शोधकर्ता उस परिस्थिति में करता है जब वह व्यक्तियों के बीच अनौपचारिक सामाजिक सम्बन्धों का अध्ययन करना चाहता है। हिमकंदुक प्रतिदर्शन को परिभाषित करते हुए यह कहा जा सकता है कि यह प्रतिदर्शन की एक ऐसी विधि हे जिसमें किसी सीमित समूह या संगठन में सभी सदस्यों को अपने अपने दोस्तों एवं साथियों ( associates) की पहचान करने को कहा जाता है और इस प्रकार से शोधककर्ता के समक्ष परिचितों का एक समूह उभर कर सामने आता है जिससे उसे उस समूह के पूर्व सामाजिक पैटर्न (तरीकों / प्रारूप) का पता चल जाता है। इस तरह के प्रतिदर्शन में कुछ खास खास व्यवहार को जैसे दोस्ताना सम्बन्ध को आधार बनाया जाता है। मूलतः हिमकंदुक प्रतिदर्शन का स्वरूप समाजमितीय पर आधारित होता है। इसमें प्रत्येक व्यक्ति को यह बताना अनिवार्य होता है कि वो सम्बन्धित जानकारी / सूचना को कहाँ से प्राप्त करते हैं ? इससे शोधकर्ता को एक परस्पर अन्तः क्रिया का पैटर्न पता चल जाता है।



प्रतिदर्श में ध्यान रखने योग्य बातें :

जब कोई शोधकर्ता यह निर्णय करने की स्थिति में होता है कि उसे अपने अध्ययन के लिये प्रतिदर्श का चयन करना है तो उसे निम्न कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिये

 जीवसंख्या का आकार

यदि जीवसंख्या का आकार छोटा है तो ऐसी स्थिति में शोधकर्ता सभी सदस्यों को अपने अध्ययन में शामिल कर सकता है। परंतु यदि जीवसंख्या का आकार बड़ा है तो जैसे उसके सदस्यों की संख्या 10,000 या उससे अधिक है। तो शोधकर्ता उस जीवसंख्या से अपने अध्ययन के लिये एक उपयुक्त (appropriate) आकार का प्रतिदर्श का चयन कर ले ये एक बेहतर विकल्प है। अतः स्पष्ट है। कि जब जीवसंख्या का आकार बड़ा होता है केवल तभी प्रतिदर्शन की आवश्यकता होती है। 



 प्रतिदर्शन की लागत (Cost of Sampling) -

प्रतिदर्शन किया जाय या नहीं या फिर यदि किया जाय तो प्रतिदर्श में कितने सदस्य होगें, यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि इन सभी प्रक्रियाओं का खर्च कितना आयेगा और वह शोधकर्ता के बजट के अनुरूप है या नहीं। परन्तु यदि ऐसा नहीं है, तो शोधकर्ता को उसी के अनुसार प्रतिदर्शन परियोजना ( Sampling Plan) में परिवर्तन करना पड़ता है।



3. जीवसंख्या के सदस्यों की उपलब्धता (Accessibility of Members of Population) -


प्रतिदर्शन में सम्मिलित प्रतिदर्श को जीवसंख्या से आसानी से प्राप्त किया जा सके इस बात का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है। यदि वे शोधकर्ता के लिये दुर्लभ है, तो वैसी परिस्थिति में उन्हें प्रतिदर्श में सम्मिलित नहीं किया जा सकता है और ऐसी स्थिति में शोधकर्ता को अपनी विशेष परियोजना (Planning) में परिवर्तन करना पड़ता है।


स्पष्ट है कि प्रतिदर्शन करते समय यदि उपरोक्त बातों को ध्यान में रखा जाए तो इससे प्रतिदर्शन का स्वरूप अधिक शोधनीय (researchable) होगा।


प्रतिदर्श के उपयोग (Use of Sampling) :

प्रतिदर्शन की आवश्यकता अथवा उपयोग के कुछ मुख्य कारण निम्नवत


 खर्च में कमी -

प्रतिदर्श का उपयोग सर्वेक्षणों में अधिक होता है जहाँ सीमित, धन, समय, व्यक्तियों एव साधनों से एक जनसंख्या के विषय में किसी चर का मान प्रस्तुत करना पड़ता है, वहाँ यदि सभी इकाइयों का सर्वेक्षण किया जाये तो सीमित साध न से सीमित समय में काम सम्पन्न नहीं होगा।


 दक्षता में वृद्धि

परिणाम एवं उनको प्राप्त करने के लिये किये गये व्यय के अनुपात को दक्षता कहते हैं। यदि सभी इकाइयों का अध्ययन न करने से परिणाम में कुछ त्रुटि रह गयी तो भी व्यय में अधिक कमी हो जाने के कारण सर्वेक्षण की दक्षता बढ़ जाती है।


परिणाम की शुद्धता

परिणाम की शुद्धता परिणाम प्राप्त करने में लगी हुई जनशक्ति की कुशलता पर निर्भर है। सभी इकाइयों का अध्ययन करने के लिये अधिक व्यक्तियों की आवश्यकता होगी जिन्हें सीमित साधनों से प्राप्त नही किया जा सकता और यदि सर्वेक्षण दोषपूर्ण हुआ तो अधिक इकाइयों के अध्ययन से त्रुटि में विस्तार ही होगा।


एक उत्तम प्रतिदर्श के अपेक्षित गुण (Requisites of a Good Sampling Method):

किसी प्रतिदर्शन विधि को एक उत्तम प्रतिदर्शन विधि कहलाने के लिये यह आवश्यक है कि उसमें अन्य बातों के अलावा निम्न दो गुण अवश्य हो



