समाज कार्य का भारतीय दर्शन एवं मूल्य - Indian Philosophy and Values of Social Work

समाज कार्य का भारतीय दर्शन एवं मूल्य - Indian Philosophy and Values of Social Work

भारतीय इतिहास का अवलोकन करने पर हम पाते हैं कि समय बदलने के साथ-साथ समाज सेवा के कार्य चलते या होते रहे हैं जिसके अंतर्गत गरीबों, असहायों और अपंगों आदि की सहायता करना व्यक्ति का कर्तव्य माना गया है।

वैदिक काल में सामुदायिक जीवन का विकास हुआ तथा सामूहिक संपत्ति की परंपरा टूटी। ऋग्वैदिक काल के उत्तरार्द्ध में पुरोहित को एक कुशल सामाजिक कार्यकर्ता माना गया। सनातन काल में व्यक्ति तथा समुदाय की भौतिक सहायता के अतिरिक्त उन्हें किसी न किसी उद्योग में लगाना भी कर्तव्य माना गया। बौद्ध काल में विद्यार्थियों को जीवन यापन के लिए स्वयं साधन खोजना पड़ता था तो उस समय विद्या दान पर विशेष बल दिया जाता था। इसका उद्देश्य सामाजिक संबंधों में सुधार करना और उन्हें सुदृढ़ बनाना था। अठारहवीं तथा उन्नीसवीं शताब्दी में जातिप्रथा तथा भेदभाव आदि को समाप्त करने का प्रयास किया गया।

बीसवीं शताब्दी में गांधीजी के कार्यों का राजनीतिक, आर्थिक तथा सामाजिक जीवन पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। समाज कार्य के आधीनीक प्रत्यय समाज कार्य मानो-सामाजिक समस्याओं से ग्रस्त लोगों की इस प्रकार सहायता करता है कि वे अपनी सहायता स्वयं कर सकेंने गांधी जी के नेतृत्व में समुचित सामाजिक स्वीकृति प्राप्त की। गांधी जी ने मानव प्रतिष्ठा पर बल दिया। उनका यह मानना था कि किसी को भी अपना विचार या मत दूसरों पर थोपना नहीं चाहिए, लोग अपने मन से ही अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन करेंगे, दूसरे के विचार उन पर प्रभाव नहीं डाल सकते। वे स्वयं अपनी सहायता को सबसे अच्छी सहायता मानते थे। उन्होंने सादा जीवन उच्च विचार, अपरिग्रह, न्यासधारिता और श्रम की महत्ता पर अधिक बल देते थे। श्रम की महत्ता आज समाज कार्य का महत्वपूर्ण दर्शन है। उनका प्रयास था कि लोगों में ऐसी चेतना आए जिससे लोग स्वयं अपने परिवर्तन का प्रयास करें अर्थात आत्मनिर्भर बनें। गांधी जी का सत्याग्रह, सर्वोदय और रचनात्मक कार्यक्रम भी समाज कार्य के लिए उतने ही महत्वपूर्ण हैं जीतने अन्य दर्शन।  

