चयनित समस्या का मूल्यांकन (Evaluation of Selected Problem)

चयनित समस्या का मूल्यांकन (Evaluation of Selected Problem)

शोध हेतु समस्या को अन्तिम रूप देने से पहले उसकी उपयुक्तता (suitability) पर गम्भीरतापूर्वक विचार किया जाता है। इसे समस्या का मूल्यांकन (evaluation of the problem) कहते हैं। इसके अन्तर्गत यह विचार किया जाता है कि समस्या शोध हेतु अच्छी रहेगी अथवा नहीं कोई समस्या कब अच्छी अथवा उपयुक्त समझी जाती है, इसकी एक कसौटी (criterion) होती है, जिसके अन्तर्गत कई बिंदु आते हैं। उन सभी बिंदुओं के दृष्टिकोणों से यदि समस्या उपयुक्त ठहरती है, तभी उसे अच्छा समझा जाता है तथा अन्तिम रूप से उसका चयन किया जाता है। 


फ्रांसिस रूमेल के अनुसार, इस कसौटी के बिंदु अथवा उपयुक्त समस्या की चार विशेषताएँ हैं-


(i) शोधकर्ता की उस समस्या में रुचि होना, 


(ii) शोधकर्ता में वे सब योग्यताएँ होना जो उस पर शोध करने के लिए आवश्यक हैं।


(iii) समस्या का महत्त्वपूर्ण होना तथा 


(iv) समस्या संबंधी जानकारी सूचनाओं तथा दत्तों के उपलब्ध होने की संभावना होना। 


मौलि ने निम्नलिखित पांच बिन्दुओं का वर्णन किया है -






1. समस्या शोधकर्ता की रुचि के अनुकूल होनी चाहिएः 


परन्तु इसका यह अर्थ नहीं समझना चाहिए कि रुचि के अनुकूल समस्या न होने पर उस पर शोध किया ही नहीं जा सकता। यदि समस्या रुचि के अनुकूल है तो बहुत अच्छा है, परन्तु यदि समस्या महत्त्वपूर्ण है तो रुचि के अभाव में भी उसे चुना जा सकता है। उसके संबंध में अध्ययन करने, अधिक जानकारी प्राप्त कर लेने तथा कार्य के आगे बढ़ने के पश्चात् रुचि भी विकसित हो जाती है। 


2. समस्या मौलिक होनी चाहिए:  


इसका अर्थ है कि समस्या ऐसी हो कि उस पर पहले उसी प्रकार का शोध कार्य न हो जिन प्रश्नों के उत्तर अनुसंधान द्वारा प्राप्त किए जा चुके हैं, उन्हें प्राप्त करने से कोई लाभ नहीं, परन्तु यदि पहले किए गए अनुसंधानों के परिणाम संदिग्ध प्रतीत होते हैं अथवा उनकी शोध प्रक्रिया त्रुटिपूर्ण पाई जाती है अथवा उनमें समाविष्ट चरों में परिवर्तन करके अनुसंधान किया जाता है तो उसे भी मौलिकता की परिधि के अन्तर्गत रखा जा सकता है।









3. समस्या शोध-संभव (Amenable to Research) होनी चाहिए 


इसका अर्थ है कि समस्या ऐसी हो कि जिस पर अनुसंधान करना संभव हो, उसके चरों (variables) का मापन किया जा सके, उसके विषय में आवश्यक एवं वांछनीय जानकारी प्राप्त की जा सके, उपलब्ध जानकारी का विश्लेषण किया जा सके आदि। यदि किसी कारण ऐसा संभव न हो तो उस समस्या को शोध हेतु उपयुक्त नहीं समझा जाता।


4. समस्या महत्त्वपूर्ण होनी चाहिएः 


प्रत्येक अनुसंधान का उद्देश्य होता है संबंधित क्षेत्र में ज्ञान की वृद्धि करना, अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर उपलब्ध कराना, पूर्वस्थापित मान्यताओं एवं सिद्धांतों का सत्यापन एवं परीक्षण करना, समस्याओं के समाधान खोजना आदि, परन्तु किसी अनुसंधान के द्वारा यदि इनमें से किसी भी उद्देश्य की पूर्ति नहीं होती तो उसे महत्त्वपूर्ण नहीं समझा जाता अनेक बार शोध समस्याएँ तुच्छ (trivial) एवं निरर्थक होती हैं। वोल्फले तथा कई अन्य लेखकों ने इस प्रकार की समस्याओं को लेकर अनुसंधान की तीखी निंदा की है। एन.सी. ई.आर.टी. (नई दिल्ली) के तृतीय (1986) एवं चतुर्थ (1991) शिक्षा अनुसंधान सर्वेक्षणों में भी इसी प्रकार की आलोचना की गई है। अनुसंधान की महत्त्वपूर्ण समस्याएँ वे समझी जाती हैं, जिनके द्वारा उपरोक्त उद्देश्यों की पूर्ति होती है तथा जिनके परिणाम संबंधित क्षेत्र की वर्तमान प्रक्रियाओं, प्रथाओं, विधियों, तकनीकों, काम के ढंगों आदि को उन्नत बनाने में सहायक होते हैं। जिस अनुसंधान के परिणामों की कोई उपयोगिता न हो, वह महत्त्वहीन है। 







5. समस्या शोधकर्त्ता की योग्यता एवं क्षमताओं के अनुकूल होनी चाहिए


कोई समस्या अत्यंत महत्त्वपूर्ण एवं मौलिक हो सकती है, परन्तु यदि शोधकर्ता में वे सब योग्यताएँ एवं क्षमताएँ नहीं हैं, जो उस अनुसंधान को पूरा करने के लिए आवश्यक हैं तो उस समस्या को उस शोधकर्ता के लिए उपयुक्त नहीं कहा जा सकता। यह अत्यन्त आवश्यक है कि शोधकर्ता को उस समस्या से संबंधित तथ्यों, संकल्पनाओं, सिद्धांतों (theories) आदि की अच्छी जानकारी हो। यह भी आवश्यक है कि उसमें संबंधित साहित्य, अनुसंधान की रिपोर्टो जर्नल आदि को पढ़ने एवं समझने की योग्यता हो। साथ ही अनुसंधान की तकनीकों, मनोवैज्ञानिक परीक्षणों के निर्माण, उनके प्रशासन आदि का भी उसे अच्छा ज्ञान होना चाहिए। शोध सामग्री के सांख्यिकीय विश्लेषण की विधियों की भी उसे अच्छी जानकारी होनी चाहिए। यदि समस्या ऐसी है कि उस पर अनुसंधान हेतु इन योग्यताओं की आवश्यकता है और शोधकर्ता में इनका अभाव है तो वह समस्या उसके लिए उपयुक्त नहीं हो सकती हैं।


उपरोक्त बिन्दु एक उपयुक्त एवं अच्छी समस्या की कसौटी प्रस्तुत करते हैं तथा शोध समस्या के मूल्यांकन का आधार समझे जाते हैं। इन्हीं सब बिन्दुओं को वान डालेन ने व्यक्तिगत बिन्दु (personal consideration) तथा सामाजिक बिन्दु (social consideration) इन दो शीर्षकों के अन्तर्गत रखा है।