भारत में वैयक्तिक समाज कार्य का इतिहास - History Of Social Work In India.

भारत में वैयक्तिक समाज कार्य का इतिहास - History Of Social Work In India.


भारत में वैयक्तिक समाज कार्य का इतिहास 


 प्राचीन दृष्टिकोण: भारत में दीन दुखियों, असहायों तथा पीड़ित व्यक्तियों की सहायता करने की परम्परा प्राचीन काल से ही चली आ रही है। मानेचिकित्सा सम्बन्धी कार्य भी प्राचीन युग से ही चले आये हैं। कृष्ण का अर्जुन को उपदेश देना, वशिष्ठ का राम को कर्तव्य बोध कराना, बुद्ध का अंगुलिमाल के व्यवहार को परिवर्तित करना आदि इसके उदाहरण हैं।      भारतीय संस्कृति तथा धर्म का मुख्य उद्देश्य उन व्यक्तियों की सहायता करना है जो उत्पीड़ित हों तथा दयनीय जीवन व्यतीत करते हैं। प्राचीन काल से लेकर आज तक भी भिखारियों को दान देना, निर्धनों तथा असहायों की सहायता करना, धर्मशालाएँ बनवाना रोगियों की सहायता करना आदि पुण्य के कार्य समझे जाते रहे हैं। इतिहास इस बात का साक्षी है कि ऐसे सहायता मूलक कार्य करने के लिए व्यक्तियों में होड़ लगती थी।
ऽ बौद्ध काल: बौद्ध काल में समाज की भलाई के लिए अनेक प्रकार के उपदेश देने का प्रबन्ध किया गया था। बोधिसत्त्व में इस बात का उल्लेख मिलता है कि दानी व्यक्तियों के कौन-कौन से कार्य थे। बोधिसत्त्व के अनुसार सहायताकारी कार्यों को पहले अपने सगे सम्बन्धियों तथा मित्रों की सहायता उसके पश्चात् असहाय, रोगी, संकटग्रस्त तथा दरिद्र व्यक्तियों तथा मित्रों की सहायता उसके पश्चात् असहाय, रोगी, संकटग्रस्त तथा दरिद्र व्यक्तियों की सहायता करनी चाएिह।
ऽ मौर्य काल:- मौर्य काल में सामाजिक वैयक्तिक सेवा कार्य का क्षेत्र अधिक व्यापक हो गया था। बच्चों, वृद्धों तथा रोग्रस्त व्यक्तियों की देखभाल का कार्य अत्यन्त धार्मिक समझा जाता था। गाँव के वयोवृद्ध तथा मुखिया माता-पिता विहीन बालकों की देख भाल का कार्य करता था। निर्धन बच्चों के लिए निःशुल्क शिक्षा तथा भोजन का प्रबन्ध अध्यापक करता था।

 इस्लाम काल:-13वीं शताब्दी से भारतीय लोक जीवन में इस्लाम का आविर्भाव हुआ। इस्लाम धर्म में प्रारम्भ से ही भिक्षा देने की व्यवस्था तथा प्रथा रही है। यह दान उन व्यक्तियों को दिये जाने की व्यवस्था है जो हज पर जाने का व्यय न वहन कर सके, जिनके पास भोजन न हो, भिखारी हों तथा जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन ईश्वर हेतु अर्पित कर दिया हो। जकात से प्राप्त धन का उपयोग समाज कल्याण के कार्यों में ही किया जाता था। कुतुबुद्दीन, इल्तुतमिश, नासिरुद्दीन आदि सल्ुतानों ने इस क्षेत्र में अनेक कार्य किये। फिरोज ने ऐसे व्यक्तियों की सहायता करने के लिए जिनके पास पुत्रियों का विवाह करने के लिए पर्याप्त धन नहीं था एक दीवान-ई-खरात संस्था का निर्माण किया था।       मुगल  काल में ऐसी अनेक दुकानें खोल दी जाती थीं जहाँ पर सस्ते मूल्य पर अनाज मिलता थ। उस समय एक ऐसे विभाग का संगठन भी था जो आवश्यकता वाले व्यक्तियों की सूची रखता था। निरीक्षकों को नियुक्ति भेदभाव को रोकने के लिए की जाती थी। सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक ने व्यक्तियों को रोजगार देने तथा अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति करने का वृहद् कार्यक्रम बनाया था। उसका विचार था कि अपराधों का कारण आवश्यकताओं की संतुष्टि का न होना है।
ऽ अंग्रेजी शासन काल:- अंग्रेजी शासन काल में अनेक समाज सुधार आन्दोलनों का सूत्रपात हुआ। राजाराम मोहन राय ने बाल विवाह तथा सती प्रथा को रोकने का प्रयत्न किया। उनके प्रयत्नों के फलस्वरूप सन् 1829 ई0 में प्रतिबन्ध अधिनियम पारित किया गया जिसने सती प्रथा को अवैध घोषित कर दिया। सन् 1856 ई0 में हिन्दू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम  पास हुआ। गाँधी जी के प्रयत्नों के फलस्वरूप अनेक सुधार सम्भव हो सकंे। भारत में सन् 1936 ई0 से पहले सामाजिक वैयक्तिक सेवा कार्य को एक ऐच्छिक कार्य समझा जाता था। सन् 1936 ई0 में पहली बार समाज कार्य की व्यावसायिक शिक्षा के लिए एक संस्था पर रावजी टाटा ग्रेजुएट स्कूल आफ सोशल वर्क के नाम से स्थापित हुई। इस समय इस बात की आवश्यकता महसूस हो चुकी थी कि वैयक्तिक सेवा कार्य करने के लिए औपचारिक शिक्षा अनिवार्य है।

