समूह विकास के चरण - Stages Of Group Development - Detailed Information

समूह विकास के चरण - Stages Of Group Development - Detailed Information

समूह एक गतिशील प्रक्रिया हैं इस प्रक्रिया में निरंतर परिवर्तन होता रहता है । कार्यकर्ता समूह-सदस्यों की इच्छाओं एवं उद्देश्यों की पूर्ति के लिए कार्यक्रमों का आयोजन करता है जिससे वे उद्देश्य प्राप्त करने की दिशा में प्रयास करते हैं। अतः समूह विभिन्न स्तरों से होकर गुजरता है। इन्हीं मुख्य चरणों का विस्तृत वर्णन नीचे प्रस्तुत किया जा रहा हैं :

प्रथम अवस्था - योजना और समूह निर्माण (आरंभ चरण)

योजना और समूह निर्माण के आरंभिक चरण में कार्यकर्ता द्वारा समूह निर्माण की आवश्यकता पर बल दिया जाता है और समूह निर्माण के लिए पहल की जाती है । जब समूह कार्यकर्ता समूह निर्माण की आवश्यकता की पहचान कर लेता है तो वह समूह निर्माण की योजना तैयार करता है। इसके लिए कार्यकर्ता को अपनी व्यावसायिक पृष्टभूमि के साथ कुछ प्रश्‍नों के उत्तर अत्यंत ही सावधानीपूर्वक और क्रमबद्ध ढंग से देने पड़ते है। ये प्रश्‍न निम्नलिखित हैं-

समूह क्यों होता है?यहाँ कार्यकर्ता को समूह निर्माण की आवश्यकता पर ध्यान देना  होता है कि यह किन उद्देश्यों और लक्ष्‍यों को पा सकता है और किस हद तक उसे पाने में सफल होता है?

समूह का निर्माण किसके लिए हो रहा है? समूह से सम्बद्ध होने वाले सदस्यों के प्रकार पर विचार करना तथा सदस्य को भर्ती करने की योग्यता का मापदण्ड निर्धारित करना।

कितने सदस्‍य इसके अन्तर्गत समूह के सदस्यों की संख्या को देखा जाता है । सदस्यों की संख्या कम या अधिक होनी चाहिए ।

समूह निर्माण की सम्भावित समयावधि और बैठकों की संख्या के संदर्भ में ध्यान केंद्रित किया जाता है ।

समूह में सदस्यों की संलिप्तता को कैसे सुनिश्चित किया जाए?समूह सदस्य और कार्यकर्ता समूह क्रियाओं को सुनिश्चित करने के लिए जो आपसी सहमति बनाते है, वह समूह के उद्देश्यों की पुष्टि तक चलती रहती है।

उपर्युक्त प्रश्‍नों को उठाये जाने के बाद समूह कार्यकर्ता द्वारा कुछ आवश्यक योजनाओं का निर्माण किया जाता है जिससे समूह निर्माण की योजना को प्रभावी बनाया जा सकें । इसलिए कार्यकर्ताओं के द्वारा निम्न आवश्यक कदम उठाने की आवश्यकता होती है -

समूह उद्देश्य का निर्धारण - 

समूह कार्यकर्ता को भली-भांति यह ज्ञान होना चाहिए कि समूह का निर्माण किन उद्देश्यों को ध्यान में रखकर किया जा रहा है अर्थात समूह का निर्माण क्यों हो रहा है और इसका उद्देश्य क्या होगा? कार्यकर्ता को यह ध्यान में रखना चाहिए कि जिस समूह का निर्माण वह करने जा रहा है उसका अंतिम लक्ष्य समूह के सदस्यों की आवश्यकताओं की पूर्ति करना है और समूह को सक्षम बनाना है। अतः कार्यकर्ता को समूह सदस्यों के साथ मधुर संबंध स्थापि‍न होना चाहिए जिससे समूह सदस्यों को अपनी भावनाओं को स्पष्ट कर सकें जिससे लक्ष्य प्राप्ति में आसानी होगी। साथ ही कार्यकर्ता को यह विश्‍वास भी दिलाना होगा कि समूह का निर्माण कार्य क्षेत्रों की सीमा के अन्दर होगा और उनके हितों और सेवाओं के विरूद्ध नहीं जाएगा।

