सामाजिक न्याय का महत्व - Importance of social justice
सामाजिक न्याय का महत्व
सामाजिक
न्याय की अवधारणा सामाजिक कार्य के अभ्यास के लिए केंद्रीय है। यह पेशेवर सामाजिक
कार्य के मुख्य मूल्यों में से एक है नेशनल एसोसिएशन ऑफ सोशल वर्कर्स के अनुसार, सामाजिक न्याय सामाजिक कार्य का एक मार्गदर्शक
सिद्धांत है जिसमें अनिवार्य रूप से समान आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक अधिकारों को बढ़ावा देना
शामिल है। वे असमानता और उत्पीड़न के खिलाफ कई महत्वपूर्ण तरीकों से लड़ने की
कोशिश करते हैं,
सामान्य फ़ोकस के साथ उन लोगों की सहायता करने
पर जिनकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है
सामाजिक न्याय की अवधारणा एक बहुत ही व्यापक शब्द है। इसमें एक व्यक्तिके नागरिक अधिकार तो है ही साथ ही सामाजिक (भारत के परिप्रक्ष्य में जाति एवं अल्पसंख्यक) समानता के अर्थ भी निहितार्थ है। ये निर्धनता, साक्षरता, छुआछूत, मर्द-औरत हर पहलुओं को और उसके प्रतीमानों को इंगित करता है। सामाजिक न्याय की अवधारणा का मुख्य अभिप्राय यह है कि नागरिक नागरिक के बीच सामाजिक स्थिति में कोई भेद न हो। सभी को विकास के समान अवसर उपलब्ध हों। विकास के मौके अगड़े-पिछड़े को उनकी आबादी के मुताबिक मुहैया हो ताकि सामाजिक विकास का संतुलन बनाया जा सके। सामाजिक न्याय का अंतिम लक्ष्य यह भी है की समाज का कमजोर वर्ग, जो अपना पालन करने के लिए भी योग्य न हो। उनका, विकास में भागीदारी सुनिश्चित हो। जैसे विकलांग, अनाथ बच्चे। दलित, अल्पसंख्यक, गरीब लोग, महिलाएं अपने आपको असुरक्षित न महसूस करे। संसार की सभी आधुनिक न्याय प्रणाली प्राकृतिक न्याय की कसौटी पर खरा उतरने की चेष्टा करती है, अंतिम लक्ष्य होता है कि समाज के सबसे कमजोर तबके का हित सुरक्षित हो सके अन्याय न हो। यदि वर्तमान भारतीय न्याय प्रणाली पर गौर करे तो यह कई विभागों में बांटी गई है, जैसे फौजदारी, दीवानी, कुटुम्ब, उपभोक्ता आदि आदि। लेकिन इन सभी का किसी न किसी रूप में सामाजिक न्याय से सरोकार होता है।

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