उपनिवेशी काल में समाज कार्य - Social Work in Colonial Period

उपनिवेशी काल में समाज कार्य - Social Work in Colonial Period

उपनिवेशी अवधि देश के जीवन में पूरी तरह से नई प्रावस्थाको निरूपित करती है। पहले भी आक्रमण कारी और विजेता होते थे, परंतु वे शीघ्र ही देश के मूल निवासियों की भाँतिरच-बस जाते थे। समय के अंतराल में राजनीतिक केंद्र में सरकारें बदल जाती थी, जिसका प्रभाव समाज (विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में) पर नहीं होता था। उपनिवेशी शासक इस संबंध में भिन्न वे और उनके साथ विभिन्न प्रकार की नई सामाजिक शक्तियों जैसे धर्म, प्रौद्योगिकी शिक्षा कानून और न्यायिक प्रशासन की प्रणाली आदि आई। भारत में उपनिवेशी युग 15 वीं शताब्दी के अंत में प्रारंभ हुआ जब पुर्तगाली नाविक वास्को डी गामा ने गोवा में व्यापार स्थापित किया। यूरोपीय शक्तियों के बीच प्रतिद्वंद्विता ने डचोंका प्रवेश संभव किया।

बाद में ब्रिटिश और फ्रां सिसियों ने भी 16 वीं शताब्दी के प्रारंभ में यहाँ व्यापार स्थापित किया। उपनिवेशी राज्य का मुख्य ध्यान, उपनिवेशी राज्य क्षेत्र का विस्तार करना और उसे बनाए रखना था। उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में राजस्व संग्रह और कानून तथा व्यवस्था बनाए रखने के अलावा प्रशासन ने अन्य पहलुओं परभी उपनिवेशी राज्य ने कुछ ध्यान देना शुरू किया। 1770 और 1860 के बीच उपनिवेशी भारत में कई अकाल पड़े। अकाल की समस्या से निपटने के लिए। कोई निश्चित नीति नहीं थी सम्राट के शासन (1890-1909) के पहले वर्षों के दौरान किए गए बहुत से प्रयोग बहुत असफल सिद्ध हुए। इंग्लैंड में एलिजावेथ के शासन काल में 1601 ई. में आई पुअर लॉ (Poor Laws) के अनुभव से उपनिवेशी राज्य ने अपनी अकाल राहत नीति बनाई। इसमें प्रावधान किया गया कि जरूरतमंदों को आवश्यक सहायता की सबसे बड़ी राशि दी जाए जो उस पर अनावश्यक निर्भरता को कम कम बढ़ावा देता है।

इस नीति में 1861 में थोड़ा-सा संशोधन किया गया जब राज्य ने अकाल के दौरान निराश्रतों को खाना खिलाने के व्यय पूर्ति के लिए निजी एजेन्सियों को अनुदान देने का निर्णय किया। बार-बार होने वाली अकाल की घटना की गंभीरता ने उपनिवेशी राज्य को 1880 में अकाल आयोग नियुक्त करने के लिए विवश किया। बाद में 1883 में अकाल संहिता तैयार की गई।अकाल राहत, बीमा और कृषि पर निर्भर रहने वाले अधिशेष आबादी के लिए रोजगार के वैकल्पिक स्रोतों के लिए आयोग की सिफारिशों के बावजूद प्रशासक समस्या का समाधान करने में इच्छुक नहीं थे। 1885 में एक कानून पास किया गया जिसके अनुसार यदि काश्तकार के पास जमीन 12 वर्ष तक रही है। में तो उसे उस पर कब्जा करने का अधिकार होगा।

