अमेरिका में वैयक्तिक समाज कार्य का इतिहास - History Of Social Wrok In America In Hindi

अमेरिका में वैयक्तिक समाज कार्य का इतिहास
 अमेरिका में वैयक्तिक समाज कार्य का इतिहास




उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम समय में अमेरिका में निर्धनता, रोग एवं बेरोजगारी की समस्याएं सामान्य रूप से फैली हुई थीं। विशेष रूप से बड़े-बड़े नगरों में बेरोजगारी की समस्या अधिक थी। उस समय के परोपकारी व्यक्तियों पर यह बात स्पष्ट हो गईं कि निर्धन विधान को चलाने वाले अधिकारियों द्वारा जो सहायता दी जा रही है वह न तो पर्याप्त है और न ही रचनात्मक। यह बात भी स्पष्ट हो गई कि परोपकारी संस्थाओं के बीच सहयोग के अभाव के कारण एक दूसरे के कार्यों एवं कार्यक्षेत्र के विषय में सूचना नही मिल पाती है और परिणामस्वरूप जो कुछ परिश्रम किया जाता है और धन व्यय होता है वह अधिकतर व्यर्थ हो जाता है। कार्यों में द्वितीयावृत्ति के कारण कुछ क्षेत्रों में आवश्यकता से अधिक संस्थाएं कार्य करती हैं और कुछ क्षेत्रों में संस्थाओं का अभाव है। इस परिस्थिति के सुधार करने के लिए 1877 में चैरिटी आर्गनाइजेशन सोसाइटी आन्दोलन की स्थापना हुई थीं।        हम पहले ही बता चुके हैं कि इस आन्दोलन का आधार टाॅमस चामर्स के विचारों पर था। इस आन्दोलन का आधार इस विचार पर था कि सार्वजनिक निर्धन सहायता अपने उद्देश्य में असफल है और सेवार्थी का इस प्रकार पुनर्वास होना चाहिए कि वह अपना और अपने परिवार का भरण पोषण कर सके। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए इस आन्दोलन ने इस बात की व्यवस्था की कि निर्धनों के घर जाकर उनका निरीक्षण किया जाये, उन्हें परामर्श दिया जाये, अनुचित कार्यों से रोका जाये और आर्थिक सहायता दी जाये। इस प्रकार निर्धनों के पुनर्वास के पूर्व उनकी दशा का सावधानी से परीक्षण और उनकी समस्या के विषय में स्वयं उनसे और उनके आस-पास के लोगों से विचार विमर्श आवश्यक समझा जाने लगा। निर्धनों एवं समस्याग्रस्त व्यक्तियों के विषय में इस प्रकार की वैयक्तिक रूचि समाज कार्य की एक नई दिशा की ओर संकेत करती है।

 इसी नई दिशा से वैयक्तिक समाज कार्य की उत्पत्ति हुई। चैरिटी आर्गनाइजेशन सोसाइटीज ने सेवार्थियों की वैयक्तिक एवं आर्थिक समस्याओं को सुलझाने के लिए सामाजिक हल (सुझाव) का प्रयोग करना चाहा और इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए व्यावसायिक प्रशिक्षण, उपकरण, छोटे-छोटे कारखानों या व्यापार के लिए धन, भोजन, वस्त्र, एवं परिवारों के लिए कमरों या एक छोटे से घर की सुविधाएं प्रदान कीं। इस अवसर पर एक प्रमुख बात यह हुई कि स्वयं सेवकों और सी. ओ. एस. के प्रतिनिधि वैतनिक थे और वे सी.ओ.एस. के कार्यांे के लिऐ नगर के धनी व्यक्तियों से धन एकत्र करते थे। स्वयंसेवक सेवार्थियों से वैयक्तिक सम्पर्क रखते थे और उन्हें आत्म निर्भर बनाने के लिए उपदेश एवं निर्देश देते थे। सेवार्थियों से यह आशा की जाती थी कि वे उनके सुझावों का पालन करेंगे। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त तक स्वयं सेवकों को यह अनुभव हुआ कि निर्धनता का कारण बहुधा सेवार्थी के व्यवहार का दोष ही नहीं है बल्कि उसकी सामाजिक परिस्थिति भी है जिसमे वह रहता हैं। बीसवीं शताब्दी के आरम्भ में सामाजिक दशाओं के सुधार पर बल दिया जाने लगा।

सी.ओ.एस. ने इस बात का प्रयास करना आरम्भ किया कि ऐसे सामाजिक विधान बनने चाहिये जिसमें निराश्रित, रोग, सामाजिक विघटन का प्रतिबन्ध हो सके।  सामाजिक सुधार के उपायों से निर्धन व्यक्तियों की दशा में उन्नति होने लगी परन्तु फिर भी कुछ परिवार ऐसे थे जिनकी आवश्यकताएं पूरी नहीं हो पाती थीं और जिन्हें ऐसे सहायकोें की आवश्यकता थी जो उनकी समस्याओं को सहानुभूति के साथ समझकर उन्हें उपदेश दें जिससे वे सामुदायिक साधनों का सदुपयोग कर सकें। यह समझा जाने लगा कि सामाजिक सुधार से ही समस्त वैयक्तिक समस्याएं नहीं सुलझ जातीं। अतः सामाजिक संस्थाएं वैयक्तिक समाज कार्य सेवाएं प्रदान करती रहीं। बीसवी शताब्दी के आरम्भ में समाज कार्य के विद्यालयों की स्थापना हुई और व्यवसायिक प्रशिक्षण की सुविधाएं उपलब्ध हुई। सामाजिक संस्थाओं ने अब प्रशिक्षण प्राप्त कार्यकर्ताओं को नियुक्त करना आरम्भ कर दिया। अब सेवार्थी की समस्या का अध्ययन, निदान और चिकित्सा की योजना इन प्रशिक्षण प्राप्त कार्यकर्ताओं का ही उत्तरदायित्व हो गया।  इस प्रकार उनका महत्व बढ़ गया क्योंकि अब उनकी जांच का प्रतिवेदन किसी समिति के सम्मुख रखने की अपेक्षा स्वयं उनकी राय के अनुसार ही सहायता का कार्य होने लगा।

1917 में पहली बार मेरी रिचमण्ड ने वैयक्तिक समाज कार्य की प्रक्रियाओं को एक निश्चित रूप में अपनी पुस्तक सोशल डाइग्नोसिस में प्रस्तुत किया। परन्तु यह स्पष्ट हो गया कि केवल परामर्श से ही पुनर्वास नहीं हो सकेगा और यह कि इसके लिये आर्थिक साधनों की भी आवश्यकता होगी। अतः निजी एवं सार्वजनिक आर्थिक सहायता के कार्यक्रम प्रचलित रहे और अब भी प्रचलित हैं।