समाज कार्य में निदान के प्रकार - Forms Of Diagnosis In Social Work



 पर्लमैन के मत में निदान के तीन प्रकार हैं :-

  1. गतिशील निदान ( Dynamic Diagnosis)
  2. क्लीनिकल निदान ( Clinical Diagnosis)
  3. कारणात्मक निदान ( Etiological Diagnosis)
  

गतिशील ध्गत्यात्मक निदान  -  प्रत्येक प्रकार के वैयक्तिक सेवा कार्य में सेवार्थी की वर्तमान समस्या तथा अन्य सम्बन्धित कारको, उनके प्रभावों तथा परस्पर सम्बन्धों का ज्ञान आवश्यक होता है। इस ज्ञान को गत्यात्मक निदान कहते हैं क्योकि ज्ञान की वृद्धि के साथ-साथ निदान में भी अन्तर होता जाता है। गत्यात्मक निदान में निम्न तथ्य निश्चित किए जाते हैं :- 

1. समस्या क्या है ?  

2. मनोसामाजिक, शारीरिक या सामाजिक कारको का इस समस्या में क्या योगदान है ?  

3. समस्या का व्यक्ति पर क्या प्रभाव पड़ता है ? 

4. समाधान के क्या उपाय किये जायें ?  

5. सेवार्थी तथा उसकी परिस्थिति में क्या-क्या साधन उपलब्ध हैं ?  

6. संस्था में कौन-कौन से स्रोत तथा साधन हैं जिनसे समस्या का समाधान किया जा सकता है ?        

गतिशील निदान सरल अथवा जटिल दोनों प्रकार का हो सकता है। कहीं मनोवैज्ञानिक कारक अधिक प्रभावपूर्ण हो सकते हैं तो कहीं सामाजिक कारक वैयक्तिक कार्य की प्रारम्भिक स्थिति में निदानात्मक खोज का केन्द्र बिन्दु बदलता रहता है। इसका अर्थ यह नहीं कि यह पूर्ण रूप से बदल जाता है इसमें सेवार्थी तथा उसकी परिस्थिति के बारे में अधिकाधिक ज्ञान प्राप्त होने के साथ आवश्यक परिवर्तन किये जाते रहते हैं । 


 क्लीनिकल निदान -वास्तविक रोग को रोग के आधार पर वर्गीकृत करने के प्रयास को क्लीनिकल निदान कहते हैं । जब तथ्यों के परीक्षण तथा अन्वेषण से यह ज्ञात हो जाता है कि सेवार्थी का व्यक्तित्व उसकी समस्या के लिए स्वयं उत्तरदायी हैं तो उसके व्यक्तित्व कुसमायोजन तथा व्यक्तित्व अकार्यात्मकता को मूल्यांकित किया जाता है जिसे क्लीनिकल निदान कहते हैं। इसमें सेवार्थी के व्यक्तित्व असमायोजन के गुणों तथा व्यवहारों का वर्णन होता है।   व्यक्तित्व विघटन से सम्बन्धित व्यक्ति मनोविकार चिकित्सक के पास आता है और उसके द्वारा क्लिनिकल निदान किया जाता है परन्तु जब कोई व्यक्ति कोई कुसमायोजन सम्बन्धी समस्या को लेकर संस्था में आता है तो क्लीनिकल निदान करना आवश्यक नहीं कि उचित ही हो। यह उस समय लाभकर होता है जब यह निश्चित हो जाता है कि व्यक्तित्व विकार ही सामाजिक विकार का कारण है। इस स्थिति में क्लीनिकल निदान स्पष्ट करता है कि व्यक्तित्व की क्या समस्या है ? सेवार्थी की क्या आवश्यकता है तथा चिकित्सा की प्रक्रिया में सेवार्थी का कैसा व्यवहार हो सकता है ? 

परन्तु क्लीनिकल निदान यह स्पष्ट नहीं करता है कि मनोसामाजिक स्थिति की प्रकृति क्या है या उसका सेवार्थी, संस्था,व उददेश्य से क्या सम्बन्ध है अतः वैयक्तिक सेवा कार्य में यह निदान केवल आंशिक समझा जाता है ।  क्लीनिकल निदान में कार्यरत वैयक्तिक समाज कार्यकर्ता में इस बात की योग्यता होनी चाहिए कि वह इस बात की पहचान कर सके कि सेवार्थी के व्यक्तित्व में कुल मिलाकर दुख की क्या स्थिति है ? अर्थात उसमें मनो-विकास मनो-स्नायुविकृति, चारित्रिक एवं व्यवहारिक विसंगतियों के लक्षणों को पहचानने की योग्यता होनी चाहिये। इस प्रकार का निदान मनोचिकित्सको के सहयोग से किया जाता है ।  


कारणात्मक निदानवर्तमान समस्या के विकार तथा उससे सम्बन्धित कारणों के ज्ञान की जानकारी यह निश्चित करने में आवश्यक होती है कि अमुक समस्या के लिए गत्यात्मक निदान हितकर है अथवा क्लीनिकल निदान । अतः समस्या के जन्म तथा कारण के प्रभावों को निश्चित करना ही कारणात्मक निदान होता है। कारणात्मक निदान भी क्लीनिकल निदान की भांति एकांगी दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है क्योकि पूर्व कारको के महत्व को इससे स्पष्ट नहीं किया जाता है । कारण-प्रभाव-कारण के आधार पर समस्या का वास्तविक निदान करना एक दुष्कर कार्य है। कारणात्मक निदान से समस्याग्रस्त व्यक्ति तथा इसके समाधान में सहायक सिद्ध होने इससे प्राप्त वाले साधनों को समझने में सहायता मिलती है। सारांश में, वैयक्तिक कार्य में निदानात्मक प्रक्रिया तथा इससे प्राप्त परिणाम का उद्देश्य वैयक्तिक समाज कार्यकर्ता की सहायता प्रदान करने के इरादों एवं निपुणताओं की सीमा का ज्ञान कराना ,सार्थकता एवं निर्देशन प्रदान करना है। एक प्रक्रिया के रूप में यह सेवार्थी के व्यक्तित्व के प्रकार, उसकी आन्तरिक तथा वाह्य क्रिया एवं संसाधनों तथा संस्था के सहायतामूलक साधनों के सन्दर्भ में समस्या की प्रकृति का पता लगाने एवं मूल्यांकन करने का प्रयास करती है ।

 इससे प्राप्त परिणाम कर्ता  तथा सेवार्थी के बीच होने वाली अन्तर्क्रिया के महत्वपूर्ण बिन्दु स्पष्ट करता तथा आवश्यक निर्देशन प्रदान करता है। यह कार्यकारण सम्बन्धों का पता लगाती है ताकि समस्या के रोकने अथवा इसमें परिवर्तन लाने की दृष्टि से सार्थक हस्तक्षेप किए जा सके । इसके अन्तर्गत कोई उपचार का नुस्खा नहीं लिखा जाता बल्कि कुछ सामान्य प्रत्याशाओं की ओर इशारा किया जाता है और इस प्रकार वैयक्तिक समाज कार्यकर्ता की क्रियाओं को मार्गदर्शन दिया जाता है।