व्यक्तिक सेवा कार्य के समस्या समाधान उपागम - Social Case Work Problem Solving Approach.

व्यक्तिक सेवा कार्य के समस्या समाधान उपागम - Social Case Work Problem Solving Approach.
 समस्या समाधान उपागम  


समस्या समाधान उपागम का विकास हेलेन हेरिस, पर्लमैन द्वारा शिकागों विश्वविद्यालय के समाज कल्याण प्रशासन के तत्वावधान में सन् 1957 में हुआ। इस सिद्धान्त के अनुसार सेवार्थी, चाहे वह व्यक्ति  अथवा परिवार दोनों की क्षमताओं में वृद्धि करना सामाजिक वैयक्तिक सेवा कार्य का उद्देश्य है। सेवार्थी की दो प्रकार की

समस्याएँ प्रायः होती हैः सम्बन्धों को स्थिर रखने तथा स्थायित्व प्रदान करने में समस्या, भूमिका पूरी करने में समस्या। समस्या का आभास उस समय होता है जब व्यक्ति के अपने समस्या समाधान के तरीके समस्या समाधान करने में असफल हो जाते है। अतः वह संस्था में मनोवैज्ञानिक, भौतिक सामाजिक अथवा अन्य प्रकार की सहायता के लिए आता है जिससे समस्या का समाधान उचित ढंग से कर सके।  समस्या समाधान के निम्नलिखित साधन है उनमें जब कमी अथवा गतिरोध होता है तभी व्यक्ति अपना समायोजन उचित ढंग से करने में असफल होता है।

 1. सम्प्रेरणा:- अवांछित तरीकों से समस्या के संदर्भ में कार्य करना। 

2. क्षमता:- अवांछित तरीकों से अपनी क्षमता का समस्या समाधान में उपयोग करना।

 3. अवसर:-  समस्या समाधान के उचित अवसर प्रत्यक्षीकरण में कमी।


  ये साधन इस प्रारूप का मूल केन्द्र है। अतः कार्यकर्ता निम्न भूमिका पूरी करने का प्रयत्न करता हैः 


1. सेवार्थी की सम्प्रेरणा में परिवर्तन लाने के लिए कार्यकर्ता दिशा प्रदान करता है, शक्ति प्रदान करता है तथा निर्देशन देता है। इस अर्थ में समस्या समाधान प्रारूप का उद्देश्य सेवार्थी के भय एवं चिन्ता को कम करना तथा इस प्रकार से आलम्बन प्रदान करना जिससे अहं सुरक्षात्मक यन्त्रों का कम से कम उपयोग सेवार्थी करे साथ ही साथ पुरस्कार आशा मंे वृद्धि करना और इस प्रकार अहं शक्ति का समस्या समाधान में अधिक दृढ़ता के साथ लगाना। 

2. सेवार्थी की मानसिक, सांवेगिक तथा क्रियात्मक क्षमताओं द्वारा समस्या समाधान में कई बार अभ्यास कराना जिससे सेवार्थी में विश्वास दृढ़ हो जाए। 

3. उन स्त्रोतों तथा सहायता को सेवार्थी की पहुँच में लाना जो समस्या समाधान के लिए आवश्यक है।  समस्या समाधान प्रारूप निम्न बातों को महत्वपूर्ण मानता हैः-