समूह की बनावट - 

समूह के उद्देश्य का निर्धारण करने के पश्‍चात यह निर्धारित कर लेना चाहिए कि रचना समूह की किस प्रकार की होगी और किस रूप में होगी? क्या यह समरूप में होगा या विषम रूप में? समरूप का अर्थ हैं सदस्यों के बीच आयु, शैक्षिक पृष्ठ भूमि, सामाजिक वर्ग तथा अन्य हितों में साझेदारी करना। समरूपता से समूह और अधिक शक्तिशाली बनता हैं । साथ ही यह समूह निर्माण में मुख्य भूमिका अदा करती हैं। समूह कार्यकर्ता को समूह की आवश्यकताओं और लक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए समूह की बनावट का निर्णय लेना चाहिए ।

समूह का आकार - 

समूह में कितने सदस्य होंगे? उसका आदर्श मानक क्या होगा? कि समूह का आकार कितना बडा होगा या कितना छोटा? इन संपूर्ण प्रश्‍नों के उत्तर समूह कार्यकर्ता के मन में होने चाहिए । समूह के आकार के संबंध में कोई निश्चित पैमाना नहीं है जिसे आधार मानकर यह निश्चित किया जा सके कि समूह का आकार क्या होगा? सामान्य तौर पर यह समूह के उद्देश्यों, उसकी प्रबंधकीय,समय-सीमा,स्थान,धन और आवश्यक नियंत्रणों पर निर्भर करता है। अनेक विद्वानों के अनुसार आठ से पंद्रह सदस्यों के आकार वाला समूह श्रेष्ठ आकार का हो सकता है।

सदस्यों की भर्ती - 

सदस्यों की भर्ती के संदर्भ में यह कहा जाता है कि कार्यकर्ता द्वारा सम्भावित सदस्यों को समूह के गठन के विषय में सूचित करें। यह सूचना सम्भावित सदस्यों को सीधे ही अथवा अभिकरण के सूचनापट्ट पर सूचना चिपकाकर या समाचार-पत्रों, रेडियों, टीवी आदि संचार माध्यमों में विज्ञापन के माध्यम से दी जा सकती है और रूचिशील सदस्यों से आवेदन आमन्त्रित किए जा सकते हैं। यहाँ कार्यकर्ता का दायित्व होता है कि योग्यता के स्थापित मापदण्डों के आधार पर आवेदकों की उपयुक्त जांच करना। इन मापदण्डों में कार्यकर्ता द्वारा समूह सदस्यों हेतु आवश्यकता की सीमा का निर्धारण, हस्तक्षेप की अविलम्बता, जनसांख्यिकीय विशेषताएँ, अनुभव और अन्य कौशल शामिल हैं। कार्यकर्ता आवेदकों की उपयुक्तता सुनिश्चित करने के लिए उनसे साक्षात्कार का भी प्रबंध कर सकता है और समूह की सदस्यता लेने से संबंधित उनकी शंकाओं का निवारण भी कर सकता है।

बैठकों का समूह और स्थान - 

समूह बैठकों हेतु कार्यकर्ता को समूह के सदस्यों के साथ मिलकर यह निर्धारित कर लेना चाहिए कि समूह में बैठको का आयोजन किस अंतराल में और कब-कब होगा साथ ही किस स्थान पर बैठकें आयोजित की जायेंगी यह भी निर्धारित कर लेना चाहिए।

समूह की अवधि- समूह  :- 

मुख्य रूप से दो प्रकार के बनायें जाते है दीर्घकालीन समूह और अल्पकालीन समूह यह समूह के लक्ष्य पर निर्भर करता है कि समूह दीर्घकालीन होगा या अल्पकालीन । समूह का उद्देश्य पूर्ण हो जाने के पश्चात इसे समाप्त किया जा सकता है और इसके लिए अनुमानित समय निर्धारित किया जा सकता है। फिर भी समय निर्धारित करने का निर्णय करते समय लचीलापन होना चाहिए।