लॉर्ड कर्जन के कार्यकाल के दौरान रॉयल कृषि संस्थान की स्थापना हुई। इसमें उन्नत प्रशिक्षण, अनुसंधान और प्रयोगात्मक कृषि की सुविधाओं की व्यवस्था की गई। देश के भिन्न-भिन्न भागों में कुछ कृषि स्कूल और कालेज भी स्थापित किए गए। में भारत में पहली रेलवे लाइन बनाने का श्रेय लॉर्ड डलहौजी (Lord Dalhousic) को जाता है। मुंबई और ठाणे को जोड़ने वाली पहली रेलवे लाइन 1853 में शुरू की गई थी। आगामी वर्षों में कलकत्ता को रानीगंज के कोयला क्षेत्रों से और मुंबई को कल्याण से जोड़ा गया। 1856 में एक अन्य लाइन एसकोनम में (Arakonam) से मद्रास को मिलाने के लिए शुरू की गई। उपनिवेशी राज्य सम्पूर्ण भारत को अपने नियंत्रण में लेने के लिए सम्पूर्ण देश में एक समान कानून और प्रशासन स्थापित करना चाहता था। इससे देश में राजनीतिक एकता का निर्माण हुआ। अब क्षेत्रीय राज्यों की अवधारणा का कोई महत्व नहीं था। लोगों ने अपने एक ही देश के भाग के रूप में देखा।


भिन्न भिन्न क्षेत्रों के बीच परिवहन और संचार इस प्रक्रिया में सहायक हुआ। लोगों ने यात्रा की डझक और तार प्रणाली के माध्यम से सूचना का आदान प्रदान किया और यह क्षेत्रों के बीच नेटवर्क स्थापित करने में सहायक हुआ। शिक्षा वह सबसे प्रमुख क्षेत्र था, अहाँ राज्य ने पहल शुरू की थी। 1813 के चार्टर अधिनियम द्वारा कंपनी प्रशासन को भारत की शिक्षा का उत्तरदायित्व दिया गया। 1833 तक शिक्षा अनुदान जो 1813 के चार्टर अधिनियम के अधीन एक लाख रुपये था, प्रतिवर्ष दस लाख तक बढ़ गया। 1835 में गवर्नर जनरल विलियम बैंटिक ने भारत में पश्चिमी शिक्षा लाने का निर्णय किया। 1844 में अंग्रेजीराजभाषा बनी और यह घोषणा की गई कि अंग्रेजी का ज्ञान रखने वाले लोगों को सरकारी नौकरी में वरीयता दी जाएगी। 1854 में उपनिवेशी राज्य ने सर चॉल्स वुड द्वारा सुझाई गई प्रणाली को स्वीकार करते हुए राज्य ने प्राथमिक स्कूल से विश्वविद्यालय तक शिक्षा में बदलाव की घोषणा की।

मध्य काल तक स्वास्थ्य सेवाएँ दूरदूर तक फैली हुई नहीं थी उपनिवेशी राज्य ने चिकित्सा देखभाल मुहैया कराने के प्रयास किए। ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने कर्मचारियों के लिए 1664 में अस्पताल खोले थे। अठाहरवीं शताब्दी के अंत तक कलकत्ता में भारतीयों के लिए अस्पताल खोला गया था। 1800 ई. के आसपास मुंबई और मद्रास में भी भारतीयों के लिए अस्पताल शुरू किए गए। 1840 तक प्रेजिडेन्सियों के अलावा, विभिन्न बड़े शहरों में भारतीयों के लिए लगभग एक दर्जन अस्पताल थे। भारतीयों को स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने में राज्य के इन सीमित प्रयासों को क्रिश्चियन मिशनरियों विशेषकर भीतरी कस्बों में जरूरतमंद और जनता को दी गई स्वास्थ्य सेवाओं से बल मिला। उपनिवेशी अवधि के दौरान पहला मेडिकल कालेज 1835 में कलकत्ता में स्थापित किया गया था और उसके बाद बम्बई और मद्रास में भी मेडिकल कालेज प्रारंभ किए गए।

सम्पूर्ण चिकित्सा क्षेत्र में स्वास्थ्य सर्वेक्षण तथा विकास करने के लिए 1945 ई. भोर समिति (Bhore Committee) की नियुक्ति की गई। इस समिति ने अस्पताल सामाजिक कार्यकर्ता के प्रचलन की सिफारिश की और पहला प्रशिक्षित सामाजिक कार्यकर्ता 1946 में जे.जे. अस्पताल, मुंबई में नियुक्त किया गया। चिकित्सा सामाजिक कार्यकर्ता पाठ्यक्रम सबसे पहले डॉ (सुश्री ) जी. आर. बनर्जी के निर्देशन में टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइन्सेज में, 1946 में भारत में आरंभ किया गया।