सामाजिक कार्य के मूल्य

समाज कार्य का उद्देश्य मानव कल्याण करना है। यह कल्याण कार्य तभी सम्भव हो सकता है जब वह सामाजिक मूल्यों को अपनी क्रियाविधि में समाहित करे, क्योंकि मूल्य ऐसे सामाजिक प्रतिमान, लक्ष्य तथा आदर्श होते हैं जिनके आधार  पर सामाजिक परिस्थितियों तथा व्यक्ति के व्यवहार का मूल्यांकन किया जा सकता है। मूल्यों के आधार पर ही मनुष्य के सामाजिक जीवन शैली का निर्धारण होता है तथा अन्तः क्रियायें सम्भव होती हैं। जान्सन के अनुसार.मूल्यों को एक सांस्कृतिक या केवल वैयक्तिक धारणा या मानक के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जिसके द्वारा वस्तुओं की एक-दूसरे के सन्दर्भ में तुलना की जाती है, उन्हें स्वीकृत या अस्वीकृत किया जाता है, उन्हें सापेक्ष रूप से अपेक्षित या उपेक्षित, अधिक या कम, बुद्धिमत्तापूर्ण या मूर्खतापूर्ण अधिक या कम सही मान जाता है। मुकर्जी के मत में मूल्य समाज द्वारा मान्यता प्राप्त इच्छायें तथा लक्ष्य हैं जिनका अभ्यन्तीकरण सीखने या समाजीकरण की प्रक्रिया के माध्यम  से होता है और जो विषयात्मक प्रतिष्ठा, उद्देश्य एवं आकांक्षायें बन जाते हैं। कॉस के अनुसार मूल्य को किसी वस्तु, अवधारणा, सिद्धान्त, क्रिया अथवा परिस्थिति के विषय में किसी व्यक्ति, समूह या समुदाय के बौद्धिक एवं संवेगात्मक निर्णय के रूप में देखा जा सकताहै। प्रत्येक व्यवसाय में जो मानव व्यवहार से सम्बन्धित है कुछ न कुछ  मूल्य अवश्य होते हैं और इन मूल्यों के आधार पर ही वह व्यवसाय अपने लक्ष्य को प्राप्त करता है। सामाजिक मूल्यों का अत्यधिक महत्व होता है क्योंकि वे सामाजिक सन्तुलन को बनाये रखते हैं, व्यवहारों में एकता लाते हैं, जीवन के मनोवैज्ञानिक आधार निश्चित करते हैं, निश्चित व्यवहार प्रदान करते हैं, भूमिका का निर्धारण करते हैं तथा सामाजिक घटनाओं एवं समस्याओं के मू ल्यांकन को सम्भव बनाते हैं।

कॉस ने समाज कार्य के 10 प्राथमिक मूल्यों का उल्लेख किया है

1-      मनुष्य की महत्ता तथा गरिमा

2-      मानव प्रकृति में पूर्ण मानवीय विकास की क्षमता

3-      मतभेदों के लिए सहनशीलता

4-      मौलिक मानवीय आवश्यकताओं की सन्तुष्टि

5-      स्वाधीनता में विश्वास

6-      आत्म निर्देशन

7-      अनिर्णायक प्रवृत्ति

8-      रचनात्मक सामाजिक सहयोग

9-      कार्य का महत्व तथा रिक्त समय का रचनात्मक उपयोग

10-   मनुष्य एवं प्रकृति द्वारा उत्पन्न किए गए खतरों से अपने अस्तित्व की रक्षा

कोनोप्का ने समाज कार्य के 2 प्राथमिक मूल्यों का उल्लेख किया है:

1-      प्रत्येक व्यक्ति का आदर तथा प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षमताओं के पूर्ण विकास का अधिकार।

2-      व्यक्तियों की पारस्परिक निर्भरता तथा एक-दूसरे के प्रति अपनी योग्यता के अनुसार उत्तरदायित्व।

संयुक्त राष्ट ने समाज कार्य के निम्न दार्शनिक एवं नैतिक मूल्यों  एवं मान्यताओं का उल्लेख किया है।

1-      किसी व्यक्ति की सामाजिक पृष्ठभूमि स्थिति, जाति, धर्म, राजनैतिक विचारधारा तथा व्यवहार को ध्यान में रखे बिना उसके महत्व, मूल्य या योग्यता को मान्यता प्रदान करना तथा मानव प्रतिष्ठा एवं आत्म-सम्मान को प्रोत्साहित करना।

2-      व्यक्तियों, वर्गों एवं समुदाय के विभिन्न मतों का आदर करने के साथ-साथ जन कल्याण के साथ उनका सामन्जस्य स्थापित करना।

3-      आत्म-सम्मान एवं उत्तरदायित्व पूरा करने की योग्यता बढ़ाने की दृष्टि से स्वावलम्बन को प्रोत्साहित करना।

 

4-      व्यक्तियों, वर्गों अथवा समुदायों की विशेष परिस्थितियों में संतोषमय जीवन निर्वाह करने हेतु समुचित अवसरों मे वृद्धि करना।