सामाजिक न्याय की अवधारणा के मुख्य आधार स्तम्भ - The main pillars of the concept of social justice
सामाजिक
न्याय की अवधारणा के मुख्य आधार स्तम्भ ये हैं:-
1.
जातीय ऊंच-नीच को मिटाना
2.
धार्मिक ऊंच-नीच की मान्यता को मिटाना
3.
लंैगिक भेदभाव को खत्म करना
4.
क्षेत्रीयता के भेदभाव को खत्म करना
डॉ.
अंबेडकर के सामाजिक न्याय के सिद्धांत को समझने से पहले परंपरागत सामाजिक न्याय
व्यवस्था को जानना आवश्यक है। भारत की सामाजिक न्याय प्रणाली में मनुस्मृति के
नियम कड़ाई से लागू होते हैं। आज भी खाप पंचायतों द्वारा दिये जाने वाले निर्णयों
का आधार मनुस्मृति ही है। खाप पंचायत ही क्यों समस्त जातीय पंचायतें अपने सामाजिक
फैसले अनजाने मनु के नियमों का पालन करते देखी जाती है। उदाहरण देखें- यदि कोई
भाई-बहन सम्पत्ति के विवाद को लेकर परंपरागत जातीय पंचायत से फैसला चाहता है तो उस
जाति पंचायत बहन को सम्पत्ति से बेदखली का फरमान जारी करेगी। प्रश्न ये है कि ऐसे फरमान
का आइडिया इन्हें कहां से मिलता है, दरअसल
ये आइडिया इन्हें मनुस्मृाति से मिलता है जो भारतीय जनमानस में समाया हुआ है।
वास्तव
में भारत में परंपरागत सामाजिक न्याय प्रणाली निम्न तीन बिंदुओं पर आधारित होती
है।
1.
अंधविश्वास
2.
जाति भेद (जातिय श्रेष्ठता एवं नीचता)
3.
लैंगिक भेद (महिलाओं का मानवीय अधिकार से बेदखल करना)
इस
प्रणाली पर विश्वास या श्रद्धा का मुख्य आधार धार्मिक ग्रंथ है जो ऐसे विश्वासों
की पुष्टि करते हंै। इन ग्रंथों पर प्रश्न न उठे इसलिए इन्हें अपौरुषेय (ईश्वर
द्वारा लिखित) कहा गया। ऐसा करने का एकमात्र लक्ष्य यही था, किसी खास जाति विशेष, लिंग विशेष को बिना मेहनत सुख-सुविधा मुहैया
कराया जा सके। गौरतलब है कि ऐसा विश्व के अन्य समुदाय में भी ऐसा होता था। ये
ग्रन्थ ब्राह्मण को सर्वश्रेष्ठ और अन्य को मुक्त गुलाम बनाने की ओर प्रेरित करते
हैं। गौरतलब है कि भारत में जातीय श्रेष्ठता का आधार जन्म है न कि कर्म।
मनुस्मृति
अध्याय 10 श्लोक क्रमांक 129 देखें।
किसी
भी शूद्र को संपत्ति का संग्रह नहीं करना चाहिए चाहे वह इसके लिए कितना भी समर्थ
क्यों न हो, क्योंकि जो शूद्र धन का संग्रह कर लेता है, वह ब्राह्मणों को कष्ट देता है। (मनुस्मृति
अध्याय 1 श्लोक 87 से 91 देखें।)
ब्राह्मणों
के लिए उसके अध्ययन-अध्यापन, यज्ञ
करने दूसरों से यज्ञ कराने दान लेने एवं देने का आदेश दिया। लोगों कि रक्षा करने, दान देने यज्ञ करने पढऩे एवं वासनामयी वस्तुओं
से उदासीन रहने का आदेश क्षत्रियों को दिया। मवेशी पालन, दान देने यज्ञ कराने पढऩे व्यापार करने धन उधार
देने तथा खेती का काम करने की जिम्मेदारी वेश्यों की दी गई। भगवान ने शूद्र को एक
कार्य दिया है उन पूर्व लिखित वर्गों की बिना दुर्भाव से सेवा करना।

वार्तालाप में शामिल हों