स्वतंत्रता के बाद: बीसवीं शताब्दी में ऐसी समाज सेवी संस्थाओं की वृद्धि हुई। अनाथालयों, शिशु सदनों की तथा अंधों के लिए स्कूलों की स्थापना की गयी। विकलांग बालकों के लिये पहली बार सन् 1947 ई0 में एक  ऐच्छिक संस्था स्थापित हुई। इस संस्था के कार्यों से प्रभावित होकर भारत के अनेक चिकित्सालयों में विकलांग चिकित्सा विभाग स्थापित हुए। सन् 1952 ई0 में इन्डियन कौंसिल फॅार चाइल्ड वेलफेयर की स्थापना हुई जिसका उद्देश्य शिशु कल्याण के क्षेत्र में कार्य करने वाली संस्थाओं के बीच समन्वय स्थापित करना और दूसरी ओर ऐच्छिक संस्थाओं एवं राज्य के बीच सम्पर्क स्थापित करना है।          समाजिक वैयक्तिक सेवा कार्य का चिकित्सा क्षेत्र में उपयोग होना शीघ्र ही प्रारम्भ हुआ। जब भारतीय चिकित्सक अमेरिका तथा इग्लैंण्ड गये और उन्होंने रोगियों के साथ सेवा कार्य के महत्त्व को समझा तो भारतीय चिकित्सालयों ने भी इसके विकास पर जोर दिया। दि हेल्थ सर्वे एण्ड डेवलपमेन्ट कमेटी (भोर कमेटी) ने सन् 1945 ई0 में चिकित्सालयों में प्रशिक्षित सामाजिक कार्यकर्ता की नियुक्ति की सिफारिश की। चिकित्सीय वैयक्तिक सेवा कार्य के विकास में यह महत्वपूर्ण कारक था। दूसरा कारण मानसिक चिकित्सालयों की स्थापना तथा इसमें मनोसामाजिक कार्यकर्ताओं के महत्त्व को समझ जाता है।   
   सन् 1946 ई0 में टाटा इन्स्टीट्यूट ने चिकित्सकीय समाज कार्य की शिक्षा का प्रबन्ध किया। सन् 1944 ई0 में डा0 जे0एम0 कुमारप्पा इन्स्टीट्यूट के निदेशक, अमेरिका गये तथा चिकित्सकीय समाज कार्य के लिए विजिटिंग प्रोफेसर के लिए समझौता किया। इसके परिणामस्वरूप लूईस विले, कंट्री की मिस लुईस ब्लैन्की

नवम्बर सन् 1946 ई0 में भारत आयी। कुछ महीनों तक उन्होंने भारतीय स्वास्थ्य समस्याओं को समझने तथा चिकित्सालयों की समस्याओं से अवगत होने में अपना ध्यान लगाया। कुछ समय बाद एक नये विभाग चिकित्सकीय तथा मनोचिकित्सकीय समाज कार्य का संगठन किया। जिस अवधि में मिस ब्लैन्की भारत आयीं थीं उन्हीं दिनों डाॅ0 (मिस) जी0आर0 बनर्जी चिकित्सकीय तथा मनोचिकित्सकीय समाज कार्य में प्रशिक्षण हेतु शिकागो गयीं और वापस आकर मिस ब्लैन्की से सन् 1948 ई0 में कार्यभार सँभाल लिया।   

