भ्रांत तर्क के प्रकार - Types of Derivations
भ्रांत तर्क के प्रकार - Types of Derivations
पैरेटो ने भ्रांत तर्कों की प्रकृति को स्पष्ट करने के लिए इनके विभिन्न प्रकारों का भी उल्लेख किया। इसका उद्देश्य यह स्पष्ट करना था कि विभिन्न व्यक्ति किस तहर तार्किक अथवा मनोवैज्ञानिक विधियों की सहायता से अपने व्यवहारों में औचित्य से सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं। पैरेटो के अनुसार विभिन्न व्यक्ति अपने सामाजिक जीवन में सामान्यतः जिन भ्रांत तर्कों का उपयोग करते हैं, उन्हें निम्नांकित चार श्रेणियों में विभाजित करके समझा जा सकता है
(1) घोषणाएं या सकारात्मक भ्रांत तर्क (Airmative Derivations )
इस श्रेणी के भ्रांत तर्कों को पैरेटो ने ऐसे भ्रांत तर्क कहा है जो सरलतम प्रकार के होते है। इन तर्कों का उपयोग कुछ ऐसे कथनों, वाक्यों अथव घोषणाओं के रूप में होता है जिनकी अनुभव या परीक्षण के द्वार पुष्टि नहीं की जा सकती। साधारणतया इस श्रेणी के तर्कों को समाज द्वारा एक सामान्य व्यवहार के रूप में स्वीकार कर लिया जाता है तथा यह इतने शक्तिशाली बन जाते हैं कि इनका विरोध करना एक सरल कार्य नहीं होता। इस प्रकार भ्रांत तर्कों को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है।
(1) भावनात्मक
(2) मिश्रित
(1) भावनात्मक आधार पर सकारात्मक भ्रांत तर्क वे है जिनमें भावना के आधार पर कोई तर्क इस तरह प्रस्तुत किया जाता है कि साधारणतया इसका विरोध नहीं किया जाता। एक माँ जब अपने पुत्र को किसी व्यवहार के लिए यह आदेश देती है कि (अपने से बड़े प्रत्येक व्यक्ति की आज्ञा का पालन करों क्योंकि ऐसी आज्ञा का पालन करना तुम्हारा दायित्व है) तो इस तर्क को केवल भावना की ही स्वीकृति प्राप्त होती है।
(2) मिश्रित रूप के सकारात्मक भ्रांत तर्क वे है जिनमें भावनाओं के साथ तथ्यों का भी कुछ सीमा तक मिश्रण होता है। उदाहरण के लिए युद्ध के समय सैनिकों को पहले भावनात्मक आधार पर अपने राष्ट्र के प्रति समर्पण की शिक्षा दी जाती है
और इसके बाद उन्हें युद्ध करने का आदेश दिया जाता है। स्पष्ट है कि युद्ध के समय सैनिकों को दिये जाने वाले आदेशों में तथ्यों और भावनाओं का जो समावेश देखने को मिलता है वह इसी तरह के भ्रांत तर्कों को स्पष्ट करते हैं। पैरेटो ने एक कासीवादी व्यवस्था में शासक द्वारा किये जाने वाले प्रचार को भी इसी तरह के भ्रानत तर्कों से संबंधित माना है। ऐसे प्रचार में भावनात्मक आधार पर किसी आंशिक तथ्य को बार-बार दोहराये जाने से जनसाधारण द्वारा उसे सच मान लिया जाता है। यही कारण था कि हिटलन हथियार के साथ प्रचार को भी उतना ही महत्वपूर्ण मानता था।
(2) अधिकरवादी या सत्तावादी भ्रांत तर्क (Authoritative Perivations ) -
इस श्रेणी के अन्तर्गत वे भ्रांत तर्क आते हैं जिनका संबंध किसी व्यक्ति विशेष की सत्ता, विशेष परम्परा या ईश्वरीय सत्ता से होता है। इस प्रकार सत्तावादी भ्रांततर्क तीन प्रकार का होता है।
(क) व्यक्ति की सत्ता (Authority Man)
(ख) परम्परा की सत्ता (Authority of Tradition
(ग) ईश्वरीयसत्ता (Devine Authority )
(क) व्यक्ति की सत्ता (Authority of Man)
समाज में प्रत्येक व्यक्ति के सामाजिक संबंध किसी न किसी व्यक्ति की सत्ता से प्रभावित होते हैं। यह सत्ता चाहे वैधानिक हो या प्रथागत लेकिन हम जिसे अपने से अधिक प्रतिष्ठित या सत्तासम्पन्न मानते हैं. उसके द्वारा दिये गये तर्क अथवा कथन को सहज ही मान लेते हैं। पत्नी पर पति की सत्ता, बच्चों पर पिता की सत्ता विद्यार्थी पर शिक्ष की सत्ता, कार्यकर्ताओं या नेताओं की सत्ता ये सभी इसके विभिन्न उदाहरण है। इसका तात्पर्य है कि जब एक अधीन व्यक्ति के सामने सत्ता सम्पन्न व्यक्ति के नाम से कोई तर्क दिया जाता है तो वह उसकी विश्वसनीयता जानने का प्रयत्न नहीं करता।