 1. समस्या का ज्ञान सेवार्थी को अवश्य होना चाहिए। 

2. समस्या के प्रति सेवार्थी के व्यक्तिगत अनुभवों का ज्ञान होना आवश्यक है।

 3. व्यक्ति के जीवन पर इसका क्या प्रभाव पड़ा। 

4. समस्या समाधान के साधनों का ज्ञान तथा विकल्पों का निर्धारण भी आवश्यक है। 


समस्या समाधान उपागम के लक्ष्य समूह तथा उद्देश्य 

 इस प्रारूप का कोई विशेष प्रकार का समूह या व्यक्ति नहीं है जिसकी सहायता करना चाहता है। पर्यावरणीय समस्याओं का उपचार तथा मनोवैज्ञानिक समस्याओं का उपचार पृथक-पृथक नहीं माना जाता है क्योंकि इसमें व्यक्ति की सहायता की जाती है। वह चाहे बाह्य कारकों से ग्रसित हो अथवा व्यक्तित्व में किसी विशेष गुण की कमी के कारण कठिनाई अनुभव कर रहा है, समस्या समाधान प्रारूप का यह दृढ विश्वास है कि जीवन में अनेक समस्याएँ आती है और जीवन ही समस्या समाधान करने की प्रक्रिया है। जीवन के प्रत्येक स्तर पर परेशानियाँ आती है। प्रत्येक क्षण नयी- नयी समस्याओं से जूझना पड़ता है। इसके लिए उसे नयी प्राविधियों एवं ज्ञान की आवश्यकता होती है जिससे वह इनका समाधान कर सके। कभी-कभी ऐसी स्थितियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। ऐसी स्थिति में वैयक्तिक कार्यकर्ता व्यक्ति की सहायता करता है जिससे वह कार्यो एवं सम्बन्धों को पूरा करने योग्य हो जाता है और स्वयं में दक्षता आ जाती है। 

अंग:-  समस्या समाधान प्रारूप के चार अंग 

 1) व्यक्ति    

2) समस्या  

3) स्थान 

4) प्रक्रिया 


 व्यक्तिः-  संस्था में सहायता लेने वाला व्यक्ति सेवार्थी कहलाता है। यद्यपि वह अन्य व्यक्तियों के समान ही होता है परन्तु कुछ भिन्नताएँ उस समय प्रकट होती है जब सेवार्थी को एक व्यक्ति के रूप में देखने का प्रयत्न करते है। समस्या चाहे उसकी सामाजिक हो, मनोवैज्ञानिक हो अथवा सांवेगिक वह प्रत्येक स्थिति में पूर्णतः में प्रतिक्रिया करता है। सेवार्थी जब संस्था में आता है तो उसका उद्देश्य उसकी मनोसामाजिक समस्या का समाधान प्राप्त करना होता है। वैयक्तिक कार्यकर्ता सेवार्थी का सामाजिक अनुकूलन दिलाता है। ऐसा करने के लिए वह सेवार्थी के व्यवहार को प्रभावित करता है।  वैयक्तिक कार्यकर्ता को सेवार्थी के व्यवहार के सम्बन्ध मंे निम्न जानकारी आवश्यक होती है- 

1. व्यक्ति विशिष्ट व्यवहार का अर्थ एवं उद्देश्य अर्थात् वह क्या चाहता हैः 

संतोष प्राप्त करना

भग्नाशा दूर करना या 

 समस्या समाधान करना या  कार्यात्मक सन्तुलन प्राप्त करना।   वैयक्तिक कार्यकर्ता के लिए आवश्यक होता है कि वह सेवार्थी के व्यवहार का सूक्ष्म-से-सूक्ष्म अवलोकन करे। 


2. व्यवहार की प्रभावात्मकता का ज्ञान कार्यकर्ता के लिए आवश्यक होता है। व्यक्तित्व संरचना का इससे पता चलता है। व्यक्तित्व संरचना पर प्रभाव डालने वाली संस्थाओं, एवं कारकों की कार्य पद्धति एवं प्रभावात्मकता का ज्ञान सहायता के लिए आवश्यक होता है।  व्यक्तित्व पर न केवल पूर्व स्थितियों का प्रभाव पड़ता है बल्कि वर्तमान अनुभव भी अपना महत्वपूर्ण प्रभाव डालता है। अतः कार्यकर्ता के लिए आवश्यक होता है कि वह सेवार्थी की वर्तमान जीवन पद्धति व स्थितियों से अवगत हो। उन वास्तविकताओं का ज्ञान प्राप्त करें, जिनसे सेवार्थी कष्ट में है। विगत अनुभवों के साथ- साथ भविष्य की आकांक्षाएँ तथा इच्छाएँ भी व्यक्ति के व्यवहार को प्रभावित करती है। अतः वैयक्तिक कार्यकर्ता के लिए आवश्यक है कि वह सेवार्थी की भविष्य की योजना समझे तथा ज्ञान प्राप्त करे कि उसकी कहाँ तक सहायता की जा सकती है।

