इंग्लैण्ड में वैयक्तिक समाज कार्य का इतिहास - History Of Social Work In England.
इंग्लैण्ड में वैयक्तिक समाज कार्य का इतिहास - History Of Social Work In England.
इंग्लैण्ड में वैयक्तिक समाज कार्य का इतिहास
मध्यकाल में इंग्लैण्ड में गरीबों की सहायता का कार्य चर्च का था। धार्मिक भावना से प्रेरित होकर लोग असहायों, अंधों, लंगड़ों तथा रोगियों की सहायता करते थे। दान वितरण के कार्य को अधिक महव देने के कारण चर्च तथा राज्य में असहमति उत्पन्न हुई उसके फलस्वरूप सोलहवीं शताब्दी में निर्धनों की सहायता का उत्तरदायित्व राज्य पर हो गया।
ऽ एलिजाबेथ का धनहीनों के लिए कानून:सन् 1601 में एलिजाबेथ पुअर ला बना जिसके द्वारा पुरखों तथा अभावग्रस्त माता पिताओं की सहायता करना अनिवार्य कर दिया गया। इस कानून ने निर्धनों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया: समर्थ निर्धन, असमर्थ निर्धन तथा आश्रित बालक। समर्थ निर्धनों को हाउसेज आफ करेक्शस या वर्क हाउसेज में रखने की व्यवस्था थी तथा
उन्हें दान देना निषिद्ध था। रोगी, विराश्रित, बुद्ध, अन्धे, बहरे, गूंगे, लंगड़े, पागल और वे मातायें जिनके पास छोटे-छोटे बच्चे थे, असमर्थ निर्धन की श्रेणी में आते थे, उन्हें या तो भिक्षा जिनके पास छोटे-छोटे बच्चे थे, असमर्थ निर्धन की श्रेणी में आते थे, उन्हें या तो भिक्षा गृहों में रखा जाता था या घर पर ही बाह्य सहायता सामान्य वस्तुओं जैसे खाना, कपड़ा, ईंधन के रूप में दी जाती थी। अनाथ पिताहीन, परित्यक्त बालक या निर्धन माता-पिता के बालक आश्रित बालक कहे जतो थे। ऐसे बच्चे उन नागरिकों को दिये जाते थे जो रखना चाहते थे। लड़कों को उनके मालिक के व्यवसाय का प्रशिक्षण दिया जाता था। निर्धनों के निरीक्षक निर्धनों के कानून का पालन कराते थे।
उनका कार्य निर्धनों की सहायता के लिए प्रार्थना पत्र लेना, उनकी दशाओं की जाँच करके पता लागना कि उनको सहायता दी जाय या नहीं और यदि दी जाय तो उसका रूप कया हो।
पुअर ला अमेंडमेंट ऐक्ट: कार्यग्रह निवासियों के दुव्र्यवहार, उचित स्वच्छता का अभाव, अनैतिकता तथा भ्रष्टाचार के कारण सन् 1982 में पुअर ला अमेंडमेंट ऐक्ट बना। जिससे वैतनिक निरीक्षकों के स्थान पर वैतनिक संरक्षक नियुक्त किये गये। आश्रमों की सहायता समाप्त कर दी गयी और कार्य न मिलने की अवधि में इच्छुक व्यक्तियों को सहायता दी जाने की व्यवस्था की गयी।
ऽ थामस चाल्मर्स का योगदान: थामस चाल्मर्स ने अपने अनुभव के आधार पर दान पद्धति को कटु आलोचना की क्योंकि यह व्यवस्था निर्धनों में आचार भ्रष्टाचार को प्रोत्साहन देती थी। स्वावलम्बन की इच्छा को निर्बल बनाती थी। इस संबंध में थामस चाल्मर्स ने सुझाव दिया कि:
(1) दुर्गति के प्रत्येक मामले की जाँच भली भाँति की जाय, कष्ट के सभी कारणों का निश्चय किया जाय और निर्धनों में आत्म-निर्भरता की सभी सम्भावनाओं को विकसित किया जाय।
