दृश्य श्रव्य माध्यम : फिल्म - Audio Audio Medium : Film

दृश्य श्रव्य माध्यम : फिल्म - Audio Audio Medium : Film


टेलीविजन के समान फिल्में भी जनसंचार के लिए महत्वपूर्ण श्रव्य दृश्य माध्यम हैं। प्रकाश, ध्वनि, रंग और दृश्य के माध्यम से संचार करने वाले इस माध्यम की पहुँच आबालवृद्ध, शिक्षित अशिक्षित, निर्धन धनी, कृषक-मजदूर आदि सभी तक है। भारत का फिल्म उद्योग काफी समृद्ध है। भरतमुनि द्वारा 2,000 वर्ष पूर्व रचित नाट्यशास्त्र के काव्यशास्त्रीय एवं नाट्यशास्त्रीय सिद्धान्तों के परम्परागत स्वरूप से प्रभावित भारतीय सिनेमा अनेक भाषाओं और क्षेत्रों में निर्मित होता है।


हिलती-डुलती फिल्मों का आरम्भ एडिसन द्वारा आविष्कृत काईनेटोस्कोप (Kinetoscope) से होता है। यह एकछिद्रयुक्त बॉक्स था, जिसमें उसमें रील में लिपटी तस्वीरें होती थीं और उन्हें एक व्यक्ति एक बार में देख सकता था। जार्ज ईस्टमैन ने तस्वीरों की रील को लचीला बनाया, जिसके आधार पर काइनेटोस्कोप में देखी जाने वाली तस्वीरें हिलती-डुलती महसूस होने लगीं। अप्रेल 14, 1894 में न्यूयार्क में पहली बार एक फोनोग्राफ पार्लर द्वारा तस्वीरों को दिखाने का सिलसिला शुरु हुआ। ऐडिसन द्वारा निर्मित काइनेटोस्कोप को फ्रांस के ल्युमियर बन्धुओं ने एक नई प्रोजेक्शन मशीन से जोड़ दिया और 1896 में इस मशीन को प्रसतुत किया।


उस मशीन ने एडीसन को उसके काइनेटोस्कोप को सुधारने के लिए प्रेरित किया और 13 अप्रेल, 1896 को एडीसन ने 'वीटास्कोप' का आविष्कार किया और उसके बाद से तस्वीरों का प्रदर्शन बेहतर से बेहतर हो गया। आरम्भ में फिल्मों में गतिशीलता नहीं थी, प्रोजेक्टर द्वारा शीघ्रता के साथ एक के बाद एक तस्वीर दिखाए जाने से तस्वीरों के गतिशील होने का भ्रम होता था, यहाँ से जनसंचार के माध्यम के रूप में फिल्मों का आरम्भ होता है।


भारत में फिल्मप्रदर्शन की शुरुआत 7 जुलाई, 1896 से हुई जब फ्रांस के ल्युमियर बन्धुओं ने बम्बई के वाटसन होटल में पहली बार फिल्म का प्रदर्शन किया। इस फिल्म में ट्रेन का आगमन समुद्र स्नान आदि के गतिशील चित्र थे। इसके लिए टाइम्स ऑफ इन्डिया में विज्ञापन भी दिया गया था। इसका नाम रखा गया था- The marvel of the country' and 'Wonder of the world. 15 अग्रस्त 1897 तक इस फिल्म का प्रदर्शन होता रहा और इसके प्रति बढ़ती जनरुचि को देखते हुए भारत में विदेशी फिल्मों का प्रदर्शन होने लगा।


हरिश्चन्द्र भटवाडेकर पहले भारतीय थे, जिन्होंने फिल्म निर्माण कार्य आरम्भ किया और कुश्तीबाज तथा आदमी और बन्दर नामक दो लघु चित्र तैयार किये । भारतीय कथानक पर आधारित पहली फिल्म 'पुण्डलीक' बनी और 18 मई, 1912 को बम्बई में प्रदर्शित हुई । भारतीय सिनेमा दादा साहब फालके का ऋणी है। दादा साहब ने न केवल 'राजा हरिश्चन्द्र' नामक फिल्म (3 मई, 1913) बनाकर भारतीय सिनेमाजगत् को समृद्ध किया अपितु फिल्मों के लिए कुछ निश्चित सिद्धान्त भी बनाए। दादा साहब ने मुख्यतः पौराणिक कथानकों पर आधारित फिल्में बनाईं। प्रथम विश्वयुद्ध के समय फ्रांस, जर्मनी और इंग्लैण्ड में फिल्म उद्योग की गति बहुत धीमी हो गई और उपकरणों का आयात करना बहुत मँहगा होगया, उस समय भी दादा साहब फालके ने 'लंकादहन' फिल्म बनाकर अपार सफलता पाई। सन् 1919 में जे. एफ. मदान ने कलकत्ता में पहली बांग्ला फिल्म सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र तथा मद्रास में नटराज मुदालियर ने कीचक वध का निर्माण किया और उसके साथ बम्बई, कलकत्ता और मद्रास में फिल्म उद्योग की नींव रख दी गई। 