3. संस्था में आने वाला व्यक्ति सदैव दवाब अनुभव करता है यह दवाब दो प्रकार का होता हैः  प्द्ध सेवार्थी जिसको स्वयं समस्या मानता है तथा दवाब एवं तनाव अनुभव  करता है  ’’)  असमर्थता की स्थिति जिससे दवाब एवं तनाव बढ़़ता है। समस्या का रूप चाहे जो हो- असफलता, आंतरिक संघर्ष, भूमिका आपूर्ति, उद्देश्य प्राप्त करने में बाधाएँ, व्यक्ति दबाव का अनुभव करता है। जिसके कारण अहं की शक्ति, समस्या समाधान करने में क्षीण हो जाती है।

4. व्यक्ति एक शारीरिक-मनो- सामाजिक संगठन है, अतः जब कोई एक अंग प्रभावित होता है तो उसका प्रभाव सभी अंगों पर पड़ता है। अतः वैयक्तिक कार्यकर्ता के लिए आवश्यक होता है कि वह सेवार्थी की शारीरिक व मनोसामाजिक स्थिति का ज्ञान प्राप्त करे।


 समस्या  

समस्या, कोई एक या एक से अधिक आवश्यकता होती है जो व्यक्ति की जीवनचर्या में व्यवधान तथा कष्ट उत्पन्न कर देती है। समस्या उस समय उत्पन्न होती है। जब व्यक्ति सामाजिक भूमिका पूरी करने में बाधा अनुभव करता है तथा वह अपने को समस्या समाधान करने में असमर्थ पाता है। संस्था में आने का सेवार्थी का उद्देश्य सहायता प्राप्त करना है जिससे वह अपनी भूमिका को पूरा कर सके। अतः वैयक्तिक कार्यकर्ता का कार्य सेवार्थी की भूमिका ग्रहण करने तथा पूरी करने में सहायता करना है। कार्यकर्ता सेवार्थी की आंतरिक समस्याओं के समाधान के लिए मनोचिकित्सा का उपयोग करता है। समस्या के चुनाव में कार्यकर्ता तीन बातों पर ध्यान देता हैः-  प्द्ध सेवार्थी क्या चाहता है या उसकी प्रमुख आवश्यकता क्या है? प्प्द्ध कार्य कर्ता क्या महत्वपूर्ण समझता है? प्प्प्द्ध संस्था में कौन-कौन सी सुविधाएँ उपलब्ध है?

कार्यकर्ता के लिए आवश्यक होता है कि वह अपना कार्य वहाँ से प्रारम्भ करे जहाँ से सेवार्थी इच्छा रखता है परन्तु अपने अनुभव द्वारा समस्या के केन्द्रबिन्दु पर पहुँचें। समस्या समाधान की प्रक्रिया के दो चरण है:  प्द्ध समस्या विश्लेषण चरण  प्प्द्ध निर्णय प्रक्रिया  समस्या विश्लेषण में निम्न बातों का ज्ञान आवश्यक है।

 1. आशातीत कर्तव्यपूर्ति का स्तर तथा वास्तविक कर्तव्यपूर्ति में अन्तर।

  2. स्तर से व्यवहार का विचलन या भूमिका की अपूर्णता। 

3. भूमिका का स्पष्ट अवलोकन, प्रत्यक्षीकरण तथा उसका विवरण।

4. समस्या उत्पन्न करने वाले कारकों के प्रभाव में परिवर्तन।

5. प्रमुख कारकों की खोज जो समस्या उत्पन्न करने में सक्रिय रहा है।   निर्णय प्रक्रिया में उद्देश्यों का स्पष्टीकरण, महत्व के आधार पर उद्देश्यों का वर्गीकरण समाधान के वैकल्पिक उपाय, उपायों का मूल्यांकन तथा निर्णय के सम्भावित प्रभाव आदि ज्ञात करना कार्यकर्ता के लिए आवश्यक होता है।


