सामाजिक समूह कार्य में समूह निर्माण - Group Formation In Social Group Work.

सामाजिक समूह कार्य प्रणाली में समूह निर्माण एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रक्रिया है क्योंकि इसी प्रक्रिया के माध्यम से सेवार्थी को सेवाएँ प्रदान की जाती है। कार्यकर्ता एवं संस्था दोनों के लिए समूह एक आवश्यक साधन व यंत्र होता है जिसका प्रयोग कर उद्देश्यों का निर्धारण करने से लेकर लक्ष्य प्राप्ति तक संपूर्ण कार्य किये जाते है। कुछ समूह तो स्थायी रूप से संस्था के अंग होते है लेकिन कुछ समूह अस्थायी होते है जो लक्ष्य प्राप्ति हेतु समूह में सम्मिलित किये जातें हैं। कुछ समूह आकार में छोटे होते है तो कुछ समूह आकार में बडे होते है, कुछ समूह संगठित होते है कुछ असंगठित होते है, कुछ समूहों का संरचनाओं के आधार पर उनका निर्माण किया जाता है। अतः समूहों की संख्या, स्थायित्व, संरचना, समूह लक्ष्य पर अधिक निर्भर करती है।  समूह निर्माण लघु परिवर्तनों के साथ एकल प्रक्रिया नहीं है। यह बिल्कुल अलग घटनाक्रम, नए और भिन्न समूहों के निर्माण का परिणाम हो सकता है। कार्टराइट और जैंडर (1968) ने तीन अलग-अलग परिस्थितियों की पहचान की है जिसमें समूह अपने अस्तित्व  में आता है, ये हैं-




v सुविचारित निर्माण- एक या उससे अधिक लोग अपने कुछ उद्देश्यों को पूरा करने के लिए समूह निर्माण करते हैं। सुविचारात्मक निर्माण  अथवा ‘‘निर्मित’’ समूह, बाहर के अभिकर्ता समूह के लिए लोगों को काम करने के लिए तैयार करते हैं और समूह के उद्देश्य के अनुसार विशेष प्रकार के पदों से सज्जित करते हैं। अनेक कार्य समूह, समस्या  समाधान समूह, चिकित्सा समूह, सामाजिक क्रिया समूह तथा सलाहकार मध्यस्थ समूह और सबसे अधिक समूहों की भरमार सामाजिक मनोविज्ञान तथा शैक्षिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए निर्मित सभी समूह इसी श्रेणी के अन्दर आते हैं। v स्वैच्छिक निर्माण- समूह का निर्माण अन्‍तवैयक्तिक रूचि व इच्छाओं के आधार पर होता है। समूह का निर्माण इसलिए होता है कि लोग एक साथ मिलकर अपनी इच्छाओं को पूरा करना चाहते हैं। उदाहरण के लिए, मित्रता समूह या मैत्री समूह, गैंग और व्यावसायिक समूह इत्यादि।
ü बाहरी पद- इसका निर्माण इसलिए होता है कि लोग उनके साथ समजातीय के रूप में व्यवहार करते हैं। यह बाहरी पदों का सृजन समूहों के सुविचारित निर्माण की दिशा में ले जा सकता है।
ü समूह नियोजन- समूह का निर्माण कुछ विशिष्ट उद्देश्यों को लेकर किया जाता है जैसे- कुछ कार्यक्रम संबंधी, कुछ विशेष व्यवहार, अतिसक्रीय या क्रोधी लोग या असामाजिक बच्चों संबंधी, कुछ सामान्य रोग संबंधी, विशिष्ट लक्षणों संबंधी एवं परिस्थि‍ति संबंधी इन समस्त उद्देश्य संबंधी समूहों को नियोजित करने की समाज कार्य समूह की सफलता के लिए एक व्यापक योजना की आवश्यकता होती है। नार्दन तथा कुरलैंड (2001, पृ. 109-111) के अनुसार समूह की प्रथम बैठक से पहले नियोजन करना आवश्यक है, इसमें सोचना या विचार करना, तैयारी, निर्णय लेना और सामाजिक कार्यकर्ता के कार्यों इत्यादि की योजना शामिल है।’’ समूह कार्य हेतु नियोजन को और अधिक निम्न बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है-


ü आवश्यकता - समूह सदस्य वह निर्धारित करते है कि परिप्रेक्ष्य के संदर्भ में कौन सी समस्याएँ, मुद्दे और क्षेत्र हैं।
ü उद्देश्य - समूह के सामूहिक प्रयासों का समापन और उद्देश्य क्या होंगे?समूह के सदस्यों के व्यक्तिगत उद्देश्य क्या होंगे ?
ü संयोजन- समूह में कितने व्यक्ति सदस्य होंगे ?उनके बीच कौन से महत्वपूर्ण बिंदु समान होंगे और कौन से भिन्न बिंदु होंगे ?
ü संरचना- समूह संचालन की विशेष व्यवस्था तथा सुविधाएँ क्या होंगी ?विशिष्ट रूप से समय और स्थान की क्या व्यवस्था  होंगी ?
ü विषय- समूह में वास्तविक विषय क्या होगा या उसमें क्या किया जाएगा ?
ü पूर्व-समूह संपर्क- यदि कार्यकर्ताओं द्वारा समूह सदस्य पहले से निश्चित किया जा हैं तो ऐसी स्थिति में संयोजन की प्रक्रिया आरम्भ होती है। जैसे यदि एक ही अस्पताल में रहने वाले बीमार व्यक्ति। कार्यकर्ता अब सदस्यों की  आवश्यकताओं के बारे में जानकारी प्राप्त करेंगे। समूह में व्यक्तियों की प्रतिबद्धताओं की क्षमताओं तथा प्रोत्साहनों की जानकारी लेंगे। समूह पूर्व संपर्क में उद्देश्यो, संरचना, विषय एवं व्यस्तता आदि सम्मिलन के निर्धारण के संदर्भ मेंबतायेंगे।