सतत विकास एवं आर्थिक विकास व पर्यावरण - Sustainable Development and Economic Development and Environment

सतत विकास एवं आर्थिक विकास व पर्यावरण - Sustainable Development and Economic Development and Environment

सतत विकास एवं आर्थिक विकास सतत विकास का तात्पर्य केवल पर्यावरण का संरक्षण करना ही नहीं बल्कि इसने विकास एवं वृद्धि की नवीन अवधारणा को उत्पन्न किया है। यह विश्व के सीमित प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट किये बगैर तथा विश्व की धारणीयता क्षमता के साथ समझौता किये बगैर यह केवल विशेष लोगों को अधिकार नहीं देता हैं बल्कि सभी के लिए निष्पक्ष एवं समान अवसर प्रदान करता है। सतत विकास एक प्रक्रिया है जिसमें आर्थिक राजस्व संबंधी व्यवसाय, कृषि तथा औद्योगिक नीतियों को इस प्रकार निर्मित करने की कोशिश की जाती है जिससे विकास को सामाजिक, आर्थिक तथा परिस्थितिकीय रूप से संतुलित किया जा सके तथा इन संसाधनों की अक्षयता भी बनी रहे। इसका यह भी अर्थ है कि वर्तमान जनसंख्या की शिक्षा तथा स्वास्थ्य के लिए पर्याप्त निवेश भी किया जाना चाहिए तथा संसाधनों का प्रयोग ऐसे ढंग से किया जाना चाहिए कि पृथ्वी की धारण करने तथा उत्पद्रक क्षमता के अत्यधिक दोहन द्वारा पारिस्थितिकीय असंतुलन न पैदा हो।







सतत विकास एवं पर्यावरण


सतत विकास अर्द्धविकसित देशों के लिए अत्यधिक अनिवार्य है। विकास की गतिशील प्रक्रिया के रूप में इसको देखा जाता है। सतत विकास प्रकृति के साथ तटस्थ तथा स्वप्रेरित होता है। सतत विकास को और अधिक समुचित रूप से कहा जाए तो इसे आर्थिक वृद्धि प्राप्तकरने हेतु संरक्षण से युक्त एक प्रगति के रूप में देखा जा सकता है। पर्यावरणीय अर्थशास्त्र को एक ऐसे अध्ययन के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जो संसाधनों को उनके एक के बाद एक के उपयोग के बीच इस ढंग से बँटवारा या स्थान का निर्धारण करना सम्मिलित होता है ताकि पर्यावरण के प्रति प्राकृतिक संसाधनों के अवशिष्ट पदार्थों के विसर्जन करने में कमी आती है जिसके फलस्वरूप कल्याण में वृद्धि होती है।





पर्यावरण अर्थव्यवस्था के लिए उर्जा तथा वस्तुओं एवं सुख की अनुभूतियों के लिए अपरिष्कृ प्रकृति प्रदान करता है। इस प्रणाली को पारिस्थितिक तंत्र कहा जाता है।