न्यास क्या होता हैं - What isTrust in NGO Sector



न्यास(Trust)

भारत में दो प्रकार के न्यास मौजूद हैं सार्वजनिक और निजी। 

निजी न्यास, भारतीय न्यास अधिनियम, 1882 द्वारा नियंत्रित होते हैं। इस अधिनियम के अन्तर्गत निजी, धार्मिक, सार्वजनिक और धर्मार्थ प्रयोग के लिए धन-संपत्ति के प्रबंधन के लिए एक न्यास बनाए जाने की व्यवस्था है। न्यासियों से अपेक्षा की जाती है कि वे न्यास को सुचारू रूप से चलाएं किंतु संभवत: वे विश्वास भंग भी कर सकते हैं। विश्वास भंग की स्थिति में न्यास की परिसंपत्तियों का अधिग्रहण किया जा सकता है। न्यासियों को व्यक्तिगत लाभ या मुनाफा कमाने का हक नहीं होता है पर वे न्यास को चलाने के लिए खर्चे का भुगतान मांग सकते हैं। न्यास से त्यागपत्र दिए बगैर अथवा अवकाश प्राप्त किए बगैर न्यासी अपने दायित्वों का परित्याग नहीं कर सकते हैं। आयकर अधिनियम 1961 के तहत न्यास की प्रस्थिति प्रायः एक समिति के समान होती है। अधिकतर न्यास धार्मिक, धमार्थ और शैक्षणिक होते हैं। भारत में न्यासों पर नियंत्रण एवं विनियमन रखने वाले विधानों में प्रमुख हैं धर्मार्थ वृत्तिदान अधिनियम 1890, धर्मार्थ और धार्मिक न्यास अधिनियम 1920, सरकारी न्यास अधिनियम 1913.


लोक न्यासों की स्थापना सार्वजनिक धर्मार्थ उद्देश्यों से की जा सकती है। लोक-न्यासों को गठित करने का कोई केन्द्रीय कानून नहीं है। हालांकि कुछ राज्यों ने लोक धर्मार्थ अधिनियम बनाया है, फिर भी अधिकांश राज्यों में ऐसा कोई अधिनियम लागू नहीं है किसी न्यास को एक राज्य में पंजीकृत किया जा सकता है, परंतु वह अन्य राज्यों में भी कार्य कर सकता है। एन. जी. ओ. को केवल लोक न्यास अधिनियम के तहत ही बनाया जा सकता है।

                भारतीय न्यास अधिनियम, 1882 के कुछ लाभ हैं। पहला यह बहुत लचीला है, इसमें सरकारी हस्तक्षेप नाम मात्र को ही है। दूसरा यह न्यासियों की संख्या को विनिर्दिष्ट नहीं करता है। तीसरा इसके अन्तर्गत ट्रस्ट को वैधानिक स्वरूप देने की विधि बहुत सरल है। साथ ही इस अधिनियम की कुछ सीमाबद्धता जो अग्रलिखित है:- न्यासी अपने न्यास से कोई भी लाभ नहीं कमा सकते हैं जो कि न्यासियों (जो कार्मिक सदस्यों के रूप में काम करते हैं) के लिए समस्यामूलक है। संगठनात्मक संरचना की बन्द व्यवस्था किसी भी नियुक्त सदस्य की पदच्युति की अनुमति नहीं देती है।