समाज कार्य में मूल्यांकन का कार्यक्षेत्र - Field Of Evaluation in Social Work.
वैयक्तिक कार्यकर्ता निम्न स्थितियों का मूल्यांकन करता हैः-
1. समस्या का मूल्यांकन
2. सेवार्थी के व्यक्तित्व का मूल्यांकन
3. सामाजिक पर्यावरण का मूल्यांकन
1. समस्या का मूल्यांकन - समस्या का मूल्यांकन करते समय वैयक्तिक कार्यकर्ता देखता है कि सेवार्थी वर्तमान समय में किस समस्या से ग्रसित है, कब से समस्या का प्रारम्भ हुआ है, समस्या के अन्तर्गत कौन-कौन से कारक है जिनके कारण सेवार्थी चिन्तित है, सेवार्थी ने समस्या सुलझाने के क्या प्रयत्न किये हैं, उसे अपने प्रयत्नो में कितनी सफलता प्राप्त हुई है, उसकी समस्या के समाधान के लिए किन-किन तरीकां एवं साधनों की आवश्यकता है, सेवार्थी का इस क्षेत्र में कितना ज्ञान है, वह स्वयं अपनी जिम्मेदारी ग्रहण करना चाहता है, समस्या का उसके जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा है ? इन सभी प्रश्नों का उत्तर मूल्यांकन द्वारा प्राप्त करता है ।
2. सेवार्थी के व्यक्तित्व का मूल्यांकन - कार्यकर्ता सेवार्थी की अहं शक्ति का मूल्यांकन समस्या समाधन हेतु करता है । वह देखता है कि उसका व्यवहार कैसा है ? उसके अनुभव कैसे है ? उसकी निर्णय शक्ति किस प्रकार कार्य करती है ? सेवार्थी वाह्य तथा आन्तरिक दबावों को किस प्रकार महसूस करता है ? कार्यकर्ता तथा संस्था से सेवार्थी की क्या आशाएं है तथा इन आशाओ की पूर्ति कहॉ तक की जा सकती है ? सेवार्थी की समायोजन की क्षमता का भी कार्यकर्ता अध्ययन करता है वह मनोरक्षात्मक तरीकों के उपयोग को भी देखता है वह सेवार्थी की सम्प्रेरणाओं तथा विरोधों का भी मूल्यांकन करता है।
3.सामाजिक पर्यावरण का मूल्यांकन - सामाजिक पर्यावरण के मूल्यांकन में कार्यकर्ता सेवार्थी की परिस्थितियों, घटनाओं तथा सम्बन्धित व्यक्तियों का अध्ययन करता है। सामाजिक पर्यावरण के प्रभाव को समस्या के सन्दर्भ में देखा जाता है । सेवार्थी के सामाजिक पर्यावरण के प्रति विचारां, भावनाओं, धारणाओं का भी मूल्यांकन होता है ।
मूल्यांकन की आवश्यकता - सुसंगठित तथा योजनाबद्ध मूल्यांकन से निम्नलिखित लाभ होते हैं :-
1. मूल्यांकन से समस्या के महत्व का ज्ञान होता है ।
2. सेवार्थी की मनोशक्ति का पता चलता है ।
3. अवरोधों एवं बाधाओं का पता चलता है ।
4. सेवार्थी की इच्छा का ज्ञान होता है ।
5. सेवा की उपयोगिता का आभास होता है ।
6. सेवार्थी की क्षमताओं, शक्तियों, निपुणताओं, सम्बन्धों, साथ ही साथ कमियों, अक्षमताओं, दोषों तथा संघर्षो को जाना जाता है ।
7. सेवार्थी को कहॉ तक सहायता की आवश्यकता है, जाना जाता है।
8. निदान के परिमार्जन तथा चिकित्सा पद्धति में विकास करने का ज्ञान होता है ।
9. वैयक्तिक सेवा कार्य के तरीकों एवं प्रविधियों की उपयुक्तता का ज्ञान होता है ।
10. मूल्यांकन द्वारा नयी-नयी बातों का पता चलता है तथा नयी समस्यायें उभर कर सामने आती हैं । इससे चिकित्सा की नई-नई प्रविधियों का उपयोग किया जाता है ।
इस प्रकार उपर्लिखित विवेचना से स्पष्ट है कि सामाजिक वैयक्तिक सेवा कार्य के साथ-साथ मूल्यांकन का कार्य भी अति महत्वपूर्ण होता है क्योंकि इससे निदान तथा चिकित्सा दोनां प्रक्रियाओं को लाभ पहुॅचता है । मूल्यांकन सदैव प्रयत्नों में वरीयता स्पष्ट करता है जिससे चिकित्सा कार्य सुचारू व व्यवस्थित रूप से सम्भव होता है ।

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