(2) यदि आत्मावलम्बन
सम्भव न हो तो सम्बन्धियों, मित्रों और पड़ोसियों को अनाथ, बृद्ध, बीमार और अपंगों की सहायता के लिए प्रोत्सािहत किया जाय,
(3) यदि निर्धन परिवारों की आवश्यकता इस प्रकार भी पूरी न की जा सके तो कुछ धनाड्य नागरिकों से उनके निर्वाह के लिए सम्बन्ध स्थापित किया जाय।
(4) केवल जब इन प्रस्तावित तरीकों में से एक भी सफल न हो तो तभी जिले का डीकन अपनी धार्मिक परिषद् से सहायता से प्रार्थना करे। थामस चाल्मर्स को दान-भिक्षा कार्यक्रम का व्यावहारिक अनुभव होने से दान की अवधारणा में परिवत्रन लाने में काफी योगदान रहा। उन्होंने वैयक्तिक आधार पर जाँच करने को प्रोत्साहन दिया तथा दरिद्रता के कारणों को ज्ञात करने का प्रयत्न करने के सिद्धांत को उत्पन्न करती है। उन्होंने व्यक्तिगत असफलताओं को ही निर्धनता का निराश्रितों के भाग्य निर्धारण में वैयक्तिक रूप से ध्यान देना आवश्यक होता है, सहायता कार्य की प्रगति के लिए महत्वपूर्ण मानी गयी। चाल्मर्स के अग्रगामी कार्य के 50 वर्ष बाद लंदन चैरिटी आर्गनाइजेशन सोसाइटी ने सहायता का एक कार्यक्रम संगठित किया, जो प्रमुख रूप से थामस चाल्मर्स के विचरों पर ही आधारित था। उन्होंने समाज कार्य में व्यक्तिगत उपागम की प्रथम आधारशिला रखी जिसे आज हम ”वैयक्तिक कार्य“ को संबल देते हैं।
जान हावर्ड तथा एलिजाबेथ फ्राई
सत्रहवीं तथा अठारहवीं शताब्दियों में इंग्लैण्ड के कारागारों की व्यवस्था बहुत अस्त-व्यस्त थी। बन्दियों के साथ दुव्र्यवहार किया जाता था तथा उनके आवास एवं भोजन तथा वस्त्र की उचित व्यस्था न थी। जान हावर्ड जेल सुधार के दृढ़ समर्थक थे। उनका विचार था कि अपराधियों को अपराध विशेष के आधार पर दण्ड किया जाय तथा अपराध के कारणों की खोज की जाय। बन्दियों को आवश्यक आवश्यकताएँ प्रदान की जायें। हावर्ड का जेल सुधार सम्बन्धी विचार अपने युक्तिगत जेल अनुभव पर आधारित था। वेडफोर्ड के शेरिफ पद पर कार्य करते हुए उन्होंने अपने दुखदायी अवलोकनों का अभिलेख तैयार किया। इन अभिलेखों से उसने यह निष्कर्ष निकाला कि इस सम्बन्ध में और अधिक खोजपूर्ण अन्वेषणों की आवश्यकता है।
श्रीमती एलिजाबेथ फ्राई शांति प्रचारक समिति की सदस्य होने के कारण न्यूगेट जेल जिसे धरती पर नरक जाता था, का निरीक्षण कर जेल में ही बच्चों के लिए विद्यालय को प्रारम्भ कराने में सफलता प्राप्त की। बन्दिनियों में से एक को विद्यालय की अध्यापिका नियुक्त किया। अनेक सुधारकों ने जेल व्यवस्था में सुधार लाने का अथक प्रयास किया परन्तु जब तक 1877 में प्रिजन एक्ट ने दण्ड सम्बन्धी संस्थाओं का प्रशासन एक केन्द्रीय संस्था नेशनल प्रिजन एक्ट ने दण्ड सम्बन्धी संस्थाओं का प्रशासन एक केन्द्रीय