अनुबन्धन - 

समूह का निर्माण करते समय समूह सदस्यों और कार्यकर्ताओं के मध्य एक अनुबंधन होना चाहिए जिसमें समूह सदस्यों और कार्यकर्ताओं के दायित्व का निर्वहन होता है, जिनमें सत्रों में नियमित रूप से और समय पर उपस्थित रहना होता है। किसी भी अनुबंधित कृत्य अथवा कार्य को पूरा करना, समूह की चर्चाओं की गोपनीयता को बनाए रखना और ऐसा कोई भी व्यवहार न करना हो, जो समूह की भलाई के विरूद्ध जाता हो। अनुबंध लिखित एवं मौखिक दोनों प्रकार से हो सकता है। इस अनुबंध में यह निर्धारित किया जाता है कि समूह नियोजित तरीके से चलेगा और समूह प्रक्रमों को कारगर ढंग से चलाने के लिए उपयुक्त वातावरण के निर्माण को सुगम बनाया जायेगा।

अतः इस प्रकार से समूह कार्य की प्रथम अवस्था के प्राथमिक चरण द्वारा समूह के संदर्भ में योजना का निर्माण किया जाता है एवं समूह के सफल संचालन हेतु योजना का निर्माण किया जाता है।

द्वितीय अवस्था : पर्यवेक्षण (आरंभिक सत्र चरण)- 

प्रथम अवस्था में समूह निर्माण और योजना के निर्माण पश्चात द्वितीय अवस्था में (जिसे समूह का आरंभिक सत्र भी कहा जाता है।) पर्यवेक्षण का कार्य किया जाता है। पर्यवेक्षण कार्य के माध्यम से समूह सदस्यों में दिशा निर्धारण का कार्य किया जाता है। यह चरण सदस्यों में संबद्धता और एकात्मकता की भावना विकसित करने की शुरूआत करता है। इस अवस्था में मुख्य रूप से निम्नांकित कार्य किये जाते है - 

दिशा निर्धारण एवं प्रवेश - समूह कार्य में आरंभिक सत्र एक महत्वपूर्ण विधा के रूप में माना जाता है। किसी भी प्रक्रिया में आरंभ का अत्यधिक महत्व रहता है इसलिए कहा भी जाता है कि मकान के निर्माण हेतु नींव जितनी अधिक मजबूत होगी मकान का निर्माण भी उतना ही अधिक मजबूत होगा। अतः इसी आधार पर समूह कार्य की आरंभिक प्रक्रिया में समूह की सफलता और असफलता निर्भर करती है। इस प्रक्रिया के अंर्तगत प्रत्येक कार्यकर्ता को प्रत्येक सदस्य से अपना परिचय करना चाहिए और समूह निर्माण के उद्देश्यों को भी स्पष्ट कर देना चाहिए। सदस्यों में सहभागिता का भाव जाग्रत करते हुऐ उन्‍हें आत्मविश्‍वास दिलाना चाहिए जिससे वे अपना परिचय स्पष्ट रूप से दे सकें। आरंभिक सत्रों में सदस्यों  को निश्चित संवेदनशीलता के साथ समूह में शामिल किया जाता है ताकि उनकी सांत्वना और सहजता की भावना का स्तर ऊँचा रख जा सके। समूह कार्य आरंभिक प्रक्रिया में कुछ सदस्य एक-दूसरे से अपरिचित रहते है इस कारण से उनमें हिचकिचाहट अधिक देखने में नजर आती है अतः उनमें आपसी स्वीकारता का भाव जाग्रत करना चाहिए। ऐसा करने से समूह सदस्य अपने लक्ष्य को प्राप्त करनें में लग जाते है और उनमें आपसी सामंजस्य स्थापित हो जाता है और समूह में प्रवेश प्रक्रिया भी प्रारंभ हो जाती है।

सदस्यों की रूपरेखा तैयार करना- 

जैसे सदस्यों  की आवश्यकता एक-दूसरे के बारे में जानने की होती है उसी तरह कार्यकर्ता को भी सदस्यों  के बारे  में गहराई से जानना और अवलोकन करना चाहिए। कार्यकर्ता को प्रत्येक सदस्य  की एक रूपरेखा बनानी चाहिए जिसमें उसकी आयु, पारिवारिक पृष्ठ भूमि, शारीरिक विशेषताएं, आदतें, रूचियाँ शामिल हो। यदि इसे आरंभिक सत्रों  में एकत्रित तथ्यों का अवलोकनों के आधार पर बनाया जाए तो यह सहायता प्रदान करेगा। यह न केवल समूह सदस्यता स्तरों  को व पारस्परिक संपर्क अच्छी तरह समझने में उसकी सहायता करेगा अपितु समूह कहाँ से आरंभ किया जाए इसमें भी सहायक होगा। पुनः यह एक अवधि के बाद विकास की योजना बनाने में विशेषत: मूल्यांकन की अवस्था में भी सहायता प्रदान करेगा।