(ख) परंपरा की सत्ता (Authority of Tradition)
व्यक्ति अपने कार्यों अथवा व्यवहारों का औचित्य सिद्ध करने के लिए परम्पराओं के आधार पर भी तर्क प्रस्तुत करता है। जब हम यह कहते है
कि (विवाह अपनी जाति में करने से ही दामपत्य जीवन सफल हो सकता है।) तब यह परम्परा की सत्ता के संदर्भ में दिया जाने वाला भ्रांत तर्क है। तात्पर्य यह है कि हम अक्सर परम्पराओं अथवा प्रथाओं की सत्ता के संदर्भ में साम्प्रदायिक झगड़ों, जातिगत हिंसाओं और क्षेत्रवाद के संदर्भ में इस तरह का तर्क देते है जिन्हें उचित मान लिया जाता है।
(ग) ईश्वरीय सत्ता (Divine Authority)
पैरेटो ने स्पष्ट किया है कि अधिकांश व्यक्ति ईश्वर अथवा एक अलौकिक सत्ता में विश्वास करते है। फलस्वरूप व्यक्ति जब अपने किसी विशेष व्यवहार के पक्ष में कोई ठोस तर्क नहीं दे पाता तब वह कोई न कोई ऐसा भ्रांत तर्क अवश्य देने लगता है जो ईश्वरीय सत्ता से संबंधित होती है। किसी व्यवहार का कारण ईश्वर की इच्छा या भाग्य का परिणाम या प्रारब्ध को मान लेने इस तरह के भ्रांत तर्कों का उदाहरण है।
( 3 ) भावनाओं या सिद्धान्तों से अनुकूलन (Accord with Sentiments of Principles)
मानव जीवन में भावनाओं का स्थान बहुत अधिक महत्वपूर्ण है। इस स्थिति में व्यक्ति अपनी क्रियाओं के लिए अक्सर ऐसे भ्रांत तर्कों का सहारा लेते हैं जो मानव की भावनाओं के अनुकूल होते हैं। जो मानव की भावनाओं के अनुकूल होते हैं। इसी कारण उन्हें सामान्य व्यक्तियों द्वारा सच मान लिया जाता है। ऐसे भ्रांत तर्कों का उपयोग व्यक्ति के स्तर से लेकर राष्ट्र के स्तर तक किया जाता है। उदाहरण के लिए यदि एक व्यक्ति अपने पुत्र के लिए अपराध करके यह तर्क दे कि ( पुत्र की रक्षा के लिए अपराध भी कर देना पिता का नैतिक दायित्व है। ( अथवा सर्वाजनिक रूप से अभद्रता करने पर व्यक्ति पर आघात करके यह तर्क दे कि नैतिकता की रक्षा प्रत्येक व्यक्ति का दायित्व है तो ऐसे भ्रांत तर्क जनसाधारण के अनुकूल होते है। इस प्रकार पैरेटो ने इस वर्ग में मुख्यतः उन भारन्त तर्कों को सम्मिलित किया है जिनके द्वारा व्यक्ति किसी व्यवहार के बाद उसे भावनात्मक या सैद्धान्तिक अधार पर स्वयं अपने आपको सही करने का प्रयत्न करता है।
(4) मौखिक प्रमाण (Verbal Proals)
पैरेटो ने भ्रांत तर्कों की विवेचना में मौखिक प्रमाण देकर व्यवहारों के औचित्य को सिद्ध करना विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना है। आपका कथन है कि ऐसे भ्रांत तर्कों में शब्द की भाषा का महत्व होता है। इन भ्रांत तर्कों के लिए प्रयोग में लायी जाने वाली भाषा न केवल भ्रमपूर्ण और दो अर्थों वाली होती है बल्कि उसे अनेक काल्पनिक प्रमाणों की सहायता से इस तरह प्रस्तुत किया जाता है कि उसमें सहज ही विश्वास कर लिया जाये।
प्रजातांत्रिक नेताओं द्वारा भाषाण दिये जाने के संबंध में पैरेटो ने लिख है कि इन भाषणों में अतार्किक उद्घोषणाओं के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता। पैरेटो यह भी मानते थे कि विभिन्न धर्मों की पोराणिक गाथाओं में जिन बहुत से मौखिक प्रमाणों का समावेश होता है, वे भी तार्किक अथवा से प्रयोगसिद्ध न होकर केवल भ्रांत तर्क ही होते हैं।
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