समाज कल्याण प्रशासन के कार्य - Functions of Social Welfare Administration - समाज कार्य शिक्षा

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Sunday, 13 September 2020

समाज कल्याण प्रशासन के कार्य - Functions of Social Welfare Administration

 


समाज कल्याण प्रशासन के कार्य 

प्रशासन के कार्यों का निरूपण सर्वप्रथम 1916 में हेनरी फेयोल ने किया। उनके अनुसार प्रशासन करने का आशय पूर्ण कल्पना एवं नियोजन करना, संगठन बनाना आदेश देना, समन्वय करना तथा नियंत्रण करने से है। लूथर गुलिक ने आगे चल कर प्रशासन से सात कार्य निरूपित किए। इन सभी कार्यों को एक में मिलाकर उन्हें 'POSDCORB' नामक एक संकेत शब्द से अविहित किया गया। प्रबंध ल के सात कार्य हैं- (1) नियोजन (प्लानिंग) (P), (2) संगठन (ऑर्गनाइजेशन) (O), (3) नियुक्तियां (स्टाफिग) (S), (4) डायरेक्टिंग (D), (5) समन्वय (कोआर्डिनेशन) (CO), (6) रिपोर्टिग (R), (7) बजटिंग (B)। 


कुंटज तथा ओ. डोनेल ने प्रबन्ध के निम्नलिखित पाँच कार्य बताए हैं- (1) प्लानिंग, (2) संगठन, (३) निर्देशन (Direction), (4) नियंत्रण (Control), (5) नियुक्तियाँ।

 अधिकांश विद्वानों के मतों को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि कुछ आधारभूत कार्य से नियोजन, संगठन, समन्वय तथा नियंत्रण तो लगभग सभी द्वारा स्वीकार किए जाते है। इनके अतिरिक्त कुछ ऐसे कार्य हैं, जिन्हें कुछ विद्वान तो स्वीकार करते हैं पर अधिकांश विद्वान स्वीकार नहीं करते। इन कार्यों में निर्देशन, नियुक्तियां तथा अभिप्रेरणा आदि आते है। प्रशासकीय कार्यों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है -

नियोजन -  किसी कार्य के सफलतापूर्वक सम्पादन हेतु यह आवश्यक है कि उस कार्य के संबंध में पहले से नियोजन कर लिया जाए और फिर उसके अनुसार ही कार्य का संचालन किया जाए। 

जार्ज आर. टेरी के अनुसार नियोजन भविष्य में देखने की एक प्रविधि है। इसके द्वारा भविष्य की आवश्यकताओं का रचनात्मक ढ़ंग से पुनर्निरीक्षण किया जाता है, ताकि निर्धारित लक्ष्यों का निर्धारण, उत्पादन की विधि का निर्धारण, भावी पानी का अनुमान और तदानुसार उत्पादन की मात्रा का निर्णय, वित्तीय आवश्यकताओं एवं मानव शक्ति नियोजन के कार्यों को सम्मिलित किया जा सकता है।

संगठन -  संगठन का आशय नियोजन द्वारा निर्धारित लक्ष्यों की पूर्ति करने वाले तंत्र से है। श्री ई.एफ.च के अनुसार संगठन प्रबंधन की संरचना है, क्योंकि इसी के द्वारा अधिक प्रभागशाली निष्पादन हेतु कुल उत्तरदायित्व का विछेदन एवं वितरण सम्बन्धित समूहों में जाता है। संगठन ही वह आधारभूत ढांचा है, जिसके माध्यम से प्रबन्ध विभिन्न योजनाओं को व्यवहार में लाता है, उत्पादन करता है तथा उसका नियमन एवं नियंतरण करता है। उत्पादन विधियों का निर्धारण तथा श्रमिकों की रूचि के अनुसार उनके कार्य का वितरण करना, उनके पारंपरिक अधिकारों एवं कर्तव्यों को परिभाषित करें तथा अधिकारों का हस्तान्तरण आदि सब कुछ कार्य संगठन के अन्तर्गत आते हैं। 

