समाज कार्य विभाग, वर्धा में एलजीबीटीक्यू प्लस समुदाय एवं उनके अधिकार विषय पर परिचर्चा का आयोजन


महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा महाराष्ट्र, के महात्मा गांधी फ्यूजी गुरुजी समाजकार्य अध्ययन केंद्र में शोध वार्ता के तहत LGBTQ समुदाय एवं उनके अधिकारों (धारा 377 के विशेस संदर्भ में) एक परिचर्चा का आयोजन किया गया है। जिसमे प्रवक्ता के रूप में "आनंद चंद्रानी"जो कि खुद एक समलैंगिक है साथ ही सारथी ट्रस्ट, एन.जी.ओ. के निदेशक होने के नाते 2006 से LGBTQ समुदाय के अधिकारों के लिए काम कर रहे है। उन्हीने इस समुदाय के विभिन्न समस्याओं को लोगो के सामने रखा जिसमे उन्होंने बताया कि किस प्रकार धारा 377 का फायदा उठाते हुए पुलिस समलैंगिक को परेशान करती है। पुलिस ही नही अन्य सामाजिक तत्व द्वारा भी इन समुदाय को प्रताड़ना का शिकार होना पड़ता है, ब्लैकमेल कर उनसे कैसे पैसे वसूले जाते है।
मुख्य प्रवक्ता के रूप में "रवीना वरिहा" जी जो कि ट्रांसजेंडर वेलफ़ेयर बोर्ड छतीसगढ़ की सदस्य है। रवीना जी मितवा समिति कि अध्यक्ष है जो ट्रांसजेंडर समुदाय के बेहतरी के लिए 2009 से काम कर रही है। रवीना जी कहती है कि जब हम अर्धनारेश्वर के स्वरूप को पूजते है फिर तृतीय पंथ को समाज मे स्वीकार करने में हमे क्या समस्या है। वो प्रश्न करती है समाज से की नेपाल में एक बच्चा पैदा होता है जिसकी नाक लंबी है समाज उसे क्यो मरना चाहता है? क्यो नीग्रो परिवार में पैदा हुए एक गोरे बच्चे को वो समाज स्वीकार नही कर पाता है? सिर्फ इसलिए क्योकि उस समुदाय के लोग काले है पर उस बच्चे का रंग उन समुदाय के लोगो से अलग है। वो प्रश्न करती है क्यो हमारा समाज एक मानसिकता में सीमित है? क्यो हम अपने सीमित ज्ञान के दायरे से बाहर नही निकलना चाहते? वो कहती है कि जिस प्रकार से हम सुबह और रात के बीच मे आने वाले शाम को नही नकार सकते। एक बिंदु से दूसरे बिंदु को मिलाने वाले रेखा को नही नकार सकते है, उसी प्रकार स्त्री और पुरुष के अलावा एक और जेंडर है ट्रांसजेंडर जिसे हम नही नकार सकते।
रवीना जी बताती है कि हम सेक्स को तीन रूपो में देखते है पहला है जेंडर के रूप में , दूसरा है प्रजनन के रूप में और तीसरा है आंनद। जेंडर हमारी अभिव्यक्ति है हम किस प्रकार रहना चाहते है, किस प्रकार व्यवहार करना चाहते है। वो जैविक सेक्स की बात करती है जो दो प्रकार के होते है मेल और फीमेल । जिसमे हम मर्दाना और औरताना व्यवहार करते है। वो प्रश्न करती है कि क्यो समाज ने हमारे व्यवहार करने की अभिव्यक्ति को मर्द और औरतों में बांट दिया है। वो कहती है कि व्यवहार के साथ साथ भासा , दैनिक जीवन की वस्तुओ के उपयोग को भी 2 वर्गों में बाँट दिया गया है, जैसे- बचपन से ही बच्ची के हाथ मे गुड़िया थमा दिया जाता है और जो लड़का होता है उसे बेट बॉल,गाड़ी । वो कहती है कि इस सीमित मानसिकता और जेंडर द्वारा जो आचरण समाज ने निर्धारित किए है, हम उन मानसिकता को चुनौती देते है, इसलिए समाज से निष्काषित कर दिए जाते है।
उन्होंने इस मिथक की ओर भी ध्यान आकर्षित किया, जिसमें हम सब सोचते है कि यदि किसी बच्चे के पैदा होने पर उसके जननांग पूर्ण रूप से विकसित नही है तो वो ट्रांसजेंडर है। यह बहुत बड़ा मिथक है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि, इस प्रकार के किसी बच्चे को यदि ट्रांसजेंडर या हिजड़ा से संबोधित किया जाय तो यह कानूनन अपराध की श्रेणी में आएगा। इस प्रकार के बच्चे का उपचार मेडिकल में उपलब्ध है जिसे ऑपरेशन या अन्य तरीके से ठीक किया जा सकता है।
जो लोग कहते है कि LGBTQ परश्चिमी सभ्यता का परिणाम है तो रवीना जी अपने प्राचीन प्रमाणों का उदाहरण देती है जिसमे समलैंगिकता और ट्रांस समुदाय के अस्तित्व होने का साक्ष्य मिलता है। रामायण में किन्नर समुदाय के होने का प्रमाण मिलता है। जब 14 साल के वनवास के बाद राम जी सरयू नदी के किनारे आते है तो वहाँ स्थित झोपड़ी में किन्नर समुदाय से उनकी मुलाकात होती है। महाभारत में "श्रीखण्डी च महारथा" अर्थात श्रीखण्डी नाम की किन्नर रथ की वाहक होती है। उर्वसी द्वारा अर्जुन को किन्नर होने का श्राप मिला था । गुप्त काल मे महर्षि वात्सायन के "कामसुत्र" अध्याय 15 में समलैंगिकता के बारे में बताया गया है। मुगल काल के दौरान अलाउद्दीन खिलजी के दक्षिण भारत के सेनापति के रूप में एक ट्रांसजेंडर मल्लिका ही उस पद में थे। उस दौर में राजा हो या रानी उनके अंगरक्षक यही समुदाय के लोग होते थे। यदि अन्य धर्म की बात करे तो क्रिस्चन और इस्लाम में इन्हें देवदूत के रूप में देखा जाता है। प्राचीन समय मे इन समुदाय की स्थिति काफी अच्छी देखी जाती है। कोणार्क मंदिर और खजुराहो मंदिर समलैंगिक सेक्स के परोक्ष रूप से साक्ष्य हमे देती है। इसलिए हम नही कह सकते की यह सोच पश्चिमी है।
1875 में कार्ल गुस्तव जंग जो कि एक मनोचिकित्सक थे उन्होंने कहाँ था कि कोई भी व्यक्ति एक निर्धारित व्यवहार नही कर सकता। वो एक मर्द या औरत की तरह ही व्यवहार नही कर सकता, यदि वो पुरुष है तो उसका रुझान जरूरी नही है कि स्त्री के तरफ ही हो, पुरुष के तरफ भी उसका रुझान हो सकता है, या हो सकता है कि उसका रुझान स्त्री और पुरुष दोनों के तरफ हो। वो कहते है कि लोगो की अभिव्यक्ति मिश्रित हो सकती है वो मिश्रित व्यवहार कर सकता है, यह प्राकृतिक क्रिया है। इसे हम किसी सीमा में नही बांध सकते।


शिवानी अग्रवाल की कलम से