समाज कार्य का चिकित्सा का प्रारम्भिक चरण - Early Stage Of Therapy Of Social Case Work.

समाज कार्य का चिकित्सा का प्रारम्भिक चरण - Early Stage Of Therapy Of Social Case Work.


चिकित्सा के प्रारम्भिक चरण में निम्नलिखित कार्य सम्पादित किये जाते हैः-

1. सम्पर्क के कारण का ज्ञान:- जब सेवार्थी संस्था में आता है तो उसकी कुछ समस्याऐं होती हैं और इन समस्याओं का ज्ञान कार्यकर्ता के लि चिकित्सा प्रणाली निश्चित करने में आवश्यक होता है। यदि सेवार्थी को समस्या स्पष्ट करने में कुछ कठिनाई होती है तो कार्यकर्ता स्वयं संस्था द्वारा उपलब्ध सेवाओं को स्पष्ट करना है। जब सेवार्थी किसी संस्थान द्वारा सन्दर्भित किया जाता है ऐसी स्थिति में कार्यकर्ता सन्दर्भित करने वाले व्यक्ति तथा सेवार्थी दोनों से साक्षात्कार करने के कारणों की खोज करता है। कभी कभी ऐसी परिस्थिति आ जाती है जब सेवार्थी को यद्यपि वैयक्तिक सेवा कार्य सेवाओं की आवश्यकता होती है परन्तु वह (सेवार्थी) इन सेवाओं को नहीं चाहता है। ऐसी स्थिति में कार्यकर्ता सेवार्थी सेवा प्राप्त करने के लिए सलाह देता है, मंत्रणा देता है तथा यदि आवश्यक हुआ तो अन्तदुंष्टि का भी विकास करता है।

(2) सेवार्थी से सम्बन्ध स्थापनः - वैयक्तिक सेवा कार्य का मूल्य साधन सम्बन्ध माना जाता है। इस सम्बन्ध में दो बातें प्रारम्भ से ही महत्वपूर्ण होती हैं-कार्यकर्ता की कुशलता में सेवार्थी के विश्वास तथा उसकी ख्याति या साख में विश्वास। इस विश्वास को उत्पन्न करने के लिए कार्यकर्ता को स्वयं प्रयास करना चाहिए।

(3) सेवार्थी को चिकित्सा कार्य में लगाना:- चिकित्सा प्रक्रिया में सेवार्थी को लगाने के लिए कार्यकर्ता को दो बातों का ज्ञान आवश्यक होता है:

        (1) सेवार्थी की सम्प्रेरणा

        (2) सेवार्थी का अवरोध

  सम्प्रेरणा ये यह पता चलता है कि सेवार्थी कितना परिवर्तन चाहता है तथा इस परिवर्तन में कितना योगदान देने के लिए इच्छुक है। इसका सीधा सम्बन्ध सेवार्थी की कठिनाई की गहनता से होता है। परन्तु यदि उसे परेशानी अत्यधिक है तो हो सकता है कि वह अपने को असहाय महसूस करे तथा परिवर्तन की कोई अच्छा न व्यक्त करे। अतः प्रारम्भिक अवस्था में यह आवश्यक कार्य होता है कि सेवार्थी को कठिनाई तथा उसकी आशा को उस स्तर तक लाने में अवश्य सहायता की जाय जो सम्प्रेरणा के अनुकूल हो।    अवरोधों का भी जानना चिकित्सा के लिए आवश्यक होता है। मूख्यतः अवरोधों का अस्तित्व सहायता के रूप पर निर्भर होता है। जब सेवार्थी के व्यक्तित्व या व्यवहार में परिवर्तन करने का प्रयास किया जाता है तो विरोध अधिक होता है। सेवार्थी इस प्रकार के परिवर्तन को स्वीकार करने में हिचक महसूस करता है। इसके अतिरिक्त समस्या के रूप पर भी विरोध निर्भर करता है। यदि समस्या का सम्बन्ध सामाजिक अस्वीकृत, आलोचना का भय, चिन्ता, पाप की भावना आदि से होता है तो अवरोध अधिक होता है। अवरोधों को दूर करने के लिए वैयक्तिक कार्यकर्ता निम्न कदम उठाते हैंः

 (1) सेवार्थी से नकारात्मक तथा उभ्यामुखी भावनाओं के सम्बन्ध में बातचीत करना।

1. सेवार्थी के प्रत्ययों व भ्रमों का समझना तथा उनको स्पष्ट करना।

2. कार्यकर्ता स्पष्ट करता है कि उसकी सहायता स्वीकार करना सेवार्थी की इच्छा पर निर्भर है।

3. प्रारम्भिक चरण में उपचार:- इस सम्प्रदाय के समर्थकों का विश्वास है कि चिकित्सा का प्रारम्भ प्रथम साक्षात्कार से शुरू हो जाता है। कार्यकर्ता प्रारम्भ से ही सेवार्थी को अपनी भावनाओं को स्पष्ट करने का अवसर प्रदान करता है और यह अवसर चिकित्सा प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में अतुलनीय भूमिका अदा करता है।

 (4) चिकित्सा कार्य प्रारम्भ करना।

(5)  मनो सामाजिक निदान तथा चिकित्सा निर्देशन के लिए सूचनाएँ एकत्र करना।