अंबेडकरवादी सामाजिक न्याय की अवधारणा - Ambedkarite Social Justice Concept
अंबेडकरवादी सामाजिक न्याय की अवधारणा-
डॉ. अंबेडकर का सामाजिक न्याय का सिद्धांत प्राकृतिक न्याय के अवधारणा के ज्यादा नजदीक है। डॉ. अंबेडकर गांधीवादी न्याय के सिद्धांत को एक छल कहते थे। वे मानते हंै कि जिस सामाजिक न्याय के सिद्धांत में जातिगत ऊंच-नीच, धार्मिक कट्टरता, लिंग भेद, पूर्वजन्म की कल्पना को मान्यता दी जाती है। वह सामाजिक न्याय हो ही नहीं समता। वे इसे ब्राह्मणवादी न्याय का सिद्धांत कहते हंै क्योंकि इस सिद्धांत में किसी जाति विशेष, लिंग विशेष का हित सुरक्षित है। इसलिए डॉ. अंबेडकर जिस सामाजिक न्याय की अवधारणा का प्रतिपादन करते है वे नस्ल भेद, लिंग भेद और क्षेत्रीयता के भेद से मुक्त है। इस अवधारणा में समाज के कमजोर वर्ग के साथ न केवल न्याय हो, बल्कि उनके अधिकार और हित सुरक्षित हो। संविधान निर्माण में उनके इस सिद्धांत की भूमिका स्पष्ट देखी जा सकती है।
डॉ.
अंबेडकर का सामाजिक न्याय सिद्धांत निम्न सामाजिक बाधाओं पर काम करता है।
1.
सामाजिक बहिष्कार
2.
पुरुष सत्ता
3.
जातीय आधारित काम करने की बाध्यता
4.
भूमि या संपत्तियों का असमान वितरण
5.
महिलाओं को पिता एवं पति की संपत्ति में अधिकार
भारतीय
संविधान इस मामले में सर्वोच्च और उत्कृष्ठ है। इसमें सामाजिक न्याय की पूर्ति में
लिए इन बाधाओं को दूर करने का प्रयास किया गया है। सामाजिक न्याय पाने की दिशा में
विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया सहित तमाम केंद्रों के
प्रयास कहीं न कहीं गलत कार्यान्वयन और असंतुलन के कारण फलीभूत नहीं हो पा रहे
हैं। जरूरत और समय की मांग है कि उचित और संतुलित नीतियों-व्यवहारों को लागू किया
जाए जिससे कि सामाजिक न्याय को सामाजिक प्रगति का हिस्सा बनाया जा सके। अरस्तु के
अनुसार व्यक्ति समाज का सदस्य तो हो सकता है लेकिन नागरिक वह तभी कहलायेगा, जबकि वह राज्य की राजनीति में सक्रिय रूप से
योगदान करता है और इसी संदर्भ में सक्रिय रूप से योगदान करता है और इसी संदर्भ में
संदर्भ में अरस्तु कहते हैं कि किसी भी राज्य या समाज में किसी व्यक्ति का जो
सक्रिय योगदान होता है उसके समानुपात में समाज की सम्पत्ति का उचित वितरण
वितरणात्मक न्याय कहलाता है और इसका निषेध वितरणात्मक सामाजिक अन्याय कहलाता है।
लेकिन यह एक आदर्श स्थिति है। व्यवहार में यह कहीं पर भी लागू नहीं है क्योंकि
व्यक्ति सदस्य के योगदान का ठीक-ठीक आंकलन संभव नहीं है। इसका कोई पैमाना नहीं है।
सीमा रेखा नहीं है! इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि सामाजिक न्याय के
नारे ने विभिन्न समाजों में विभिन्न तबकों को अपने लिए गरिमामय जिंदगी की मांग
करने और उसके लिए संघर्ष करने के लिए प्रेरित किया है। खास कर वंचित तबको
में। सैद्धांतिक विमर्श में भी समाजवाद, कम्युयनिस्ट सहित अंबेडकरवाद जैसे सामाजिक
न्याय में बहुत सारे आयाम जुड़ते गये हैं। यहां यह बताना जरूरी है कि विकसित समाज
की तुलना में विकासशील समाजों में सामाजिक न्याय का संघर्ष रक्तरंजित है। इन
संघर्षों के फलस्वरूप समाजों में बुनियादी बदलाव हुए हैं।
आज
जिस प्रकार से भारतीय जेलों में विचाराधीन कैदी भारी संख्या में अजा अजजा और
अल्पपसंख्यक वर्ग से आते हैं, एक
आंकड़े के मुताबिक वे अपनी आबादी के 30 प्रतिशत है। जिस प्रकार आरक्षण के खाली
पदों को योग्य उम्मीदवार नहीं कहकर उच्च वर्ग के सक्षम वर्ग द्वारा भरा जाता है, जिस प्रकार एक बलात्कार पीडि़त महिला को ही
इसके लिए दोषी ठहराया जाता है, जिस
प्रकार देश के 40 प्रतिशत गरीब बच्चों से बाल श्रम लिया जाता है, उस देश में लगता है सामाजिक न्याय आज भी कोसो