समन्वय -  प्रशासकीय उद्देश्यों की पूर्ति हेतु निर्मित संगठन में अनेक व्यक्ति व समूह सम्मिलित रहते हैं। इनके कार्य एवं उद्देश्य एक-दूसरे से भिन्न हो सकते हैं। अत: सभी कार्यों में पारस्परिक समन्वय स्थापित कर सबके प्रयास से महत् लक्ष्यों की प्राप्ति करना, प्रबंध का एक महत्वपूर्ण कार्य है। ई.एल. ब्रेच के अनुसार किसी संस्था के विभिन्न सदस्यों के बीच इस ढंग से कार्यों का आवंटन करना कि उनमें संतुलन एवं सहयोग बना रहे तथा यह देखना कि कार्य सदभावना के साथ हो जाए, समन्वय कहलाता है। "संगठन के विभिन्न अंगों में समन्वय स्थापना हेतु तीन विधियां का सहारा लिया जाता है।

1. संतुलन - व्यावसायिक प्रयासों में उपयोग किए जाने वाले विभिन्न तत्वों में इस प्रकार संतुलन स्थापित किया जाए कि कोई भी तत्व आवश्यकता से अधिक न हो और न कम तथा सभी तत्व आपस में मिलकर अनुकूलतम प्रभाव उत्पन्न कर सके।

2. समय-निर्धारण - इसका अर्थ है कि विभिन्न कार्यों की प्रगति के समय को इस प्रकार से व्यवस्थित करना कि वे निश्चित योजना में दी गई समय-तालिका के अनुसार एक-दूसरे के कुशल सम्पादक के अनुकूल हों। 

3. विलयन - इसका अर्थ है व्यवसाय में रत विभिन्न हितों को इस प्रकार एकीकृत करना कि व्यावसायिक उद्देश्यों एवं लक्ष्यों को कुशलतापूर्वक प्राप्त किया जा सके।


निर्णय करना -  पीटर ड्रकर के अनुसार प्रशासन के सारे कार्य निर्णय पर आधारित हैं। वास्तव में प्रबंध एक विशिष्ट प्रक्रिया है, जिसकी पूर्ति निर्णय करने के रूप में होती है। व्यवसाय या उद्योग का आकार छोटा हो या बड़ा, सभी में प्रबन्धक को अनेक निर्णय करने पड़ते हैं। प्रबंध में निर्णय की अधिक महत्ता होने के कारण ही कुछ आधुनिक विद्वान इसे ही प्रबंधक का मुख्य कार्य कहते हैं। वह व्यक्ति जो उपयुक्त निर्णय नहीं कर पाता, उसे प्रबन्धक के पद पर कार्य करने का कोई अधिकार नहीं है।

नियंत्रण  -  बेंच के अनुसार निधारित प्रतिमानों अथवा योजनाओं ने वास्तविक निष्पादन की तुलना करने की प्रक्रिया ही नियंत्रण कहलाती है, जिससे यह पता लग जाए कि पर्याप्त प्रगति तथा संतोषजनक निष्पादन हो रहा है या नहीं। इसके अतिरिक्त इस प्रकार प्राप्त किए गए अनुभव को संभावित भावी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु योगदान नो रूप में अंकित किया जा सके। नियंत्रण की सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि पिछले कार्य में कोई कमी रह गई हो तो उसे इस प्रकार सुधारना कि निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति में किसी प्रकार की असुविधा न हो। एलन के अनुसार नियंत्रण के अन्तर्गत निम्नलिखित चार विशिष्ट क्रियाएँ शामिल की जा सकती है - 

(१) उत्तरदायित्व का मापदण्ड स्थापित करना जिसके अनुसार कार्य की प्राप्ति का मूल्यांकन किया जा सके। 

(२) वास्तविक प्रगति का निर्धारित मापदंड के अनुसार विवरण तैयार करना। 

(3)  नियोजित तथा वास्तविक प्रगति का तुलनात्मक अध्ययन करके विचलनों का पता लगाना तथा उसका विश्लेषण करना। इससे नियोजित तथा वास्तविक प्रगति के अंतर के कारणों का पता चलता है, 