संस्था नेशनल प्रिजन कमीशन को सौंप न दिया तब तक कारागारों में सन्तोषजनक सुधार न हुआ। हेनरी सोली चैरिटी आर्गनाइजेशन सोसाइटी की स्थापना सन् 1869 में सोसाइटी फार आर्गनाइजेशन रिलीफ एण्ड रिप्रेसिंग से बदलकर की गयी। इसके संगठन का मूल श्रेय हेनरी सोली को है जिन्होंने सन् 1868 में वैयक्तिक एवं सार्वजनिक परोपकारी समितियों की कार्य विधियों के बीच समन्वय करने वाली परिषद के निर्माण की एक योजना प्रस्तुत की। इस दान संगठनसोसाइटी की नींव थामस चाल्मर्स के सिद्धांतों पर की गयी। दान संगठन समितियों का कार्य प्रार्थियों से साक्षात्कार करना, उनके सामाजिक अमामथ्र्य की चिकित्सा की योजना बनाना और जो संस्थाएँ पहले ही से विद्यमान थ्ीां उनसे धन प्राप्त करना था। इस समितियों के कार्यों में सामाजिक वैयक्तिक सेवा कार्य के स्वरूप की झलक मिलती है। समाज कार्य ऐतिहासकों का विचार है कि समाज कार्य की संगठित क्रियाओं की वर्तमान पद्धति की उत्पत्ति चैरिटी आर्गनाइजेशन सोसाइटी की इसी योजना से हुई। ऽ
बारनेट ने यह पाया कि व्हाइट चैनेट के निर्धन 8000 पैंरिश निवासियों में अधिकांश बेकार अथवा रोग से पीड़ित थे। आक्सफोर्ड तथा कैम्ब्रिज स्थित कालेजों ने बारनेट से इस बात की जानकारी चाही कि सामाजिक अध्ययनों में रुचि रखने वाले विद्यार्थी निर्धनों की सहायता के लिए कुछ कर सकते हैं। उन्होंने छात्रों को विशेषाधिकार हीन व्यक्तियों के जीवन का अध्ययन करने, उन्हें शिक्षा सम्बन्धी और व्यक्तिगत सहायता प्रदान करने के लिए आमन्त्रित किया। बारनेट तथा उनके साथियों ने निर्धनता की समस्या को सुलझाने का दो प्रकार से प्रयास किया। अविवेकपूर्ण दान पद्धति बन्द करें ‘पुअर ला’ के अधीन सहायता केवल वर्क हाउस में दी जाय तथा दूसरे इस बात की कोशिश की कि व्यक्तियों को पुनः आत्म स्वावलम्बी बनाया जाय। इसके लिए उनकी आवश्यकताओं, योग्यताओं एवं कमियों का सावधानी से अध्ययन किया जाय। उनका विचार था कि सहायता का उद्देश्य का उद्देश्य वैयक्तिक कठिनाइयों को थोड़े समय के लिए कम करना नहीं है बल्कि समाज के रोग की चिकित्सा करना है। बारनेट के विचारों ने सामाजिक वैयक्तिक सेवा कार्य की जड़ों को और अधिक सुदृढ़ बनाया।
इडवार्ड डेनिसन सन् 1887 में माइल दण्ड रोड की फिलपाट स्ट्रीट में रहने गये। यहाँ पर उन्होंने एक स्कूल की स्थापना की तथा रात्रि में वे इस स्कूल में पढ़ाने का कार्य करते थे। दिन के समय रोगियों की देखभाल, स्थनीय निकायों का निरीक्षण तथा गरीबों की आवश्यकताओं को जनता व सरकार तक पहुँचाने का कार्य करते थे। इससे हम देखते हैं कि प्रारम्भिक सामाजिक वैयक्तिक कार्यकर्ता नकद या भौतिक सहायता देते हुए भी उनका प्रमुख उददेश्य आर्थिक अथवा भौतिक आवश्यकताओं से नहीं बल्कि सम्बन्ध स्थापन से था। 1

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