विशिष्ट उद्देश्य निर्धारित करना- 

समूह कार्य में प्रायः उद्देश्य का निर्धारण पूर्व में ही कर लिया जाता है लेकिन इसके पश्चात भी समूह सदस्यों के बीच संघर्ष की स्थिति उत्पन्न होने के पश्‍चात कुछ विशिष्ट उद्देश्य का निर्माण भी किया जाता है जिससे कार्यक्रम की योजना का आधार तैयार हो सकें । यहाँ कार्यकर्ता को व्यवहार या सामाजिक परिवर्तन का अभीष्टम स्तर निर्धारित करने में समूह की सहायता करनी होती है। यद्यपि पहली अवस्था में कुछ उद्देश्यों को ध्यान में रखकर समूह की रचना की जा चुकी है तो भी इस अवस्था में लक्ष्यों को विशेषरूप से प्रस्तुत करना होता है। इस गतिविधि के माध्यम से समूह कार्यकर्ता द्वारा समूह के सदस्यों को सक्रिय भागीदार होने के लिए प्रोत्साहित करता है, और यदि सदस्यों में कुछ विशेष प्रकार की आदते जैसे- धूम्रपान,तंबाकू खाने की आदत इत्यादि हो तो व्यवहार परिवर्तन में समूह की सहायता करता है।

संरचना का निर्माण-   

संरचना निर्माण द्वारा सदस्यों को इस आधार पर तैयार किया जाय जिससे वे अपनी भूमिका और जिम्मेदारियों को समझ सकें। इसके लिए समूह सदस्यों को प्रोत्साहित करना चाहिए। सदस्यों को उनकी क्षमताओं ओर योग्यताओं के आधार पर कार्यों का बँटवारा कर देना चाहिए और उन्हें उनकी क्षमताओं के संदर्भ में भी अवगत कराना चाहिए। समूह कार्यकर्ता का दायित्व होता है कि वह समूह सदस्यों में छुपी हुई योग्यताओं को सामने लायें ओर उन्हें प्ररित करें। इस अवस्था में एक क्रियात्मक संगठन का उदय होना चाहिए ताकि सदस्य सक्रिय भूमिका ले सके और ज़िम्मेदारी से फैसले कर सके। ‘‘स्वतंत्रता और आत्मनिर्णय के लिए अभिलाषा रखने वाले प्रत्येक समूह को अपने स्थापित सदस्योंका तरीके से व्यवस्थित करना होता है कि वे स्वयं को संगठितकह सकें। एक औपचारिक संगठन के साथ समूह अपने लचीलेपन और परिपक्वता के साक्ष्य देना आरंभ कर देता है। समूह को जिम्मेदारी उठाने के लिए सक्रिय करने के बाद वह अगली अवस्था  में जाने के लिए तैयार हो जाता है।

तृतीय अवस्था : निष्पानदन (कार्य चरण) - 

प्रथम एवं द्वितीय चरण पूर्ण कर लेने के पश्‍चात अब समूह परिपक्व स्थिति में नजर आने लगता है और समूह अपने क्रियाशील चरणों की ओर बढने लगता है अतः तृतीय चरण में वह निष्पादन कार्य आरंभ कर देता है जिसे कार्य चरण भी कहा जा है और निम्नलिखित गतिविधियों के माध्यम से चरण को पूर्ण करता है : 

क्रियात्मक चरण -  इस अवस्था में समायोजन और प्रगति के लिए अवसर प्रदान करने के लिए बनाए गए कार्यक्रम, अनुभवों के प्रावधानों पर ध्यान केंद्रित किया जाता है। कार्यक्रम का आधार कार्यों पर निर्भर करता है कि कार्यक्रम दीर्घकालीन होगा या अल्पकालीन । यह अवस्था एक महत्वपूर्ण अवस्था के रूप में मानी जाती है क्योंकि इस अवस्था तक आते-आते समूह सदस्य एक-दूसरे को गंभीरता से लेने लगते है। कार्यों का निर्धारण सही रूप से हो जाता है और समूह सदस्य कार्यक्रमों में भागीदारी प्रारंभ कर देता है। इस चरण में गतिविधियाँ बढ़ जाती है क्योंकि कार्यक्रम की योजना और क्रियान्वयन में पर्याप्त समय लगाया जाता है उनका एक समूह बना दिया जाता है। समूह कार्यकर्ता उनकी गाने और अभिनय की योग्यताएं देखने के बाद उन्हें एक संगीतमय नाटक करने के लिए प्रोत्साहित करता है। समूह प्रेरित होता है और आलेख लिखने, गीत बनाने में और नृत्य कलाएं बनाने में लग जाता है। 