सन् 1946 ई0 में जे0 जे0 हास्पिटल बाम्बे में प्रथम चिकित्सकीय समाज कार्यकर्ता की नियुक्ति हुई थी। उस समय से उसमें काफी वृद्धि हो रही है। आज चिकित्सकीय सामाजिक कार्यकर्ता ने केवल सामान्य चिकित्सालयों में बल्कि विशेषीकृत चिकित्सालयों, क्लिनिकों तथा पुनस्र्थापन केन्द्रों में कार्य करने लगे हैं।     यद्यपि यह सत्य है कि सामाजिक वैयक्तिक सेवा कार्य का क्षेत्र व्यापक हो रहा है परन्तु कार्यकर्ता अपनी भूमिकाओं को पूरा करने में अनेक बाधाएँ अनुभव कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं को चयन में कोई विशेष वरीयता नहीं मिलती है। आशा है समय परिवर्तन के साथ-साथ इस दृष्टिकोण में परिवर्तन आयेगा तथा सामाजिक वैयक्तिक सेवा कार्य का सामान्य विकास सम्भव हो सकेगा।


बीसवीं शताब्दी मंे वैयक्तिक समाज कार्य की नवीन रूचि बीसवीं शताब्दी के पहले दस वर्षों में वैयक्तिक समाज कार्यकर्ताओं ने इस बात पर बल देना आरम्भ किया कि जिस व्यक्ति की सहायता करनी है उसके जीवन के विषय मेे पर्याप्त सूचना प्राप्त की जाये। इन सूचनाओं के आधार पर व्यक्ति की सामाजिक एवं वैयक्तिक समस्याओं का सामाजिक निदान बनाया जाये जो उन समस्याओं के कारणों को स्पष्ट करता है। इसी सामाजिक निदान के आधार पर चिकित्सा की योजना बनाई जाये। उस समय चिकित्सा की योजनाएं अधिकतर पर्यावरण के बाहरी परिवर्तन, जीवन सम्बन्धी दशाओं और व्यवसाय से सम्बन्धित परिवर्तन एवं उन्नति से सम्बन्धित होती थीं। मनोविज्ञान एवं मनोचिकित्सा विज्ञान में जो विकास हुआ उसका प्रभाव समाज कार्य की प्रणालियों एवं अभ्यास पर पड़ा। इन विचारों के प्रभाव से समाज कार्य की रूचि आर्थिक एवं सामाजिक कारकों से हटकर सेवार्थी की मनोवैज्ञानिक एवं संवेगात्मक समस्याओं की ओर केन्द्रित हुई और उसकी प्रतिक्रियाओं, सम्प्रेरणाओं एवं मनोवृत्तियों को अधिक महत्व दिया जाने लगा। विशेष प्रकार से सिगमन्ड फ्रायड के मनोविश्लेषणात्मक सम्बन्धी सिद्धांतों ने सामाजिक वैयक्तिक समाज कार्य को प्रभावित किया और वैयक्तिक समाज कार्य में मनोविश्लेषण सम्बन्धी सिद्धान्तों का प्रयोग होने लगा।  बीसवीं शताब्दी के दूसरे दस वर्षों में समाज कार्यकर्ताओं का प्रयोग सामान्य चिकित्सालयों में होने लगा। इसके पूर्व केवल मानसिक चिकित्सालयों में ही समाज कार्यकर्ताओं का प्रयोग होता था। सामान्य चिकित्सालयों में जो वैयक्तिक समाज कार्यकर्ता नियुक्त किये जाते थे वे रोगी के रोग के विषय में जानकारी प्राप्त करके और उसकी सामाजिक एवं आर्थिक परिस्थिति का पता लगाकर चिकित्सक की निदान और चिकित्सा योजना बनाने में सहायता करते थे। इसके अतिरिक्त वे रोगी के परिवार के साधनों और समुदाय, सामाजिक संस्थाओं, नियोक्ताओं एवं मित्रों से सम्बन्धों का भी प्रयोग करते थे जिससे रोगी की चिकित्सा में सहायता मिल सके। जब द्वितीय महायुद्ध हुआ तो अमेरिकन रेडक्रास ने ऐसे परिवारों की सहायता के लिए जिनके पति युद्ध पर गए हुए थे होम सर्विस डिवीजन्स स्थापित किये। यहां जो परिवार आते थे उन्हें आर्थिक सहायता की उतनी आवश्यकता नहीं होती थी जितनी मनोवैज्ञानिक और संवेगात्मक सहायता की। अतः सहायता के दृष्टिकोण मंे परिवर्तन की आवश्यकता थी। इसी कारण और भी अधिक समाज कार्यकर्ताओं की