संस्था

सेवार्थी जिस स्थान पर सहायता के लिए आता है उसे सामाजिक संस्था कहते है। वैयक्तिक कार्य केवल संस्था के माध्यम से सम्पन्न होता है और सेवार्थी की समस्या का समाधान संस्था के माध्यम से होता है। सामान्यतः सहायता के लिए आवश्यक भौतिक और प्राविधिक उपकरण, विशिष्ट सेवा, आर्थिक सहायता आदि की व्यवस्था संस्था से ही की जाती है। संस्था समाज की इच्छा या विशिष्ट समूह की इच्छा को स्पष्ट करती है। यह एक कार्यक्रम का विकास करती है जिसके द्वारा एक विशेष क्षेत्र की आवश्यकताओं को पूरा किया जाता है। इसमें कार्य, उत्तरदायितत्व, कार्य के ढंग तथा नीतियाँ निश्चित होती है। संस्था का प्रत्येक कर्मचारी संस्था के प्रति उत्तरदायी होता है। उसका उत्तरदायित्व संस्था के कार्यो को पूरा करना होता है। वैयक्तिक कार्यकर्ता संस्था का प्रतिनिधित्व व्यक्तिगत अधिकार के रूप में समस्या समाधान के लिए करता है वह यद्यपि संस्था का प्रतिनिधि होता है परन्तु अपने व्यवसाय का प्रतिनिधित्व पहले करता है। कार्यकर्ता संस्था में काम करता है, सेवार्थी संस्था में आता है परन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं है कि कार्यकर्ता केवल संस्था का अंग होकर ही कार्य कर सकता है। वह संस्था के साधनों एवं श्रोतों का उपयोग, समस्या समाधान के लिए करता है। अपनी उन विधियों ,कार्य प्रणालियों तथा कार्यक्रमों का उपयोग करता है जिनको उसने अपने व्यवसाय से ग्रहण किया है। 


 प्रक्रिया  

सामाजिक वैयक्तिक सेवाकार्य प्रक्रिया, मूल रूप से समस्या समाधान करने वाली प्रक्रिया है। लेकिन सभी प्रकार की समस्याओं का समाधान इस प्रक्रिया द्वारा सम्भव नहीं होता है। केवल आन्तरिक तथा बाह्य समायोजन से सम्बन्धित समस्याओं को इसकी परिधि में रखा जाता है। सारांश में वैयक्त्कि सेवाकार्य प्रक्रिया दो प्रकार की समस्याओं से सम्बन्धित है। असन्तोष के स्थान पर संतोष दिलाना वर्तमान स्थिति से अधिक संतोष प्राप्त करना। तीन प्रकार के साधन सेवार्थी की सहायता करते हैंः

क- चिकित्सात्मक संबंध,

ख- कार्यप्रणाली का एक निश्चित रूप,   

 ग- समाधान के अवसर। इन साधनों की सहायता से न केवल व्यक्ति की मनोसामाजिक समस्याओं को सुलझाया जाता है वरन् व्यक्ति की क्षमताओं का यथासम्भव अधिकतम विकास कर उसे इस योग्य बनाया जाता है कि वह आत्मनिर्भर होकर अधिकतम सुख एवं संतोष प्राप्त कर जीवनयापन कर सके।

इस प्रक्रिया के अन्तर्गत कार्यकर्ता को मुख्यतः तीन कार्य करने होते हैः सेवार्थी की समस्या व्यक्तित्व और सामाजिक पर्यावरण से संबंधित तथ्यों का अध्ययन, समस्या का निदान तथा सहयोग द्वारा आन्तरिक व बाह्य समस्या का उपचार।