सामुदायिक विकास - Community Development



सामुदायिक विकास

(Community Development)


स्वाधीनता के पूर्व ग्रामीण उत्थान के लिए किए गए अनेक प्रयासों में स्व. महात्मा गाॅधी का ’’वर्धा’’ रविन्द्रनाथ का ’’षांतिनिकेतन’’ एफ.एल. देवड़े का गुड़गाॅव, एस.के.डे. का ’’नीलाखेड़ी’’ में चलाए गए कार्यक्रमों का महत्वपूर्ण स्थान है।’’


              महात्मा गाॅधी का विचार था कि - प्रत्येक गाॅव को पर्याप्त अनाज, कपड़ा तैयार करने के लिए पर्याप्त कपास पैदा करने की आवष्यकता है गाॅधीजी ने अखिल भारतीय ग्रामोद्योग संघ की स्थापना की जिसका मुख्य कार्य आवष्यक कुटीर उद्योगो को जीवित करना था।
1914 मे श्री रविन्द्रनाथ ने बोलपुर मे शांतिनिकेतन की स्थापना  की जिससे ग्राम वासियों को अपनी समस्या को सुलझाने मे सहायता मिली।


                पूना की ’’सेवेन्ट आॅफ सोसायटी’’ में ग्रामीण पुर्ननिर्माण के लिए उ.प्र.,मद्रास तथा म.प्र. मे कृषि तथा प्रषिक्षण के लिए स्कूलों कि स्थापना की इस सोसायटी के अन्र्तगत बीजो का वितरण, बालिका विद्यालय की स्थापना, मलेरिया निरोधक आंदोलन तथा उद्योग धन्धो को प्रोत्साहन आदि सम्मिलित है।


                 1940 में ग्वालियर में स्थापित आदर्ष सेवा संघ ग्रामीण जनता को कम्पोनेन्ट खाद्य बनाने वाला तथा प्रयोग करने वाला, गहरा हल चलाकर खेती करने एवं उन्नत किस्म के बीजों का प्रयोग करने जैसे विषयोंपर षिक्षित करता है। सन् 1940 मे ही डैनियल हैमेल्टन ने बंगाल मे आदर्ष बस्ती बनायी इसके पूर्व 1916 ई.मे एक शाख समिति की स्थापना की। 1921 ई. में ल्डब्। को कुछ नेताओं ने त्रिवेन्द्रम से 25 मील दक्षिण में ग्रामीण कल्याण की योजना प्रारम्भ की जिसका उद्देष्य आध्यात्मिक, मानसिक, शारीरिक, सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से ग्रामीण जीवन को उच्च करना था, इसके अतिरिक्त स्वतंत्रता पूर्व स्थापित ग्रामीण किसान सभाओं ने इस दिषा मे सराहनीय भूमिका निभाई।

               
                इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देष्य जनता के जीवन को ऊॅचा उठाना, कृषि का वैज्ञानिक ढंग से उपयोग करना ग्राम उद्योग को प्रोत्साहित करना, साक्षरता का प्रसार करना, चिकित्सा, स्वास्थ्य एवं मनोरंजन की व्यवस्था करना तथा पंचायतों को पुनः विकसित करना था।

स्वतंत्रता के पष्चात् ग्राम पुर्ननिर्माण के क्षेत्र मे राजकीय प्रयासांे ने अनेक योजनाओं को जन्म दिया है। इनमे श्री एच.एल. ग्राऊन के द्वारा बनायी गयी गुड़गाॅव योजना का अपना विषेष महत्व है। इस योजना का मुख्य उद्देष्य ग्रामीण जीवन का उत्थान करना विकास कार्यो को प्रोत्साहन देना. सुधार कार्यो को जन आंदोलनों के रुप में विकसित करना आदि था। 

                 
              1949-50 में श्री एम.के. डे. के नेतृत्व में संचालित नीलाखेड़ी को मजदूर मंजिल योजना का मुख्य उद्देष्य लौहइस्पात, पेट्रोलियम, सीमेंट तथा इनसे सम्बन्धित उत्पादनों को छोड़कर जीवन की अन्य सभी आवष्यकताओं की पूर्ति, ग्रामवासियों स्वयं पूरा करना था।

सामुदायिक विकास आधुनिक युग का अत्यंत लोक प्रचलित शब्द है एक कार्यक्रम के रुप मे इसका प्रसार विगत वर्षो में प्रारम्भ हुआ जिसे  मुख्य रुप से अविकसित देषों ने अपनाया, सामुदायिक विकास व्यवस्था के लिए अनेक प्रयत्न किए गए वास्तव में सामुदायिक विकास एक ऐसी योजना है. जो आत्म सहायता व सहयोग के सिद्धांतो के आधार पर स्वालम्बी उपायों से समाजिक और आर्थिक उन्नति पर बल देती है। योजना आयोग के द्वारा ’’जनता द्वारा स्वयं ही अपने प्रयासों से ग्रामीण जनता मे सामाजिक एवं आर्थिक परिवर्तन लाने का प्रयास सामुदायिक विकास है। 


                  एम.के.डे. ने सामुदायिक विकास को अपने शब्दों मे परिभाषित करते हुए कहा है कि  -
                     
           ’’ सामुदायिक योजना नियमित रुप से सामुदायिक कार्यो का प्रबंध करने के लिए अच्छे प्रकार से सोची हुई योजना है।’’

अंत मे निष्कर्ष रुप मे यह कहा जा सकता है कि सामुदायिक विकास एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमे सामुदायिक जनषक्तियों का प्रयोग उनके स्वयं के प्रयासों से एकत्रित करने संबंधित सरकारी एवं गैर सरकारी कर्मचारीयों द्वारा साम्प्रदायिक आर्थिक सामाजिक एवं सांस्कृतिक स्थिति को उच्च करने तथा सामुदायिक जीवन को राष्ट्रीय जीवन मे परिवर्तित करने जैसे कार्यो को सम्मिलित किया जाता है। मूलरुप से सामुदायिक विकास मे दो बाते सम्मिलित है -

(1)  अपनी वर्तमान स्थिति को उठाने के लिए तकनीकी एवं अन्य आवष्यक साधनों की उपलब्धता इस कार्य मे न केवल समुदाय के आर्थिक तकनीकी एवं वैज्ञानिक परिस्थितियों मे भी परिवर्तन लाया जाता है, बल्कि सामुदायिक मूल्यों एवं व्यवहारिक परिस्थिति मे परम्परा मे जकड़े होने के कारण ग्रामीण लोग धीरे-धीरे ही आधुनिक बातो मे विष्वास करते है।

(2)  अतः आवष्यक है कि सदस्यों के विचारांे मनोवृत्तियों एवं भावनाओं मे धीरे-धीरे परिवर्तन लाया जाए जिससे अपनी परम्परागत रुढ़ियों मे अनुकूल परिवर्तन लाया जा सके और उपलब्ध सरकारी एवं गैर सरकारी साधनों का उपयोग कर अपने व्यवहारिक जीवन को परिवर्तित कर सके. इसके लिए षिक्षण, प्रषिक्षण, चलचित्र, प्रदर्षनी, पोस्टर, चैनल, रेडियो, टेलीफोन आदि माध्यम का सहारा लेना चाहिए जिससे सामुदायिक जीवन मे अमूल परिवर्तन आ सके और सामुदायिक विकास सम्भव हो सके।