प्रतिनिधित्वता (Representativeness ) -

किसी भी प्रतिदर्शन प्रविधि का एक प्रमुख अपेक्षित गुण यह है कि उससे तैयार किया गया प्रतिदर्श का स्वरूप प्रतिनिधिक (reprsentative) हो। एक प्रतिनिधिक प्रतिदर्श से तात्पर्य वैसे प्रतिदश से होता है जिनमें उन सभी गुण या विशेषताओं की झलक मिलती है तो उस जीवसंख्या में होते हैं जिनमें उनका चयन किया गया था।



 पर्याप्तता

एक उत्ततम प्रतिदर्शन की एक विशेषता यह भी है कि उसका आकार ( size) पर्याप्त हो । आकार पर्याप्त (adequate) होने से तात्पर्य यह है कि उसमें विशेषताओं की संख्या यथासम्भव अधिक हो । प्रतिदर्श का आकार बड़ा रहने से प्रतिदर्श त्रुटि (Sample Error) की संभावना कम हो जाती है। अध्ययनों से यह स्पष्ट हो गया है कि प्रतिदर्श के आकार तथा प्रतिदर्शन त्रुटि में नकारात्मक सम्बन्ध (Negative Relationship) होता है। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि जैसे जैसे प्रतिदर्श का आकार बढ़ता जाता है वैसे वैसे त्रुटि की संख्या कम होती जाती है।



प्रतिदर्श को दोषपूर्ण बनाने वाले घटक (Factors Making Defective Sample) :


प्रतिदर्श से प्राप्त वर्णनात्मक सांख्यिकी (descriptive statistic) का समष्टिज (Parameter) से महत्वपूर्ण रूप से भिन्न होना दोष है। इस दोष के दो कारण होते हैं:



(अ) प्रतिदर्शीय त्रुटि (Sampling Error) और

(ब) अप्रतिदर्शीय त्रुटि (Non Sampling Error)


प्रतिदर्शीय त्रुटि ( Sampling Error) -

यह त्रुटि प्रतिदर्शन के कारण उत्पन्न होती हैं। संभाव्यता प्रतिदर्शन (Probability Sampling) में इसे सांख्यिकी की सहायता से अनुमानित किया जा सकता है। अतः यह त्रुटि चिन्ताजनक नहीं है।



अप्रतिदर्शीय त्रुटि (Non Sampling Error)

यह त्रुटि पक्षपात पूर्ण प्रतिदर्शन (biased Sampling) के कारण उत्पन्न होती है। दूसरे स्थान पर अप्रतिदर्शीय त्रुटि का कारण मापन में की जाने वाली त्रुटि से है। यह त्रुटि मापने के लिये प्रयुक्त उपकरण में विश्वसनीयता एवं वैद्यता की कमी के कारण हो सकती है। इसके अतिरिक्त अप्रतिदर्शीय त्रुटि का तीसरा कारण आँकड़ों को लिखने व्यवस्थित करने एवं विश्लेषित करने में हुयी त्रुटि कमी से है। कभी-कभी हम ऑकड़ो का ठीक से सम्पादन नहीं कर पाते जिससे परिणाम दोषपूर्ण हो जाते हैं।



स्पष्ट है कि अनुसन्धान में प्रतिदर्शन बहुत ही महत्वपूर्ण चरण है। क्योंकि इसी प्रक्रिया पर शोध के परिणाम की शुद्धता एवं व्यापकता निर्भर होती है अतः इसे अत्यन्त सावधानी के साथ किया जाना परमावश्यक है।

 सारांश :

जीवसंख्या से तात्पर्य व्यक्तियों की ऐसी संख्याओं के संग्रहण से होता है जिसे किसी विशेषता या गुण के आधार परिभाषित किया गया हो। यह परिमित भी हो सकती है एवं अपरिमित भी पूरी जीवसंख्या के अध्ययन से प्राप्त मान को प्राचल (Parameter) कहा जाता है। शोधकर्ता सामान्यतः पूरी जनसंख्या का अध्ययन नहीं करता बल्कि उससे कुछ इकाइयों का चयन करके उनका ही अध्ययन करता है। चयनित इकाइयों के प्रतिदर्श एवं चयन की इस प्रक्रिया को प्रतिदर्शन कहते हैं। प्रतिदर्श के आधार पर प्राप्त मान को सांख्यिकी (Statistics) कहा जाता है।

प्रतिदर्शन के मुख्य दो प्रकार हैं।

संभाविता प्रतिदर्शन एवं असंभाविता प्रतिदर्शन


संभाविता प्रतिदर्शन के मुख्य तीन प्रकार है-

साधारण यादच्छिक प्रतिदर्शन

गुच्छ प्रतिदर्शन एवं

स्तरित यादच्छिक प्रतिदर्शन।


असंभाविता प्रतिदर्शन के भी कई प्रकार है, जिसमें 

कोटा प्रतिदर्शन

उद्देश्यपूर्ण प्रतिदर्शन

क्रमबद्ध प्रतिदर्शन आदि प्रमुख हैं।


प्रतिदर्शन में ध्यान रखने योग्य बातें जैसे जीवसंख्या का आकार प्रतिदर्शन की लागत एवं जीवसंख्या में सदस्यों की उपलब्धता के साथ साथ प्रतिदर्शन के उपयोग यथा खर्च में कमी दक्षता में वर्षद्धि, परिणाम की शुद्धता पर भी चर्चा की गयी है।


एक उत्तम प्रतिदर्शन के अपेक्षित गुण प्रतिनिधित्वा एंव पर्याप्तता पर भी प्रकाश डाला गया है और प्रतिदर्श को दोषपूर्ण बनाने वाले घटक प्रतिदर्शीय एवं अप्रतिदर्शीय त्रुटि के बारे में भी समुचित जानकारी दी गयी है।