सामुदायिक संगठन की प्रक्रिया - Process Of Community Organisation.

लिंडमेन के अनुसार सामुदायिक संगठन की प्रक्रिया 3. क्रॉस के अनुसार सामुदायिक संगठन की प्रक्रिया 4. सैन्डरसन और पौलसन के अनुसार सामुदायिक संगठन की प्रक्रिया 5. टेलर के अनुसार सामुदायिक संगठन की प्रक्रिया 6. अन्य विद्वानों के अनुसार सामुदायिक संगठन की प्रक्रिया
सामुदायिक संगठन की प्रक्रिया
(Process Of Community Organisation)
सामुदायिक संगठन के चरण जिस प्रकार व्यक्तिगत समाज कार्य के अभ्यास में चरण होते है, जैसे अध्ययननिदान और उपचार तीन प्रमुख चरण हैउसी प्रकार सामुदायिक संगठन की प्रक्रिया में भी चरणों की व्याख्या की गयी है। यही चरण सामुदायिक संगठन के अन्तर्गत किसी भी सामुदायिक संगठन परियोजना के संदर्भ में प्रमुख चरण माने जाते है।
लिन्डमैन ने लगभग 700 सामुदायिक परियोजनाओं का अध्ययन करके 10 चरणों की व्याख्या की है। सामुदायिक संगठन में यह चरण निम्नलिखित है। इनके वर्गीकरण में समाजशास्त्रीय एवं मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण मिलता हैः

1.   

आवश्यकता की चेतना : समुदाय के अन्दर या बाहर का कोई व्यक्ति आवश्कता को प्रकटन करता है जो बाद में एक निश्चित परियोजना का रूप ले लेती है।

2. आवश्कता की चेतना का प्रसार समुदाय के अन्दर कोई समूह या संस्था के अन्दर कोई नेता अपने समूह या समूह के एक भाग को इस आवश्यकता की वास्तविकता के विषय में विश्वास दिलाता है।

3. आवश्यकता की चेतना का प्रक्षेपण : समुदाय का जो समूह आवश्यकता की पूर्ति में रूचि रखता हैवह आवश्यकता की चेतना का समुदाय के नेताओं पर प्रक्षेपण करता है और उन्हें आवश्यकता की पूर्ति के लिये तैयार करता है जिससे आवश्यकता की चेतना एक सामान्य रूप ग्रहण कर लेती है। 4. आवश्यकता को तुरन्त पूरा करने का भावनात्मक आवेग : एक भावानात्मक आवेग का उत्पन्न होना और उस आवश्यकता को तुरन्त पूरा करने के लिये कुछ प्रभावशाली सहायता जुटाई जाती है।
5. (आवश्यकता की पूर्ति के लिये) समाधानों का प्रस्तुतीकरण : आवश्यकता की पूर्ति के लिये अन्य समाधानों को समुदाय के सामने रखा जाता है।


6. (आवश्यकता की पूर्ति के लिए) समाधानों में संघर्षः विभिन्न प्रकार के विरोधी समाधान या सुझावों को प्रस्तुत किया जाता है और विभिन्न समूह इनमें किसी एक का समर्थन करते है।

7. अन्वेषण या जॉच पड़ताल  : विशेषज्ञों की सहायता से परियोजना या समस्या की जॉच की जाती है।

8. समस्या के विषय में वाद-विवाद : एक विशाल सभा या कुछ व्यक्तियों के सम्मुख परियोजना या समस्या को प्रस्तुत किया जाता है और वह समूह जो अधिक प्रभाव रखते है अपनी योजनाओं की स्वकृति लेने का प्रयास करते है।

9. समाधानों का एकीकरण : जो भी समाधान सुझाव के रूप में सामने रखे जाते है उनकी परीक्षा करके सभी के अच्छे पक्ष चुनकर एक नया समाधान निकाला जाता है।

10. अस्थायी प्रगति के आधार पर समझौताः कुछ समूह अपनी-अपनी योजना का कुछ भाग त्याग देते है जिसके फलस्वरूप एक समझौता हो जाता है और उसी समझौते के आधार पर कार्य आरम्भ किया जाता है। यह आवश्यक नही कि सभी परियोजनाए इन्ही चरणों के अनुसार ही कार्य रूप में आती  है।