दूर है। लेकिन इसका सुखद पहलू यह है कि आज की मीडिया, साहित्य और प्रगतिशील जगत इस मुद्दे को बार-बार
सामने लाता रहा है। इससे सामाजिक न्याय के पक्ष में माहौल बना है। ये माहौल देश के
कर्णधारों को इस विषय पर सोचने के लिए मजबूर करेगा। तब कहीं जाकर देश में सही
मायने में सामाजिक न्याय का एक माहौल तैयार हो सकेगा। और यह समाज एक विकसित समाज
कहलायेगा।
जैसा
कि यह सर्वविदित है कि सामाजिक न्याय एक ऐसा विषय है जो समाज में सभी को आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक रूप से समान सिद्ध करता है। आज के
परिवेश में समाज में व्याप्त सारी अनियमितताओं एवं बुरार्इयों के कारण जहॉ अधिकतर
व्यक्ति किसी न किसी प्रकार से सामाजिक न्याय की भावना मात्र से भी परे है वही इस
विषय का लाभ कुछ विशेष व्यक्तियों तक ही सीमित होकर रह गया है। जनसंख्या की वृद्धि
तथा द्वितीयक सुखों की प्राप्ति की कामना ऐसे तत्व है जो अनायास ही समाज को
सामाजिक न्याय से वंचित करने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन कर रहे है। जिसके
पास सामथ्र्य है वो सभी क्षेत्रों में आगे है तथा वंचितों का शोषण भी करता है।
इसके साथ ही कहीं न कहीं पूर्वी एवं पष्चिमी सभ्यताओं के मेल व आपसी स्वीकारिता के कारण भी कुछ स्तर तक सामाजिक न्याय की स्थिति परस्पर विचलित हो रही है। उदाहरणत: हम अगर खाप पंचायतों का मुददा ले तो सहज ही देखते है कि दो सभ्यताओं के मिलाप से समाज पर किस प्रकार का प्रभाव पड़ता है। भारत में सामाजिक न्याय को पूर्ण स्तर तक पाने व अपनाने के लिये सभी के पास कुछ न कुछ रूकावटें सम्मुख खड़ी है। कुछ विषय ऐसे है जहॉ न्याय की बात होती है तथा यदि वहॉ समानता एवं स्पष्टता सामने आ जाय तो सामाजिक न्याय की परिकल्पना को भारतीय परिवेश में सिद्ध किया जा सकता है किसी न किसी रूप में भारत के सभी नागरिक सामाजिक न्याय के लाभ विषयों से जुड़े हुये से प्रतीत होते है। यदि हम सामाजिक न्याय के लाभ विषय को स्पष्ट रूप से समझने की कोशिश करें तो आधुनिक भारत में
सामाजिक
न्याय के लाभ विषय मुख्य रूप से निम्नवत् दिखायी पडते है-
एच0आर्इ0वी0/एड्स
उन्मुख बालचिकित्सा
मादक
दवा दुव्र्यवहार
लिंग
आधारित भेदभाव
शहरी
स्वच्छता की स्थिति
कूड़ा
- कचरा प्रबन्धन
असंगठित
श्रमिकों की समस्याये
शिक्षा
का अधिकार
नगरीकरण
की समस्या
अवयस्कों
की अपराधिक गतिविधियों में संलिप्तता
भारत
में कुष्ठ रोग समस्या
भारत
में औरतों की दुर्दशा
भ्रूण
हत्या
शिशु
मृत्यु दर
खाप पंचायत
महिलाओं
में धूम्रपान एवं मघपान
गरीबी
जन
स्वास्थ्य तन्त्र
राज्यों
में गरीबी का विकास
लिंग
अनुपात
बाल
दुव्र्यवहार
किशोरावस्था
स्वास्थ्य कार्यक्रम
शिक्षा
की स्थिति
सम्मान
सुरक्षा हेतु हत्यायें
शिक्षा
का एकीकरण
काम
करने वाली महिलाओं की समस्यायें
भूखमरी
महिलाओं
हेतु शिक्षा से जुड़ी समस्याये
वेष्यावृत्ति
मद्यपान
बाल
अपराध
अस्पृश्यता
पेयजल
समस्या
बाल
कुपोषण
वृद्धावस्था
की समस्यायें
वैश्विक खाद्य भण्डार में कमी
जनसंख्या
वृद्धि
भारत
में क्षयरोग
भारत
में पोलियों
भारत
में एड्स
भिक्षावृत्ति
बाढ़
नियंन्त्रण
महिलाओं
के प्रति बढ़ते अपराध
किशोरों
के प्रति बढ़ते अपराध
ग्रामीण
परिवेश में स्वास्थ्य की स्थिति
जन्म
एवं मृत्यु पंजीकरण
रोजगार
के नये आयाम
व्यवहारिक
शिक्षा की स्थिति
भ्रष्टाचार
ग्रामीण
सन्दर्भ में स्वच्छता की महत्ता
मातृ-मृत्यु दर एवं स्वास्थ्य स्थिति
व्यावसायिक
शिक्षा की स्थिति
स्थायी
विकास
वर्ग
संघर्ष
शिक्षा
दर
महिला
- सशक्तिकरण
दहेज
व्यवस्था
बाल
श्रम
ग्रामीण
परिवेश में लड़कियों की शिक्षा स्थिति
बेरोजगारी
मानव-तस्करी
घरेलू
दिशा
दलितों
की स्थिति
प्रवसन

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