(4) सुधारात्मक कार्यवाही करना अर्थात यदि कार्य का निष्पावन योजना के अनुरूप न रहा हो तो भणिष्य में इसे निष्पादन योजना के अनुकुल बनाने के लिए कार्यवाही करना एवं आवश्यक संशोधन करना। किसी उपक्रम में स्वस्थ एवं प्रभावी नियंत्रण का होना आवश्यक है, क्योंकि इसके द्वारा समस्त कार्य निर्धारित उद्देश्यों के अनुरूप सुचारु रूप से चलते हैं। निर्देशन -  निर्देशन, प्रशासन का वह महत्त्वपूर्ण कार्य है जिसके द्वारा संगठित प्रयत्नों को प्रारम्भ किया जाता है और प्रबन्धकीय निर्णयों को वास्तविक स्वरूप प्रदान किया जाता है तथा व्यवसाय को अपने लक्ष्य की प्राप्ति हेतु उचित दिशा में कार्य करने के लिए प्रेरित किया जाता है। निर्देशन के अन्तर्गत कर्मचारियों को परामर्श देना तथा उनके कार्य का नियंत्रण भी सम्मिलित है। निर्देशन को सफल एवं उपयोगी बनाने के लिए यह आवश्यक है कि निर्देश पूर्णतया स्पष्ट, व्यावहारिक, सुसंगत तथा उपयुक्त हों। यथासंभव निर्देश निम्नलिखित होना चाहिए।

अभिप्रेरणा -  अभिप्रेरणा का उद्देश्य उपक्रम के विभिन्न स्तरों पर कार्य कर रहे कर्मचारियों को उत्पादकता वृद्धि की प्रेरणा देना है तथा इस दिशा में उन्हें सफ़लता प्राप्त करने का उचित अवसर प्रदान करना है। कुशल अभिप्रेरणा से स्वस्थ मानवीय सम्बन्ध विकसित होते हैं। अभिप्रेरणा, प्रबन्ध का एक अति आवश्यक कार्य है। इसके अन्तर्गत प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष वित्तीय प्रोत्साहन, अच्छी कार्य की दशाएँ, कार्य की प्रतिष्ठा आदि तत्वों को प्रबन्धक उपकरणों को रूप में प्रयुक्त करता है। 

कर्मचारी व्यवस्था - संगठन की योजना के अनुसार आवश्यक पदाधिकारियों एवं अन्य कर्मचारियों की नियुक्ति करना, आवश्यक प्रशिक्षण प्रदान करना, पदोन्नति, अवनति, स्थानान्तरण, सेवामुक्ति, संतोषजनक पारिश्रमिक आदि की व्यवस्था करना भी प्रबंधक का एक महत्वपूर्ण कार्य है। प्रबन्ध की सफलता बहुत कुछ इसी कार्य पर निर्भर करती है। 

सम्प्रेषण - संदेशवाहन या सम्प्रेषण की सक्षम प्रणाली के ऊपर ही प्रबन्धकीय कार्यों की सफलता निर्भर है। उपक्रम के संगठन में नियुक्त कर्मचारियों को सम्प्रेषण के माध्यम से ही प्रशासकीय अधिकारियों के आदेशों का निर्गमन किया जाता है और इस सम्बन्ध में पूछताछ का उत्तर दिया जाता है। प्रबन्ध का एक साधन है सम्प्रेपण। आधुनिक युग में इस कार्य का इतना अधिक महत्त्व है कि इसे गत कुछ वर्षों से प्रबन्ध कार्य कहा जाने लगा है। यदि सम्प्रेषण अच्छा एवं प्रभावशाली होता तो दूसरे व्यक्ति कार्य के निष्पादन में अपने सारे प्रयास लगा देंगे। इसके विपरीत यदि सम्प्रेषण दोषपूर्ण होगा तो पारस्परिक शंकाएँ, मनमुटाव तथा बेचैनी उत्पन्न होगी।

दूरदर्शितापूर्ण नेतृत्व -  प्रशासकीय उपक्रम को दूरदर्शी, सुयोग्य था सफल नेतृत्व कर्मचारियों को निर्देश देते हुए एवं उनमें पारस्परिक सहयोग उत्पन्न करते हुए उन्हें लक्ष्य प्राप्ति की दिशा में अग्रसारित करता है। प्रशासन एक प्रगतिशील प्रक्रिया है, इसमें आए दिन परिवर्तन होते रहते हैं। ऐसी स्थिति में प्रबंधक के काम में भी आए दिन परिवर्तन होते रहते हैं। अस्तु उपरोक्त कार्यों में भी हम भविष्य में परिवर्तन की आशा रखते हैं। 