समुदाय के समर्थन की सहायता से समूह अपना पहला नाटक प्रदर्शित करता है और धीरे-धीरे एक स्थापित नाट्यशाला समूह बन जाता है। क्रियात्मक चरण में आलेख लिखने, गीत रचना करने तथा प्रदर्शन के लिए निरंतर तीव्र अभ्यास करने से सदस्यों का अत्यधिक समय और प्रयोग करने में वे काफी व्यस्त रह सकते हैं। अब कार्यकर्ता समूह सदस्यों को जिम्मेदारियां देना प्रारंभ कर देता है जिससे समूह तेजी से आगे बढने लगता है और अनेक कार्यक्रम बनना प्रारंभ हो जाते है। साथ ही साथ नेतृत्व की भावना का भी विकास होना प्रारंभ हो जाता है। यह समूह कार्य प्रक्रिया का सर्वाधिक क्रियात्मक चरण होता है तथा इस चरण में अत्यधिक समय व्यतीत हो जाता है । अब समूह अपने लक्ष्य प्राप्त करने के लिए पूर्ण रूप से अपने पथ पर अग्रसर हो जाता है और कार्यक्रम की योजना विकास, उसका क्रियान्वयन करना प्रारंभ कर देता है।

कार्यक्रम की योजना एवं क्रियान्वयन - 

समूह कार्य प्रक्रिया में कार्यक्रम एवं क्रियान्वयन एक महत्वपूर्ण विधा मानी जाती है जिसके माध्यम से सदस्य-सदस्य और कार्यकर्ताओं के मध्य आपसी समन्वय,नेतृत्व की भावना, सामूहिकता की भावना आदि का विकास हो जाता है। यह गतिविधि सदस्यों की क्षमताओं और उनकी योग्यताओं पर निर्भर रहती है ।यह कला और शिल्प  से लेकर संगीत, नृत्य, सामाजिक घटनाएं तथा पिकनिक व भ्रमण तक हो सकता है। इस अवस्था में समूह के अंदर कार्यक्रम के प्रति रूचि जागृत होने की संभावना रहती है। हो सकता है प्रारंभ में समूह सदस्य इस प्रक्रिया में अत्यधिक उत्सुकता ना दिखाएँ पर जैसे-जैसे यह गतिविधि क्रियान्वित होती है सदस्यों की संख्या में भी वृद्धि होती जाती है। कार्यक्रम का विकास सरल से जटिलता की तरफ होना चाहिए जिसमें गति के साथ योग्यता और तत्परता के रूप में समूह की प्रगति के रूप में परिणाम नजर आना चाहिए।

कार्य समापन - 

जब ऐसा प्रतीत होने लगे कि अब समूह आगे बढ़ने के लिए तत्पर है तो कार्यकर्ता को सदस्यों द्वारा विभिन्न और अपेक्षित अनुभवों की अपनी अभिलाषा जानने में मदद करनी चाहिए। जब समूह के सदस्य अपने अभावों को पूरा करने के लिए अपनी इच्छाएँ अभिव्यक्त करने लगे और अपने कार्य में सुधार कर लें तो मान लेना चाहिए कि वे अपने विकास में उन्नत बिंदु पर पहुँच गए हैं। हो सकता है जो कार्यक्रम आत्मकेंद्रित रहे हों  तो उन्हें अपेक्षाकृत बड़े अभिकरण और सामुदायिक उद्देश्यों  पर जोर देने के लिए परिवर्तित किया जाना चाहिए। जब समूह को अपनी क्षमताओं पर भरोसा हो जाता है तो मूल्यांकन में काफी समय लगता है’’ (ट्रेक्कर, 1955)। अनेक बार ऐसा होता है कि जब सदस्य कार्यक्रम करता है और लक्ष्य की और अग्रसर होता है तो अनेक समस्याएँ समूह में आ जाती है जोकि समूह लक्ष्य प्राप्ति में बाधक बनती है ऐसी स्थिति मे समूह कार्यकर्ता को मध्‍यस्‍थता की भूमिका अदा करनी चाहिए और समस्या के समाधान हेतु सहायता करनी चाहिए।

