निदानात्मक सम्प्रदाय - Social Case Work Diagnostic syndrome.

निदानात्मक सम्प्रदाय - Social Case Work Diagnostic syndrome.



 निदानात्मक सम्प्रदाय पर मूल रूप से फ़ायड के व्यक्तित्व के सिद्धांत का प्रभाव पड़ा। इस सिद्धांत के अनुसार सेवार्थी की समस्या के निदान एवं उनके उपचार के लिए उसको पर्यावरण के एक अंश के रूप में देखना तथा उसका सम्पूर्ण से सम्बन्ध का ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक होता है। व्यक्ति जिस पर्यावरण में रहता है उसके विभिन्न तत्व परस्पर प्रतिक्रिया करते हुए व्यक्ति को प्रभावित करते हैं। चेतन के साथ-साथ अचेतन प्रभावों का भी मानवीय मूल्यों, व्यवहार तथा आत्म संयम पर प्रभाव पड़ता है। अतः वैयक्तिक कार्यकर्ता के लिए इन बाह्ा तथा आन्तरिक प्रभावों को भलीभाँति समझना आवश्यक होता है।


    इसी सम्प्रदाय के विकास का श्रेय मेरी रिचमण्ड को है। परन्तु परिस्थितियों में परिवर्तन होने से इनके मूल रूप में परिवर्तन आया। इस सम्प्रदाय के प्रारम्भिक योगदान में मेरिओन केनवर्थी (न्यूयार्क स्कूल आफ सोशल वर्क), बैस्टसलिब्बे (फेमिली सोसाइटी आफ फिलडेफिया), गार्डन हैमिल्टन बर्थे रिनोल्ड्स, चारलोटे टोक्ले, क्लोरेन्स डे, फर्न लोरी, लूसिले आस्टिन, अनेटे गैरेट आदि विद्धानों के नाम उल्लेखनीय है।


निदान का अर्थ  
   
निदान के सम्बन्ध में सभी निदानात्मक सम्प्रदाय के विचारकों ने अपने-अपने मत प्रस्तुत किये हैं। परन्तु उन सभी मतों और विचारों का मूल अर्थ लगभग समान है। यहाँ पर हम कुछ विद्वानों की परिभाषाओं एवं विचारों का उल्लेख निदान शब्द को स्पष्ट करने के लिए कर रहे है।

रिचमण्ड, मेरी (1917)  -  सामाजिक निदान, जहाँ तक सम्भव हो एक सेवार्थी के व्यक्तित्व तथा सामाजिक स्थिति की एक यथार्थ परिभाषा पर पहुँचने का प्रयत्न है।

सजफ्लोरेन्स (1950) निदान,

 (1)  ज्ञात तथ्यों (दर्शनीय तथा मनोवैज्ञानिक तथ्य) के आधार पर संरचित एक व्याख्या है।

 (2)  दूसरे सम्भव व्याख्याओं को ध्यान में रखते हुए एक व्याख्या है।

(3)  जब सम्बन्धित विषय भिन्न व्याख्या प्रस्तुत करता है तो इसमें परिवर्तन एवं मूल्यांकन भी सम्भव हैं। सामाजिक निदान की परिभाषायें काकेरिल, इलेनर है0, लईस जे लेरमैन एण्ड अदर्स1 (पिट्सवर्ग फैकल्टी ग्रुप) 1973 निदान अध्ययन द्वारा प्रकाश में लाये गये तथ्यों की व्याख्या एवं संयोजक है तथा सम्पूर्ण घटना की एक परिभाषा और इसके व्यवहार तथा विकास की व्याख्या एवं ज्ञान प्रदान करता है। इसका उद्देश्य कारण को निश्चित करना तथा भविष्यवाणी करना कि किस प्रकार से एक पारिभाषित दशा में प्राणधारी जीव व्यवहार करेगा।

आप्टेकर, हरबर्ट एच. (1955) ”निदान, जैसा कि निदानात्मक सम्प्रदाय ने देखा है, समस्या के कारणों की खोज है जो सेवार्थी को कार्यकर्ता के पास सहायता के लिए लाती है।“ उन्होंने आगे कहा कि समस्या के कारण मनोवैज्ञानिक तथा सामाजिक दोनों होते है। अतः निदान का सम्बन्ध मनोवैज्ञानिक या व्यक्तित्व के कारकों को जो सेवार्थी की समस्या से कारणात्मक सम्बन्ध रखते हैं और सामाजिक या पर्यावरणीय कारक जो इसको स्थिर रखते हैं, के ज्ञान से है।


 निदानात्मक सम्प्रदाय की आवश्यक शर्ते - 

निदानात्मक सम्प्रदाय निम्नलिखित शर्तों को सेवार्थी की समस्या के निदान के एवं उपचार के लिए आवश्यक समझता है:

 (1) सेवार्थी की सहायता करने अथवा समस्या की चिकित्सा के लिए बाह्य पर्यावरण के साथ सेवार्थी की अन्तः क्रियाओं की जानना आवश्यक होता है। बाह्मा पर्यावरण का कोई महत्वपूर्ण अथवा सामान्य सूक्ष्य ही भाग क्यों न हो यदि उसका सम्बन्ध सेवार्थी से है तो उसका समझना आवश्यक होता है। बाह्ता पर्यावरण के अन्तर्गत परिवार, सामाजिक समूह, शिक्षण संस्थाऐं तथा अन्य समाजिक संस्थाएँ आती हैं।

(2)  सेवार्थी की आवश्यकता के अनुसार चिकित्सा में भेद होना आवश्यक होता है। इसका तात्पर्य यह है कि कार्यकर्ता को सेवार्थी की आवश्यकताओं एवं इच्छाओं को समझने के लिए सेवार्थी का वैयक्तीकरण करना आवश्यक होता है। समस्या के विकास का कारण या तो सेवार्थी की अपनी कार्यात्मक अक्षमता या फिर दोषपूर्ण सामाजिक परिस्थितियाँ होती हैं। इन दोनों कारकों का सम्मिलित प्रभाव भी हो सकता है। इसके अतिरिक्त इनके प्रभावों में भी भिन्नता होती है। अतः सेवार्थी की आवश्यकताओं को पूरा करने तथा समस्या समाधान के लिए इन कारकों को परिभाषित करना आवश्यक होता है।

(3)  वैयक्तिक सेवा कार्य चिकित्सा में व्यक्तिगत या सामाजिक या अन्तव्र्यक्तिगत पर्यावरण अथवा दोनों परिवर्तन करना आवश्यक हो जाता है।

(4)  चिकित्सा का उद्देश्य सेवार्थी की सहायता करना है जिससे वह अपने अथवा सम्बन्धित पर्यावरण में अथवा दोनों में इस प्रकार में परिवर्तन लाये जिसमें उसका उचित अनुकूलन सम्भव हो सके।

(5)  इस सम्प्रदाय के विचारकों का पूर्वानुमान होता है कि वैयक्तिक सेवा कार्य चिकित्सा से व्यक्त्वि में परिवर्तन तथा विकास सम्भव होता है और चिकित्सा द्वारा लाया गया पर्यावरण सम्बन्धी परिवर्तन अनुकूलन को आसान एवं सम्भव बनाता है।

 (6)  समस्या समाधान की चिकित्सा वैयक्तिक कार्यकर्ता सेवार्थी सम्बन्ध की गहनता एवं घनिष्ठता पर निर्भर होती है।