रूचि पर्यावरण सम्बन्धी कारकों से हटकर अधिकतर मनोवैज्ञानिक कारकों की ओर हुई। युद्ध के कारण अनेक प्रकार के मनोविकार सामने आने लगे। विशेषतया ‘‘शेल-शाक’’ से प्रभावित व्यक्ति रोगी बनकर आने लगे। अतः मनोचिकित्सात्मक समाज कार्यकर्ताओं की अधिक आवश्यकता का अनुभव किया जाने लगा और इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए पहली बार 1918 में स्मिथ कालेज में साइकिट्रिक सोशल वर्कर्स प्रशिक्षिण दिया जाने लगा। इस समय मनोचिकित्सकों का इतना अभाव था कि मनोविकार की चिकित्सा में मनोचिकित्सात्मक समाज कार्यकर्ताओं को पर्याप्त उत्तरदायित्व दिया जाने लगा और वे सेना के मनोचिकित्सकों से घनिष्ठ सम्पर्क रखते हुए कार्य करने लगे। फ्रायड के सिद्धान्तों ने यह सिद्ध कर दिया था कि बहुधा मनुष्य का व्यवहार भावनाओं पर आधारित होता है और व्यक्ति को स्वयं अपनी सम्प्रेरणाओं का ज्ञान नहीं होता। इसके अतिरिक्त यह बात भी स्पष्ट हो गई थी कि बाल्यावस्था की घटनाओं का प्रभाव व्यक्तित्व पर महत्वपूर्ण रूप से पड़ता है और बहुत कुछ व्यक्तित्व का विकास प्रारम्भिक जीवन की घटनाओं एवं परिस्थितियों के अनुसार होता है। इन सब सिद्धान्तों से समाज कार्यकर्ताओं को जो नवीन ज्ञान प्राप्त हुआ उसे उन्होंने अपने अभ्यास में प्रकट करने का प्रयत्न किया।  वैयक्तिक समाज कार्यकर्ताओं ने अनुभव किया कि सेवार्थी के व्यक्तित्व सम्प्रेरणाओं एवं भावनात्मक आवश्यकताओं को समझने के लिये अधिक विस्तृत सूचना प्राप्त करने की आवश्यकता है। इस प्रकार मानवीय व्यवहार की मनोवैज्ञानिक व्याख्या उच्चतर प्रकार से की जाने लगी और आर्थिक समस्याओं का भी अधिक विषयात्मक रूप से मूल्यांकन किया जाने लगा। इसके फलस्वरूप वैयक्तिक समाज कार्य में एक प्रजातांत्रिक दृष्टिकोण का प्रवेश हुआ जिसके अनुसार सेवार्थी को एक मनुष्य के रूप में देखते हुए उसके वैयक्तिक महत्व एवं मूल्य की प्रतिष्ठा की जाने लगी। वैयक्तिक समाज कार्यकर्ता सेवार्थी को उसके वास्तविक रूप में स्वीकृत करने लगे और इस बात का ध्यान रखने लगे कि सेवार्थी को सूचना देने के लिए बाध्य न किया जाये। आरम्भ में वैयक्तिक समाज कार्यकर्ताओं ने कुछ निष्क्रियता का दृष्टिकोण ग्रहण किया और अधिकतर सेवार्थी के वर्णन पर ही विश्वास करते रहे परन्तु 1930 के उपरान्त वैयक्तिक समाज कार्यकर्ताओं ने पूर्ण निष्क्रियता एवं पूर्ण अधिकार की परस्पर विरोधी सीमाओं के बीच एक संतुलित स्थान ग्रहण किया। अर्थात् जहाँ आवश्यकता समझी वहां अधिकार का प्रयोग करने में कोई संकोच न किया।