प्रगति पर नजर रखना-

 जैसे-जैसे प्रक्रिया आगे बढती है समूह अपने आप में सक्षम होता जाता है। अब इस स्थिति में समूह कार्यकर्ता समूह से अपने कदम पीछे करना प्रारंभ कर देता है और दूर से ही समूह पर अपनी नजर बनायें रखता है। जैसे-जैसे वह समूह लक्ष्य की ओर आगे बढता जाता है कार्यकर्ता अपने को पीछे करता रहता है और समूह की तरफ अपनी नजर बनाये रखता है।

चतुर्थ अवस्था : मूल्यांकन (विश्लेषण चरण)- 

मूल्यांकन एक सतत और निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है जिसके माध्यम से समूह के प्रत्येक पहलू का अध्ययन किया जाता है। मूल्यांकन को परिभाषित करते हुऐं है मिल्टन गार्डन (1952) ’’ने बताया है कि , मूल्यांकन निर्णय करने वाली एक प्रक्रिया है जो निश्चित करती है कि व्यक्ति, कार्यकर्ता तथा संस्था का क्या उत्तरदायित्व है ? उनको पूरा करने की कितनी क्षमता है? क्या-क्या शक्तियाँ है? कौनसे कार्य रचनात्मक सहयोग प्रदान करते है तथा कौन से कार्य समस्या को जटिल बनाते हैं। इस प्रकार मूल्यांकन उद्देश्य का दार्शनिक एवं नैतिक ज्ञान है। मूल्यांकन प्रक्रिया के माध्यम से समूह कार्य के प्रत्येक पहलू पर पुनः ध्यान दिया जाता है जिससे यह प्रतीत हो जाता है कि संपूर्ण प्रक्रिया में कोई गलती तो नही हुई है यदि कुछ गलत हुआ हो तो उसे सही कैसे किया जाय

एवं जो सकारात्मक पहलू प्राप्त हुऐ हैं उन्हें और अधिक प्रभावी कैसे बनायें जाय? इन समस्त बातों पर ध्यान दिया जाता है। सभी सामूहिक प्रयत्नों में मूल्यांकन आवश्यक समझा जाता है। यह संस्था अथवा समूह का आवश्यक अंग होता है तथा कार्यकर्ता का प्रथम उत्तरदायित्व है कि वह इस दिशा में सदैव प्रयत्नशील रहें। संस्था के लिए मूल्यांकन आवश्यक समूह-प्रक्रिया पर निर्भर होता है। अतः अच्छे प्रशासन के लिए मूल्यांकन करना आवश्यक होता है। इससे क्षमताओं एवं उपलब्धियों का ज्ञान होता है। समूह-क्रियाओं का मूल्यांकन सदैव उद्देश्यों को ध्यान में रखकर करना चाहिए अर्थात् तुलनात्मक अध्ययन मूल्यांकन का एक आवश्यक अंग है।

ट्रेकर ने मूल्यांकन प्रक्रिया को निम्नलिखित प्रकार से दर्शाया हैः-

ट्रेकर द्वारा चित्र प्रदर्शन से ज्ञात होता है कि मूल्यांकन का कार्य सामूहिक कार्य के प्रारम्भिक स्तर से प्रारम्भ होकर समाप्ति स्तर तक चलता रहता है। मूल्यांकन की प्रक्रिया द्वारा निम्नलिखित तथ्यों को ज्ञात किया जा सकता है-

समूह उद्देश्य का निर्धारण - 

कार्यकर्ता सर्वप्रथम समूह के सदस्यों का वैयक्तिक अध्ययन करता है। उनकी इच्छाओं, अभिलाषाओं, आवश्यकताओं का पता लगाता है। इन आवश्यकताओं का मूल्यांकन करता है कि उन्हें किस प्रकार से सामूहिक आवश्यकता के रुप में प्रदर्शित किया जा सकता है।

विकास के मानदण्ड का निर्धारण:- उद्देश्य निर्धारण पश्‍चात समूह-सदस्यों को उनके विषय में विस्तृत जानकारी देता है तथा सामूहिक विकास की प्रक्रिया का निर्धारण करके विकास की गति का अनुमान लगाता है। वह समूह की योग्यताओं, क्षमताओं तथा निपुणताओं का मूल्यांकन करके विकास के मानदण्ड निश्चित करता है।

