सतत विकास की चुनौतियाँ - challenges of sustainable development

सतत विकास की चुनौतियाँ - challenges of sustainable development

सतत विकास की संकल्पना से यह बात तो पूर्णरूपेण सिद्ध होती है कि यह पर्यावरण के क्षरण के विरोध में है और संसाधनों के संरक्षण का पक्षधर है। पर्यावरण को संरक्षित तभी रखा जा सकता है जब लोग बड़ी मात्रा में इसके लाभ और हानि के प्रति जागरूक हों और उनकी मनोवृत्ति इसके संवर्धन के प्रति गंभीर हो ।


इसके लिए आवश्यक है कि लोगों की अंतर्दृष्टि में परिवर्तन हो। इस परिवर्तन के लिए उत्तरदायी कारक निम्न होंगे।


साक्षारता


● बाजार शक्तियाँ


• संस्थागत परिवर्तन


पर्यावरण और विकास के मध्य अत्यंत गहरा संबंध है। संसाधनों के लगतार दोहन से पर्यावरणीय क्षरण होने लगता है और इससे संसाधनों में कमी भी आ जाती है जिससे विकास बाधित होने लगता है। इन कारणों से मानव के अस्तित्व पर भी खतरा मंडराने लगता है। इसके समायोजन के लिए सतत विकास एक सटीक उपाय है। मानव संसाधन विकास को विकास की नीतियों और गतिविधियों के नियोजन में सावधानी बरतनी चाहिए और प्रमुख आयामों में आर्थिक और परिस्थितिशास्त्रीय विकास के समन्वय को सम्मिलित की आवश्यकता है।



सतत विकास के लिए चुनौती के रूप में जनसंख्या वृद्धि भी खड़ी है। जनसंख्या जितनी ही अधिक होगी। भौतिक वस्तुओं और अन्य संसाधनों का उपयोग भी उतनी ही अधिक मात्रा में होगा इससे संसाधन की अनुपलब्धता का खतरा है। सतत विकास तभी संभव है जब जनसंख्या और परिस्थितिकीय तंत्र की उत्पादक क्षमता में सामंजस्य स्थापित हो।


वर्तमान और भविष्य में आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए आवश्यक है विसंसाधनों को संरक्षित किया जाए। उन संसाधनों का उपयोग किया जाना चाहिए जिसे नवीकरण किया जा सके, यथा- सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा आदि| अपशिष्ट वस्तुओं को पुनः उपयोग हेतु बनाकर इस्तेमाल किया जाना चाहिएयथा जैविक अवशिष्ट से बायोगैस आदि।



सतत विकास हेतु विकसित और विकासशील देशों के लिए आवश्यक तत्व सतत विकास हेतु विकसित समाजों के लिए सुझाव निम्न हैं.


1. जनसंख्या वृद्धि पर रोक लगाई जाए।


2. संसाधनों के दोहन को नियंत्रित किया जाए। 3. आत्मनिर्भरता को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए।


4. नवीकरण और संरक्षण को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।


5. हथियारों के विक्रय को कम किया जाना चाहिए।


6. शांति और संयम को महत्व देना चाहिए।


7. सार्वभौमिक नैतिक मूल्यों को लागू किया जाना चाहिए)


8. वैश्विक स्तर पर सहयोग की भावना को विकसित किया जाए। सतत विकास हेतु विकासशील समाजों के लिए निम्न सुझाव प्रस्तुत है


1. जनसंख्या वृद्धि दर को नियंत्रित रखना।


2. संसाधनों का उपयोग देश की आवश्यकताओं की पूर्ति में किया जाना चाहिए।


3. संपोषीय कृषि व्यवस्था का प्रयोग करना।


4. पाञ्चात्य कृषि और प्रौद्योगिकी व्यवस्था को धारण करने में संयम रखा जाना चाहिए। 


5. अधिकतम आत्मनिर्भरता को प्राप्त किया जाया


6. पूर्ण साक्षरता का लक्ष्य रखा जाना चाहिए।


सतत विकास, विकास का वह स्वरूप है जो पर्यावरण को बिना किसी नुकसान पहुंचाता हो और न ही नवीन पर्यावरणात्मक बोझ आरोपित करता है। इसे पारिस्थितिकीय विकास के नाम से भी जाना जाता है। सतत विकास के पीछे स्पष्ट तौर पर यह मत है कि एक देश का संसाधन आधार तथा उसके जल वायु और भूमि के स्रोत उस देश की सभी पीढ़ियों (वर्तमान और अगली की संयुक्त संपत्ति है। अल्पकालिक लाभों के लिए इसका अप्रतिमानित दोहन अथवा विनाश करने का सीधा अर्थ यह है कि इस लाभ के प्राप्ति के मूल्य के रूप में अगली पीढ़ी अपने संसाधनों की वंचना से चुकाएगी। यह स्पष्ट तौर परउनके हितों का हनन है जो कि अनुचित है। अतः अगली पीढ़ी के लिए उचित मात्रा में संसाधनों की उपलब्धता के लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि सतत विकास कि संकल्पना को सरोकार किया जाए और संसाधनों का उचित उपयोग ही किया जाए एवं साथ-ही-साथ उनके नवीकरणीय उत्पादों व दोबारा उपयोग पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।