हर्बट बिस्नो ने समाज कार्य के दर्शन का विस्तृत वर्णन किया है।
हर्बट बिस्नो ने समाज कार्य दर्शन को 4 क्षेत्रों में विभाजित किया हैः
1- व्यक्ति की प्रकृति के संदर्भ में,
2- समूहों, व्यक्तियों एवं समूहों और व्यक्तियों के आपसी संदर्भ में,
3- समाज कार्य की प्रणालियों एवं कार्यों
के संदर्भ में,
1-
सामाजिक कुसमायोजन एवं सामाजिक परिवर्तन के संदर्भ में।
व्यक्ति की प्रकृति के संदर्भ में
1-
व्यक्ति अपने अस्तित्व के कारण ही मूल्यवान है।
2-
मानवीय पीड़ा अवांछनीय है अतः इसको दूर किया जान चाहिए अन्यथा जहां तक संभव
हो कम किया जाना चाहिए।
3-
समस्त मानव व्यवहार जैविकीय अवयव तथा उसके पर्यावरण के बीचअन्तःक्रिया का
परिणाम है।
4-
मनुष्य सम्भवतः विवेकपूर्ण कार्य नहीं करता है।
5-
जन्म के समय मनुष्य अनैतिक तथा असामाजिक होता है।
6-
मानव आवश्यकताएं वैयक्तिक एवं सामाजिक दोनों प्रकार की होती हैं।
7-
मनुष्यों में महत्वपूर्ण अंतर होते हैं। अतः उन्हें अवश्य स्वीकार करले ना
चाहिए।
8-
मानव सम्प्रेरणा जटिल एवं अस्पष्ट होती है।
9-
व्यक्ति के प्रारम्भिक विकास में पारिवारिक सम्बन्धों का प्राथमिक महत्व
होता है।
10-
सीखने की प्रक्रिया में अनुभव एक आवश्यक पहलू है।
समूहों, व्यक्तियों एवं समूहों और व्यक्तियों के परस्पर सम्बन्धों के संदर्भ में
1-
समाज कार्य हस्तक्षेप न करने की नीति तथा सबसे अधिक उपयुक्त के जीवित रहने
के सिद्धांत को नहीं मानता है।
2-
यह आवश्यक नहीं है कि धनी तथा शक्तिशाली व्यक्ति ही योग्य हों तथा निर्धन
एवं दुर्बल व्यक्ति अयोग्य हों।
3-
सामाजीकृत व्यक्तिवाद विषम व्यक्तिवाद की अपेक्षा अच्छा है।
4-
सदस्यों के कल्याण का मुख्य उत्तरदायित्व समुदाय पर होता है।
5-
सामाजिक सेवाओं पर समुदाय के सभी वर्गों का समान अधिकार है। समुदाय का
उत्तरदायित्व है कि वह बिना भेदभाव के अपने सभी सदस्यों की कठिनाइयों का निराकरण
करे।
6-
केन्द्रीय सरकार का यह उत्तरदायित्व है
कि वह स्वास्थय, आवास,पूर्ण रोजगार, शिक्षा तथा अन्य विविध प्रकार से जन
कल्याण एवं सामाजिक बीमा योजना सम्बन्धी कार्यक्रमों को लागू करे।
7-
जन सहायता आवश्यकता की अवधारणा पर आधारित होनी चाहिए।
8-
संगठित श्रम का सामुदायिक जीवन में सक्रिय यो गदान होता है तथा उसकी शक्ति
को विध्वंसात्मक न मानकर रचनात्मक मानना चाहिए।
9-
सम्पूर्ण समानता एवं पारस्परिक सम्मान के आधार पर सभी प्रजातियों एवं
प्रजातीय समूहों मे सम्पूर्ण सहयोग होना चाहिए।
10-
स्वतंत्रता एवं सुरक्षा में कोई पारस्परिक विरोध नहीं है।
समाज कार्य की प्रणालियों एवं कार्यों के
संदर्भ में
1-
समाज कार्य का दृष्टिकोण द्विमुखी है। एक ओर समाज कार्य व्यक्तियों को
संस्थागत समाज के साथ समायोजन स्थापित करने में सहायता देता है तो दूसरी ओर वह इस संस्थागत समाज के आवश्यक
क्षेत्रों में परिवर्तन लाने का भी प्रयास करता है।
2-
मानव व्यवहार के अध्ययन के लिए वैज्ञानिक पद्धति को ही आवश्यक साधन माना
जाता है।
3-
सामान्यतया एक सक्षम व्यक्ति अपने हितों का सबसे अच्छा निर्णायक होता है। उसे स्वयं निर्णय लेना चाहिए तथा
समस्या का निराकरण करना चाहिए।
4-
व्यवहार में सुधार एवं सामाजिक विकास के लिए वातावरण के परिवर्तन एवं
अन्तदृष्टि के विकास पर विश्वास रखता है न कि आदेश, निर्णय अथवा प्रबोधन में
5-
समाज कार्य जनतंत्र को एक प्रणाली के रूप में मानता है।
सामाजिक कुसमायोजन एवं सामाजिक परिवर्तन
के संदर्भ में
1-
हमारी संस्कृति में गम्भीर राजनीतिक, आर्थिक
एवं सामाजिक कुसमायोजन है।
2- क्रमिक विकास द्वारा किया गया सुधार हमारे समाज के लिए प्रासंगिक एवं वांछनीय है।
3- सामाजिक नियोजन आवश्यक है।
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