कार्यक्रम की योजना का निर्माण:- 

वह कार्यक्रम का मूल्यांकन करके ऐसे कार्यक्रमों को समूह के लिए चुनता है जो समायोजन तथा विकास के अधिकतम अवसर प्रदान करते है। ये कार्यक्रम दीर्घ तथा लघु कालीन दोनों प्रकार के होते है। इसका निर्धारण लघुकालीन एवं दीर्घकालीन उद्देश्यों के आधार पर किया जाता है।

अभिलेखन करना:- 

कार्यकर्ता समूह में होने वाली महत्वपूर्ण क्रियाओं का अभिलेखन करता है। यह कार्यकर्ता की मूल्यांकन योग्यता पर निर्भर होता है कि वह किस प्रकार और कौन-कौन-सी परिस्थितियों का अभिलेखन करता है।

अभिलेखों का विश्लेषण :- अभिलेखों के लेखन पश्चात वह इन अभिलेखों के आधार पर व्यक्ति सदस्य के व्यवहार एवं भागीकरण का विश्लेषण करता है। समूह के प्रत्युत्तरों का अध्ययन करता है, कार्यक्रम की उपयुक्तता-अनुपयुक्तता का अध्ययन करके उनकी उपयोगिता निश्चित करता है। कार्यकर्ता स्वयं अपनी भूमिका का विवेचन करता है।

उद्देश्यों की प्राप्ति का स्तर:- अभिलेखों के विश्लेषण से कार्यकर्ता इस बात को जानने का प्रयास करता है कि समूह अपने कार्यकलापों के माध्यम से किस सीमा तक उद्देश्यों को प्राप्त करने में सफल हो पाया है।

कार्यक्रम, विषयवस्तु तथा प्रणाली का पुनरावलोकनः- कार्यकर्ता कार्यक्रमों का विश्‍लेषण एवं विवेचन करता है। उनकी उपयोगिता निर्धारित करता है। उनकी विषयवस्तु का निर्धारण समूह की उन्नति के अनुसार करता है। जो प्रणालियां या ढंग कार्यक्रमों के संचालन में उपयोग में लाये गये है, उन पर प्रकाश डालता है।

उद्देश्यों का संषोधनः- उपरोक्त क्रियाओं पश्‍चात कार्यकर्ता यदि आवश्यक समझता है तो उद्देश्यों में परिवर्तन करता है। उद्देश्यों में संशोधन करना इसलिए आवश्यक हो जाता है कि समूह -अनुभव से उसकी अंतर्दृष्टि बढ़ती है जिससे लक्ष्यों का विस्तार भी होता है। इस प्रकार यह प्रक्रिया निरन्तर कार्य करती रहती है।

अतः इस प्रकार से समूह कार्य प्रक्रिया में मूल्यांकन अवस्था को महत्वपूर्ण माना जाता है जो चौथा और महत्वपूर्ण चरण के रूप में जाना जाता है।

पंचम अवस्था : समापन (अंतिम चरण)

समापन अवस्था एक भावनात्मक अवस्था होती है क्योंकि समूह के प्रत्येक सदस्य एक साथ कार्य करने के कारण एक-दूसरे के साथ भावनात्मक रुप से जुड़ जाते है एवं इस अवस्था में समूह के समापन होने के कारण एक-दूसरे से बिछुड़ते या अलग होते है। इस अवस्था मे किए गए कार्यों का मूल्यांकन किया जाता है इस अवस्था मे समूह का उद्देश्य पूर्ण हो जाता है। अतः अब इस समापन प्रक्रिया मे समूह के सदस्य समूह से अलग हो जाते है। प्रत्येक समूह के जीवन में ऐसा समय आता है जब इसका अंत होता है जो एक सकारात्मक या नकारात्मक अनुभूति होती है जब यह कहा जाए कि समूह ने अपने लक्ष्य प्राप्त कर लिए हैं और समूह कार्यकर्ता एक उपयुक्त प्रक्रिया द्वारा इसके अच्छे  ढंग से समाप्त करने के बारे में निश्चित हो तो समूह का सकारात्माक समापन होना माना जाता है। 

