सामुदायिक संगठन
(Community 0rganization)
मानव जीवन
एक क्रम तथा निरंतरता भी बनाये रखने मे समाज का महत्वपूर्ण योगदान है। यह मानव
जीवन का आवष्यक आधार है, क्योकि जीवन मे कोई स्तर कभी नही
आएगा, जबकि समाज का साथ उससे छुट जाए। समाज के अभाव मे
मानवीय जीवन का अस्तित्व असंभव है। वस्तुतः मानव जीवन के अस्तित्व तथा प्रकृति का
रहस्य सामाजिक व्यवस्था मे निहित है।
प्रणाली का अर्थ - व्यवस्था
से तात्पर्य उस क्रमबद्धता से है जो किसी संरचना के विभिन्न कारकों के बीच एक
निष्चित प्रकार्यात्मक आधार पर पाई जाती है। व्यवस्था, परिवर्तनषीलता
एवं गतिषील धारणा है क्योकि बिना गतिषीलता के क्रियाषलता संभव नही है। मैकाइवर एवं
पेज सा. व्यवस्था के संबंध मे बतलाते है कि ’’समाज स्वयं एक व्यवस्था है। जो कि
समुदाय को साथ मे लेकर संचालित होती है। सह प्रचलनों, कार्यविधियों, पारस्परिक
सहयोग तथा विभिन्न समूहों और श्रेणियों व मानव व्यवहार के नियंत्रण एवं
स्वतंत्रताओं की एक व्यवस्था है।’’
पार्सन्स
के अनुसार:- सामाजिक व्यवस्था एक ऐसी परिस्थिति है जिसका कम से कम भौतिक या
पर्यावरण संबंधी पहलू हो। अपनी इच्छाआंे या आवष्यकताओं की आदर्ष पूर्ति भी
प्रवृत्ति, संप्रेरित एकाधिक वैयक्तिक कर्ताओं
की एक दूसरे के साथ अतः क्रियाओं के फलस्वरुप होती है और इन क्रियाकलापों मे लगे
हुए व्यक्तियों कि पारस्परिक संबंध उनकी परिस्थितियों के साथ सांस्कृतिक रुप से
संरक्षित तथा स्वीकृत प्रतियों की एक व्यवस्था द्वारा परिभाषित व मध्यस्थित होता
है।
मार्षल ई
जोनस के अनुसार:- सामाजिक व्यवस्था स्थिति है। जिससे की समाज को विभिन्न क्रियाषील
इकाईयाॅ आपस मे समग्र समाज के साथ संबंधित होती है।
सामाजिक
व्यवस्था की विषेषताएॅ:-
1. सामाजिक
व्यवस्था आपस में अंतःक्रिया करने वाली एकाधिक वैयक्ति कर्ताओं से संबंधित है।
2. अनेक
व्यक्ति जब परस्पर अंतःक्रिया करते है तो उनकी वे अंतःक्रियाएॅ जिस व्यवस्था को
उत्पन्न करती है उसी को सामाजिक व्यवस्था कहते है।
3. अन्तः
क्रियाओं के फलस्वरुप निष्चित सामाजिक संबंधो का होना सामाजिक व्यवस्थाओं मे
अनिवार्य है।
4. सामाजिक
व्यवस्था उस व्यवस्था को कहते है। जब विभिन्न समाज के निर्णयात्मक तत्वों मे
परस्पर एक अपूर्ण क्रमबद्धता तथा अंतः संबंध स्पष्टता विद्यमान है।
5. सामाजिक
व्यवस्था एक भौतिक या पर्यावरण संबंधी पहलू होता है।
6. सामाजिक
व्यवस्था में समाज के सदस्यों के स्वीकृत अथवा अंर्तनिहित उद्देष्य भी होते है।
7. सामाजिक
व्यवस्था मे अनुकूलन का गुण होता है।
8. मानवीय
आवष्यकताओं तथा पर्यावरण संबंधी परिणामों के कारण सामाजिक व्यवस्थायें परिवर्तन
होता है।
9. सामाजिक
व्यवस्था में संतुलन तथा क्रमबद्धता होती है।
सामुदायिक
संगठन में जिस तरह:- समुदाय एवं संगठन का अपना-अपना एक अलग महत्व है। उसी प्रकार
किसी भी समाज समुदाय या संगठन को एक निष्चित क्रमबद्धता में संचालित करने हेतु एक
प्रणाली की आवष्यकता होती है। जिस कार्यप्रणाली को ध्यान मे रखते हुए, समाज, समुदाय
या संगठन का विकास निहित होता है। इसी प्रणाली में कुछ आवष्यक तत्व होते है जो कि
समाज समुदाय व संगठन के विकास मे अपनी भूमिका सुनिष्चित करते है। ये तत्व निम्न
प्रकार के हो सकते हैः- जैसे विष्वास एवं ज्ञान,
भावनाएॅ या
संवेदना, आदर्ष कार्य एवं आवष्यकता।
विष्वास:-
विष्वास के
अन्र्तगत मुख्य रुप से निम्न बातों को रखा जा सकता है-
ऽ यह विष्वास की समुदाय द्वारा स्वीकृत
