सेवार्थी का मूल्यांकन - Evaluation Of Client In Social Case Work.
सेवार्थी का मूल्यांकन - Evaluation Of Client In Social Case Work.
इस सम्प्रदाय का विश्वास है कि सेवार्थी की समस्या का निदान आवश्यक होता है क्योंकि इससे व्यक्ति को वैयक्तिक भिन्नताओं, विशेषताओं तथा अन्तर्ससम्बधों का ज्ञान प्राप्त होता है। निदान का तात्पर्य उन क्रियाओं से है जिनका सम्बन्ध सेवार्थी तथा उसके पर्यावरण के विषय में ज्ञान प्राप्त करना है। वेबस्टर शब्दकोश ने निदान शब्द की दो परिभाषाऐं दी है:
(1) रोग को इसके लक्षणों से पहचानने की कला अथवा कार्य
(2) वैज्ञानिक निश्चय, आलोचनात्मक छानबीन अथवा इसका परिणामात्मक निर्णय। प्रथम परिभाषा से दूसरी परिभाषा अधिक स्पष्ट तथा व्यावहारिक है। वैयक्तिक सेवा कार्य में उपलब्ध तथ्यों का विश्लेषण करके यह पता लगाया जाता है कि सेवार्थी की समस्या क्या है, उसके कौन-कौन से कारण हैं, कहाँ पर परिवर्तन की आवश्यकता है, किस प्रकार की चिकित्सा सेवार्थी की समस्या का समधान करने के लिए उपयुक्त होगी तथा वैयक्तिक कार्यकर्ता को कौन-कौन से प्रत्यन्त इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए उठाने होंगे।
इस सम्प्रदाय का विचार है कि बिना निदान के वैयक्तिक सेवा नहीं की जा सकती है। निदान उस समस्या के कारणों की खोज है जो सेवार्थी को कार्यकर्ता के पास सहायता के लिए लाती है। समस्या का कारण सेवार्थी स्वयं अथवा उसका प्र्यावरण होता है। अतः मनोवैज्ञानिक तथा सामाजिक कारकों का ज्ञान प्राप्त करना निदान है के लिए आवश्यक होता है। मनौवैज्ञाानिक अथवा व्यक्तित्व सम्बन्धी कारकों का ज्ञान जिसके कारण सेवार्थी की समस्या उत्पन्न हुई है तथा सामाजिक व वर्यावरण सम्बन्धी कारकों का ज्ञान जिनके कारण समस्या उत्पन्न हुई है तथा सामाजिक व पर्यावरण सम्बन्धी कारकों का ज्ञान जिनके कारण समस्या स्थिर रहती है, से निदान का सम्बन्ध होता है। निदान के अन्तर्गत हम तीन तथ्यों को निश्चित करते हैंः
(1) गत्यात्मक निदान में अन्य बातों के अतिरिक्त हम इस बात की जाँच करते हैं कि सेवार्थी के व्यक्तित्व के विभिन्न अंग किस प्रकार सम्पूर्ण कार्यं में अन्तक्र्रिया करते हैं।
(2) कारणात्मक कारकों की खोज-बीन वैयक्तिक एवं सामाजिक दोनों स्तरों पर करते हैं।
(3) सेवार्थी की कार्यात्मकता को तथा क्लिनिकल निदान को वर्गीकृत करने का प्रयत्न करते हैं। इस तीन प्रकार के ज्ञान को प्राप्त करने के लिए सेवार्थी मनोवैज्ञानिक एवं सामाजिक संरचना के अन्तर्गत मूल्यांकन करना आवश्यक होता है। वैयक्तिक एवं सामूहिक व्यवहार सामाजिक-सांस्कृतिक ढाँचे का एक अंग होता है। जिसके परिणामस्वरूप व्यक्ति के व्यवहार पर समूह, समाज तथा संस्कृति तीनों का प्रभाव पड़ता है। यह तथ्य प्रमाणित हो चुका है कि संस्कृति के धार्मिक तथा नैतिक दृष्टिकोण परिणाम के माध्यम द्वारा व्यक्ति को हस्तान्तरित किये जाते हैं जिनका अहं का पराहयं के विकास पर महत्वपूर्ण प्रभाव होता है। समूह के अन्तर्गत उसकी भूमिका तथा उससे समूह की आशा का भी प्रभाव व्यक्ति के व्यवहार पर पड़ता है। यह सम्प्रदाय व्यक्तित्व सिद्धांत का अनुसरण करने के कारण जानने का प्रयत्न करता है कि सेवार्थी में इड, इगो तथा सुपर इगो की भूमिका क्या है? सेवार्थी की शक्तियों तथा कठिनाइयों को समझाने, सहने तथा निपटने की क्षमता को ज्ञान करने के लिए उसके अहं को ज्ञान करना आवश्यकता होता है। इससे पता चलता है कि सेवार्थी की समस्या के उत्पन्न करने में क्या योगदान रहा है। उन परिस्थितियों में भी इसका जानना आवश्यक है जब समस्या का कारण ब्राह्य कारक ही क्यों न हो। इस स्थिति में सेवार्थी को परिस्थिति सुधारने एवं परिवर्तित करने में सक्रिय भूमिका निभानी होती है और इस सक्रिय भूमिका में अहं की भूमिका मुख्य होती है। जब समस्या का कारण सेवार्थी स्वयं होता है उस समय लैंगिक तथा उग्र चालकों की कार्यात्मकता तथा पराहयं की प्रकृति का ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक होता है। निदान का वर्गीकरण करना यद्यपि एक बहुत बड़ी समस्या है परन्तु समुचित चिकित्सा के लिए यह आवश्यक होता है। कि निदान को जब हम विश्लेषित करते हैं तो स्वयं वर्गीकरण की प्रकृति स्पष्ट हो जाती है क्योंकि निदान का तात्पर्य एक रोग पहचान करके लक्षणों से करता है।

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