कुछ विद्वानों का मानना है कि समूह कार्य प्रारंभ के समय ही समापन की तिथि को घोषित कर देना चाहिए जिससे की समूह सदस्यों को यह ज्ञात रहें कि हमें कितने समय में लक्ष्य प्राप्त करना हैजिस प्रकार समूह कार्यकर्ता ने विकास की पिछली अवस्थाओं में किया था, ठीक उसी प्रकार इस अवस्था में भी उसे यह सुनिश्चित करना पड़ता है कि समूह का समापन उचित तरीके से हो। कुछ विद्वानों ने समूह समापन के निम्नलिखित प्रकारों का वर्णन किया है-

समूह समापन प्रक्रिया को तीन भागों में बांटा जा सकता है-

(1)  उद्देश्य पूर्ण होने पर समापन:- इस प्रकार का समापन समूह जो उद्देश्य लेकर चलता है वह पूर्ण हो जाता है तो समूह का समापन कर दिया जाता है। इस प्रकार समापन उद्देश्य पूर्ण होने पर निर्भर करता है। उद्देश्य पूरा होने पर ही समूह का समापन कर दिया जाता है।

उदाहरण:- अस्पताल में मरीज एक समूह के सदस्य के रुप मे रहता है उसके ठीक होने के बाद छुट्टी दे दी जाती है। अर्थात् समूह का जो उद्देश्य था वह पूरा हो गया है अतः अपने सदस्य को मुक्त कर देता है।

(2) समय सीमा के आधार पर समापन:- इस प्रकार के समापन मे समूह की समय अवधि समाप्त हो जाने पर समूह का समापन कर दिया जाता है। इस प्रकार के समापन में समूह के उद्देश्य पूरा होने या न होने पर आदि पर कम महत्व दिया जाता है इसमें समय अवधि को अधिक महत्व दिया जाता है।

उदाहरणः- उदाहरण के लिए स्कूल मे एन.सी.सी. कैम्प लगता है वह कुछ समय एक हफ्ते पंद्रह दिन आदि के लिये लगता है समय सीमा समाप्त हो जाने पर ग्रुप का समापन कर दिया जाता है।

(3) कानून के आधार पर समापन:- इस प्रकार का समापन समूह का उद्देश्य कानून द्वारा मान्यता प्राप्त नही होता है अर्थात उद्देश्य को कानून द्वारा स्वीकृति नही मिलती है इस प्रकार के समूह का समापन कर दिया जाता है।

समापन अवस्था में कार्यकर्ता के की भूमिका -

समापन की अवस्था में कार्यकर्ता की मुख्य भूमिका होती है कि वह सदस्यो के कार्यों का मूल्यांकन करे। उनके तथा समूह के । Achievements  के बारे मे तथा उनकी कमजोरियों के बारे मे बताये।

इस अवस्था मे कार्यकर्ता का मुख्य कार्य यह है कि वे समूह के सदस्यों के व्यक्तिगत भावों, भावनाओं तथा Termination Phase के वातावरण के मध्य सामंजस्य बनाये रखे।

समूह कार्यकर्ता सदस्यों को समूह छोड़ने के लिये मानसिक रुप से तैयार करे।

कार्यकर्ता को अपने समूह सदस्यों के साथ अनुभव बाँटने चाहिए।

कार्यकर्ता को सदस्यो को यह बताना चाहिए किवे समापन अवस्था को सकारात्मक रुप से ग्रहण करे एवं यह भी बताए कि समूह कार्य में समापन प्रक्रिया प्राकृतिक है।

 

                        अतः अंत में कहा जा सकता है कि समापन समूह कार्य का अहम हिस्सा है। यही कार्यों की मूल्यांकन की अवस्था है। सदस्यों को समापन अवस्था के प्रति जो भाव होते है वह उनके व्यवहार में परिलक्षित हो जाते है। इस प्रकार समूह के समापन की घोषणा होती है। समूह के सदस्यों की भावनात्मक तथा व्यवहारिक प्रतिक्रिया होती है। कुछ समूह के लिए स्पष्ट एवं आश्‍चर्य मिश्रित अनुभव होता है। जबकि कुछ समूह के लिए यह केवल विदाई पार्टी ही होती है। इनमें से कुछ सदस्य अपने भावों पर संयम करते है एवं एक-दूसरे को नये कार्यों के लिए प्रोत्साहित करते है।