कुछ वर्तमान विद्वानों ने प्रशासन के उपयुक्त कार्यों को परम्परागत कार्य की संज्ञा दी है और उनके स्थान पर नए सिरे से प्रबन्धकीय क्रियाकलापों के निरूपण का प्रयास किया है। इस सम्बन्ध में हेनरी मिंट्जबर्ग ने पाँच अमेरिकन औद्योगिक प्रतिष्ठानों के मुख्य अधिशासियों के क्रियाकलापों का पाँच सप्ताह तक अध्ययन किया। अपने अध्ययन के आधार पर उनका यह निष्कर्ष था कि प्रशासन को मुख्यतः 10 भूमिकाओं का निर्वाह करना पड़ता है, जिन्हें तीन वर्गों में विभाजित किया जा सकता है। प्रथम वर्ग के अन्तर्गत अन्तरवैयक्तिक सम्बन्ध विषयक भूमिका आती है। इनमें पहली भूमिका फीगर हेड' अथवा प्रतिष्ठान के सर्वोच्च अधिकारी की प्रस्थिति से जनित सम्मान के निर्वाह से सम्बंधित है। इस भूमिका के गिर्वाह हेतु उसे औपचारिक भोज और स्वागत समारोहों में सम्मिलित होना पड़ता है तथा दूसरी कम्पनियों के सर्वोच्च अधिकारियों एवं राजपुरुषों का स्वागत करना पड़ता है। दूसरी भूमिका लीडर या नायक की है। इस भूमिका के अन्तर्गत यह अपने प्रतिष्ठान में योग्य एवं कुशल अभिकर्मियों का चयन, प्रशिक्षण एवं विकास, उनका मार्ग निर्देशन करता हुआ प्रतिष्ठान के लक्ष्यों की प्राप्ति की दिशा में अग्रसर होता है। तीसरी 'लायजन' या सम्बन्ध स्थापना की है। इसके अन्तर्गत सर्वोच्च अधिशासी प्रतिष्ठान के बाहर के प्रभावशाली व्यक्तियों एवं संस्थाओं से सम्पर्क स्थापित कर आवश्यक सूचना सहयोग अर्जन करता है। 

द्वितीय वर्ग के अन्तर्गत प्रधान भूमिका मोनीटर की है। इसके अंतर्गत विभिन्न स्त्रोतों से सूचनाओं को एकत्रित किया जाता है। इन सूचनाओं का सम्बन्ध संगठन के सामाजिक परिवेश से होता है। कुछ सूचनाएं तो ऐसी होती हैं, जो केवल प्रशासक को ही प्राप्त होती हैं, अन्य अभिकर्मी उनसे अनभिज्ञ रहते हैं। दूसरी भूमिका सहभाजन की होती है। इसके अंतर्गत वह कुछ सूचनाओं को अपने नीचे के अभिकर्मियों को सम्प्रेषित करता है। तृतीय भूमिका प्रवक्ता की है, जिसके अन्तर्गत वह बाह्म संसार को अपने प्रतिष्ठान की प्रगति से अवगत कराता है। 

तृतीय वर्ग के अन्तर्गत आने वाली चारों भूमिकाओं का सम्बन्ध प्रशासक की निर्णय करने की से है। उद्यमकर्ता की भूमिका के अन्तर्गत वह प्रतिष्ठान के संगठन में परिवर्तन लाने का प्रयास करता है। समस्या - समाधान कर्ता के रूप में यह प्रतिष्ठान में प्रसूत कुछ विषम समस्याओं हड़ताल आदि के समाधान हेतु प्रयास करता है। साधनों के आवंटनकर्ता के रूप में वह अपने संगठन में कार्यरत विभिन्न अभिकर्मियों की जिम्मेदारी एवं अधिकारों का निर्धारण करता है। वार्ताकार के रूप में यह अपने प्रतिष्ठा एवं बाह्य पक्ष के बीच होने वाली महत्त्वपूर्ण वार्ता में आपने प्रतिष्ठान के प्रतिनिधियों का नेतृत्व करता है।

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