सन् 1929 तक भारत में लगभग 38 फिल्में प्रतिवर्ष बनती थीं जो 1931 तक 270 तक पहुँच गईं। तब तक यानी 1913 से 1931 तक फिल्में मूक थीं। 1931 में आलमआरा के निर्माण के साथ भारत मे सवाक् फिल्मों का दौर आरम्भ हुआ। 1932 से रंगीन फिल्मों के निर्माण के प्रयास शुरु हुए और पहली पूर्ण रंगीन फिल्म 'किसानकन्या ( 1937 ) के निर्माण के साथ फिल्म जगत् का एक नया इतिहास बनने लगा। 1938 से मद्रास यूनाइटेड आर्टिस्ट्स कॉरपोरेशन ने तमिल, तेलगु, मलयालम और हिन्दी में फिल्में बनाना आरम्भ किया। सोहराब मोदी, हिमांशु राय, सत्यजित रे और पचास के दशक में राजकपूर, गुरुदत्त, विमल रॉय व्ही शान्ताराम, कमाल अमरोही, साठ के दशक में के.आसिफ, सत्तर के दशक में मृणाल सेन, श्याम बेनेगल, एम. एस. सथ्यू, महेश भट्ट आदि के द्वारा निर्मित फिल्मों ने अपार लोकप्रियता पाई सन् 1960 में फिल्म वित्त निगम की स्थापना के बाद परम्परागत फिल्मों से हटकर कलात्मक फिल्में भी बनने लगीं। अब एक ओर पारम्परिक 'मसाला' फिल्में बनी आर दूसरी ओर श्याम बेनेगल, गोविन्द निहलानी, सईद मिर्जा आदि की परम्परा से हटकर फिल्में बनीं।


आज देश में फिल्मों का निर्माण अत्यन्त आधुनिक ढंग से हो रहा है और अनेक संस्थान भी इसमें मदद कर रहे हैं। फिल्मों से जुड़े कुछ प्रमुख संस्थान हैं 1. राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम 2 इन्डियन मोशन पिक्चर्स एक्सपोर्ट कॉरपोरेशन, 3. फिल्म डिवीजन, 4. फिल्म समारोह निदेशालय 5 फिल्म वित्त निगम, 6. राष्ट्रीय बाल एवं युवा फिल्म केन्द्र तथा 7. भारतीय फिल्म और टेलीविजन संस्थान फिल्म डिवीजन शिक्षा, सूचना तथा संदेश देने के लिए भारतीय जीवन, कला, संस्कृति, साहित्य और उससे जुड़े विविध पक्षों को लेकर वृत्तचित्र तैयार कर उनका वितरण करता है। राष्ट्रीय तथा क्षेत्रीय विकास परियोजनाओं तथा कार्यक्रमो से सम्बंधित न्यूजरील तैयार करता है। राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम छोटे बजट की श्रेष्ठ फिल्मों को प्रोत्साहन देता योग्य निर्माताओं को पुरस्कृत करता है, ख्यातिनाम निर्देशकों द्वारा निर्देशित श्रेष्ठ पटकथा वाली फिल्मों का निर्माण करता है, विदेशों से श्रेष्ठ फिल्मों का आयात और भारत की श्रेष्ठ फिल्मों का निर्यात करता है और उच्च कोटि की फिल्मों के वीडियो कैसेट निर्मित करता है। फिल्म समारोह निदेशालय का उद्देश्य भारत में अन्तरराष्ट्रीय फिल्म समारोह आयोजित करना है।


भारतीय फिल्म और टेलीविजन संस्थान प्रतिभासम्पन्न युवाओं को फिल्म निर्माण का तथा टी.वी से जुड़े विषयों का प्रशिक्षण देता है। राष्ट्रीय बाल एवं युवा फिल्म केन्द्र बच्चों और युवाओं से सम्बद्ध फिल्मों के निर्माण, वितरण से जुड़ा है। यह संस्थान भारत में बच्चों के अन्तरराष्ट्रीय फिल्म समारोह का भी आयोजन करता है। इसके अलावा फिल्म सेंसर बोर्ड का गठन भारतीय सिनेमेटोग्राफ अधिनियम 1952 के तहत हुआ है, जिसका कार्य हमारे समाज के मूल्यों के अनुरूप, कलात्मक अभिव्यक्ति में समर्थ, रचनात्मक फिल्मों को प्रसारण के लिए स्वीकृति प्रमाणपत्र देना है। असामाजिक गतिविधियों, अपराधों, हिंसा, अश्लीलता अदालत विषयक मानहानि आदि से जुड़ी भावनाओं के प्रसार को यह बोर्ड रोकता है। कुल मिलाकर जनसंचार के ये समृद्धतम साधन, जिनमें हम वीडियो कैसेट, केबल टी.वी. आदि को भी शामिल करते हैं, अब अपरिहार्य हो चुके हैं और हम इनके अभाव में जीने की कल्पना ही नहीं कर सकते ।