क्रॉस के अनुसार सामुदायिक संगठन की प्रक्रिया में छः प्रमुख चरण देखे जा सकते हैंजैसे-
 1. सेवा के उद्देश्यों का एक निश्चित कथन एवं विवरण।
2. तथ्यों की खोज  : समस्याग्रस्त व्यक्तियों की विशेषताओंसमुदायिक साधनों और सेवाओं की समर्थताए आदि।
  3. साधनों और आवश्यकताओं के बीच वांछित समायोजन के संदर्भ में प्रदान की जा सकने वाली सेवाओं की रूपरेखा।
4. अस्थायी योजना और चुनी गई सेवाओं की वैधता  का परिक्षण करने के लिये जनता के सामने उसे प्रस्तुत करना।
5. मुख्य योजना का विकास जो अस्थायी योजना से अलग होती है और जो परीक्षण पर आधारित अनुभवों के कारण विकसित की जाती है।
6. अन्तिम चरण में इस मुख्य योजना  को सेवा में बदला जाता है या सेवा में कार्यन्वित किया जाता है। इसमें वर्तमान सेवाओं का पुनः संगठनवर्तमान सेवाओं का स्तर ऊँचा करना या उनका विस्तार करना या बिल्कुल नई सेवाओं का निर्माण करना सम्मिलित है।
सैन्डरसन और पौलसन के अनुसार सामुदायिक संगठन के सात प्रमुख चरण है जो इस प्रकार हैः

1. समुदाय का विश्लेषण एवं निदान : जिसमें समुदाय के विषय में पूरी जानकारी प्राप्त की जाती है। समुदाय के ढांचेजनसंख्या का आकारव्यावहारिक विशेषताओं और प्रमुख सामाजिक शक्तियों के विषय में जानकारी प्राप्त की जाती है। सामुदायिक प्रथाओंपरम्पराओं जनरीतियोंमनोवृत्तियोंसम्बन्धोंसंघर्षों नेताओंपरस्पर विरोधी शक्तियों आदि के विषय में ज्ञान प्राप्त किया जाता है।
2. गतिकी : सामान्य आवश्यकताओं के प्रतिसामान्य रूचि का विकास और समुदाय को क्रियाशील बनाने के लिये उनमें उन्नति की इच्छा और वर्तमान परिस्थिति से असन्तुष्टि विकसित की जाती है।
3परिस्थिति की परिभाषा  : समुदाय के विश्लेषण और निदान और उसकी गतिकी को ध्यान में रखकर सामुदायिक परिस्थित की पुनः परिभाषा करके यह निश्चित किया जाता है कि समुदाय के लिये क्या वॉछित है और उसे किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है। व्यक्तियोंसमूहोंसंस्थाओं एवं संगठनों का मत मालूम किया जाता है और इन सब तथ्यों को सामने रखकर सामुदायिक परिस्थिति को पुनः परिभाषित किया जाता है।
 4. औपचारिक संगठन : समुदाय का संगठन समुदाय के आकार और वर्तमान संगठनों की जटिलता को देखकर बनाया जाता है। जब समुदाय बड़ा होता है और उसमें संगठनों की संख्या अधिक होती है तो जो संगठन बनाया जाता है वह समन्वयात्मक  रूप रखता है और उसमें उद्देश्य सभी संगठनों को संगठित किया जाना और उनमें समन्वय लाना होता है।
 5. सर्वेक्षणः औपचारिक संगठन के बाद सामुदायिक दशाओं को समझने के लिए सर्वेक्षण किया जाता है। इसका उद्देश्य समुदाय के विषय में तथ्यों को ज्ञात करना होता है। आरम्भ में एक या दो समस्याओं के पर ही ध्यान दिया जाना लाभदायक होता है। इन समस्याओं के सुलझाने के लिए सर्वेक्षण द्वारा तथ्य एकत्रित किए जाते है।
 6. कार्यक्रम  : जिन आवश्यकताओं के पूरा करने में सदस्यों की सबसे अधिक रूचि होती है और जिनकी संतुष्टि में न्यूनतम संघर्ष की सम्भावना होउसी की पूर्ति के लिये सबसे पहले कार्यक्रम बनाया जाता है। इस अनुभव से जब समुदाय संगठित हो जाता है तो लम्बी अवधि के कार्यक्रम बनाये जाते है। कार्यक्रम की निर्माण में समुदाय के सभी सदस्यों और समूहों को योजना के विषय में अपना मत प्रकट करने और विचार-विमर्श की सुविधा दी जाती है।
7. नेतृत्व : एक प्रभावशाली नेतृत्व के बिना कार्यक्रम का होना पर्याप्त नही होता। समुदाय में से ही नेतृत्व का उत्तरदायित्व स्वीकार करना आवश्यक माना जाता है। बाहर का व्यक्ति समुदाय में चेतना उत्पन्न कर सकता है परन्तु नेतृत्व प्रदान करने का उत्तरदायित्व समुदाय का अपना होता है।
यूनाइटेड नेशन्स ने सामुदायिक विकास और सामुदायिक संगठन को एक दूसरे की पूरक अवधारणा माना है। दोनों के सिद्धान्तोंविधियों और चरणों का विश्लेषण करने से दोनों के सिद्धान्तोंविधियों और चरणों में समानता देखी जा सकती है।