प्रवृत्ति का पालन करना उचित है उसकी अवहेलना करना नही।
ऽ यह विष्वास की जन्म या मृत्यु के चक्र से
छुटकारा पाना या न पाना अपने कार्य पर निर्भर करता है।
ऽ यह विष्वास की बुरे काम का प्रतिफल व्यक्ति
को अवष्य बुरा मिलता है।
सामाजिक
व्यवस्था के लिए उपरोक्त विष्वास आवष्यक है इसी ज्ञान, अनुभवों
से संबंधित होने के कारण सामाजिक व्यवस्था एक सा तत्व बन जाता है।
भावनाएॅ:-
जब और अधिक
विषम या जटिल मानसिक क्रियाओं के रुप में सगठित होने लगते है उन्हे भावनाएॅ कहा
जाता है। सामाजिक व्यवस्था संबंधी भक्ति और लगन की भावनाओं का यदि विकास न हो तो
समाज द्वारा नियंत्रित क्रियाओं का पालन ही नही हो सकता। वस्तुतः ये भावनाये भी
संगठन एवं व्यवस्था कि प्रेरक आत्मा है।
आदर्ष:-
किसी भी
समाज में आदर्ष सामाजिक चेतना के प्रतीक होते है,
और इस कारण
सामूहिक मूल्य आदर्ष तथा भावनाओं द्वारा इस आदर्ष नियमों को निरंतर बल प्राप्त
होता रहता है।
आदर्ष:-
किसी भी
समुदाय में पद के अनुसार ही व्यक्ति के कार्य होते है। इसी आधार पर व्यवस्था बनी
रहती है।
आवष्यकता:-
समुदाय मे
आवष्यकता ही मनुष्य को कार्य करने के लिए प्रतिबंधित करती है आवष्यकता ही मानव को
एक दूसरे के निकट लाने का सूत्र होती है प्रत्येक सामाजिक संबंध समुदाय का एक
लक्ष्य एवं उद्देष्य होता है।
कुछ
सिद्धांत:-
काॅब्स के
अनुसार
सामाजिक
व्यवस्था एक सामाजिक सामव्यय है वैयक्ति सामव्यय व
...................का.................... जब समुदाय एक विभिन्न स्तरों का
बौद्धिक स्तर समान नही होता है तो बौद्धिक अराजकता उत्पन्न हो जाती है। इससे
सामाजिक व्यवस्था का संतुलन बिगड़ जाता है। श्री ब्वउइमे के अनुसार सामाजिक व्यवस्था की पूर्णता और
स्थायीत्व समाज की मौलिक शक्ति क्रिया और कार्य पर आधारित होती है। जबकि बौद्धिक
शक्ति चिन्तन पर तथा नैतिक शक्ति स्नेह और सेवा पर आधारित होती है। आधुनिक सामाजिक
व्यवस्था की सबसे बड़ी समस्या उनका उचित अनुपात मिलाना और उनमें सामंजस्य की स्थिति
को बनाये रखना है।
दुुर्खीम
के अनुसार
सामाजिक सामुदायिक व्यवस्था के स्वरुप मे परिवर्तन होता
है। यह परिवर्तन यांत्रिक सामाजिक व्यवस्था से क्रमषः सामत्ययी व्तहंदपेउ की ओर होता है। दुर्खीम का कहना है कि आदि
कालीन समाज व्यवस्था यांत्रिक थी परंतु धीरे धीरे परिस्थितियों के बदलने के साथ
यांत्रिक सामाजिक व्यवस्था रुप बदलकर आधुनिक समाज मे व्तहंदपेउ व्यवस्था के रुप में स्पष्ट हो गया है।
पर्यटों का
सिद्धांत
इनके
अनुसार सामाजिक व्यवस्था का आधार वास्तव में सामाजिक संतुलन है, सामाजिक
संतुलन वह अवस्था है जिसमें समाज को निर्धारित करने वाली तथा समाज को संगठित करने
वाली शक्तियाॅ परस्पर एक संतुलित स्तर पर रहती है। समाज या समुदाय मे दोनो
शक्तियाॅ सदैव विद्यमान रहती है। क्रियाषीलता बनी रहती है। दोनो ही व्यस्था के
आवष्यक अंग है। परंतु सामाजिक व्यवस्था
तभी पनप सकती है, स्थिर रह सकती है और कार्य कर सकती
जब समाज को संगठित करने वाली और निर्धारित करने वाली दोनो विरोधी शक्तियों का
प्रभाव इतना अधिक न हो दूसरी शक्ति पूर्णतः दब जायें। पर्यटों के अनुसार ’’सामाजिक
व्यवस्था किसी प्रकार उत्पन्न सामाजिक संतुलन की ही व्यवस्था है।
समुदाय
सामाजिक व्यवस्था को और अधिक स्पष्ट रुप से महत्व को समझने के लिए सामुदायिक
प्रकार्य एवं समुदाय की संचरचना को समझ लेना अति आवष्यक है।
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