टेलर ने सामुदायिक विकास के निम्नलिखित चरणों और विधियों की व्याख्या की है जो समुदाय संगठन के चरणों और विधियों से मेल खाती हैः

1. सामुदायिक विकास का पहला चरण समुदाय के सदस्यों द्वारा समान अनुभूत आवश्यकताओं के विषय में व्यवस्थित विचार विमर्श करना।
2. समुदायिक विकास का दूसरा चरण समुदाय द्वारा चयन की गई प्रथम स्वयं-सहायता परियोजना को पूरा करने के लिए व्यवस्थित नियोजन करना है।
 3. सामुदायिक विकास का तीसरा चरण स्थानीय सामुदायिक समूहों की भौतिकआर्थिक एवं सामाजिक समर्थताओं  को जुटाना और उन्हें गतिमान करना है।
 4. सामुदायिक संगठन का चौथा चरण समुदाय में आकांक्षाओं का सृजन और समुदाय के सुधार हेतु अतिरिक्त परियोजनाओं को चलाने के लिए निर्णय लेना है। 

    
  अन्य सामुदायिक संगठन कार्य के भी विभिन्न विद्वानों ने कुछ चरण बताये है। इनमें से कुछ प्रमुख निम्नलिखित है जिसका प्रयोग सामुदायिक संगठन कार्यकर्ता को सामुदायिक संगठन कार्य के उद्देश्यों को पूर्ण करने के लिए जरुरी  है।

अवलोकन और स्वीकृति प्राप्त करना
                  
          प्रत्येक समाज की अपनी अलग संस्कृति एवं सभ्यता होती हैजो दूसरे समाज से भिन्न होती है। उस समाज के अपनी संस्कृति को दूसरे समाज की संस्कृति से विषिष्ट मानकर उसमें बहुत विशवास रखते है और उसे बनाये रखना चाहते है।

                  
          सामुदायिक संगठन कार्यकर्ता का मुख्य कार्य समुदाय के सदस्यों के साथ कार्य करउनके विचारों एवं कार्यो में आवश्यक परिवर्तन स्थापित करउनमें अपनी समस्या समाधान एवं आवश्यकता की पूर्ति करने की योग्यता का विकास करना है।


अध्ययन करना
सामुदायिक संगठन कार्य का दूसरा चरण समुदाय का अध्ययन करना है। अध्ययन कार्य की सफलता स्वीकृति के अभाव में असम्भव है। स्वीकृति प्राप्त सामुदायिक संगठन कार्यकर्ता को सामुदायिक सदस्यों के साथ द्वितीय चरण में समुदाय की उन सभी समस्याओं एवं अनुभूत आवष्यकताओं का अध्ययन करना चाहिए जो उस समुदाय के लिए महत्वपूर्ण है।

आवश्यकता  की चेतना का प्रसार करना
                             सामुदायिक सदस्य अपनी सामाजिक-आर्थिक एवं सांस्कृतिक विषेषताओं के कारण कुछ मूलभूत सामुदायिक आवश्यकताओं जैसे स्वास्थ्यसफाईसमाजिक आर्थिक उन्नति आदि को भी नहीं पहचान पाते है।

संगठन का रचना करना
                             सामुदायिक संगठन कार्य का चौथा महत्वपूर्ण चरण सामुदायिक सदस्यों में संगठन की आवश्याकता एवं संगठित जीवन की उपयोगिता पर बल देते हुए संगठित जीवन को प्रोत्साहन करना होता है।

नेतृत्व का विकास करना
समुदाय में सगठन की रचना के पश्चात् योग्य नेता के चुनाव की आवश्यकता होती है। योग्य नेता में अन्य व्यक्तियों के व्यवहार को प्रभावित करने तथा निर्देषित करने की क्षमता होनी चाहिए। वह अपनी शक्तियों का प्रयोग-व्यक्तियों के विकास में करता है।


कल्याणकारी योजना एवं कार्यक्रम तैयार करना
          इसके पश्चात् सामुदायिक संगठन कार्यकर्ता समुदाय की समस्या एवं आवश्यकतानुसार सामान्य कल्याणकारी योजना बनाने एवं कार्यक्रम तैयार करने के लिये मार्गदर्शन प्रदान करता है।


कार्यक्रमों का कार्यान्वयन करना
          कल्याणकारी योजनाओं एवं कार्यक्रमों के निर्धारण के पश्चात् कार्यक्रमों का कार्यान्वयन किया जाता है। अपने व्यावहारिक ज्ञान एवं अनुभव से कार्यकर्ता इस बात से पूर्ण अवगत होता है कि कार्यक्रमों की सफलता सदस्यों की रुचिदक्षता और सहभागिता पर निर्भर होती है।

साधनों को संचालित करना
          सामुदायिक संगठन कार्यकर्ता हमेशा विभिन्न सरकारी एवं गैर-सरकारी कल्याणकारी संस्थाओं की सेवाओं को समुदाय के अनुरुप बनाने का प्रयास करता है।

मूल्यांकन एवं ऐच्छिक परिवर्तन लाना
          सामुदायिक संगठन में मूल्यांकन का एक विषेष महत्व है। मूल्यांकन से हमें सामुदायिक उद्देश्यों की सफलता एवं असफलता का ज्ञान होता है। हमें सदस्यों के कार्य के वास्तविक परिणामों का ज्ञान होता है। इससे सदस्यों की कार्यशक्तियोंनिपुणताओंउनकी कमियोंअक्षमताओंदोषों एवं सघर्षो को जानने में सुविधा 

होती है।
         

निष्कर्ष
अन्तिम चरण में कार्यकर्ता को यह देखने की आवश्यकता होती है कि सदस्यों में कहां तक स्वयं अपनी सहायता करने की योग्यता का विकास हुआ है। क्या वे बिना कार्यकर्ता के स्वयं सामूहिक निर्णय ले पाते है या नहीकल्याणकारी योजनाओं का निर्माण कर पाते है या नहीऔर कार्यक्रमों को क्रियान्वित कर पाते है या नही। उनकी सफलता इसमें है कि वह स्वयं समुदाय के लिये आवश्यक न बन जाये। किसी कार्य को व्यवस्थित ढंग से सम्पन्न करने के लिये जिस प्रकार एक क्रमबद्ध योजना की आवश्यकता पड़ती हैउसी प्रकार कार्यक्रम को चलाने के लिए कई चरणों से गुजरना जरुरी है। ये चरण न केवल सामुदायिक संगठन से जुड़े है बल्कि उन सभी कार्यक्रमों से भी जुड़े है जो एक समुदाय में चल रहे है।

         


सन्दर्भ सूचि
1.  सामुदायिक संगठन – ए.एन. सिंह – हरयाणा साहित्य अकादमी
2.  समाजशाश्त्र - डी. आर. सचदेवा और विधा भूषण
3.  ignou एम.एस. डब्लू 003 सामुदायिक विकास के लिए समुदाय का प्रबंधन.


4.  सामुदायिक संगठन एवं सामाजिक क्रिया - MGAHV दूर शिक्षा