विश्व पत्रकारिता का संक्षिप्त इतिहास - Brief History of World Journalism

विश्व पत्रकारिता का संक्षिप्त इतिहास - Brief History of World Journalism


पत्रकारिता का जन्म मनुष्य की सतत जिज्ञासा और साहित्य के प्रति उसके स्वाभाविक अनुराग के संयोग से हुआ माना जाता है। अपनी विकास यात्रा में पत्रकारिता ने तटस्थता और विश्वसनीयता के बूते पर ऐसा मुकाम हासिल कर लिया कि उसे लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण अवयव माना जाने लगा। आजादी का दूसरा नाम पत्रकारिता माना जाने लगा। अंग्रेजी के महत्वपूर्ण साहित्यकार एडीसन ने पत्रकारिता के बारे में कहा था, पत्रकारिता से अधिक मनोरंजक अधिक चुनौतीपूर्ण अधिक रसमयी और अधिक जनहितकारी कोई दूसरी बात मुझे दिखाई नहीं देती। एक स्थान पर बैठकर प्रतिदिन हजारों-लाखों लोगों तक पहुंच जाना, उनसे अपने मन की बात कह देना, उन्हें सलाह देना, शिक्षा देना परामर्श देना, उन्हें विचार देना, उनका मनोरंजन करना, उन्हें जागरूक बनाना सचमुच बेहद आश्चर्यजनक होता है।


कागज और मुद्रण का आविष्कार सबसे पहले चीन में हुआ और फिर यह कला चीन से यूरोप में पहुंची। यह माना जाता है कि चीन में ही सबसे पहला समाचार पत्र निकला जिसका नाम पैकिंग गजट अथवा तिचाओं था। यूरोप में पहली प्रेस की स्थापना सन् 1440 में हुई। जर्मनी के गुटेनबर्ग नामक एक ईसाई ने इस प्रेस को स्थापित किया था और उसी ने सबसे पहले बाइबिल को छापा यह भी माना जाता है कि इंग्लैंड में कैक्सटन ने 1477 में प्रेस स्थापित की। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि इंग्लैंड का पहला समाचार पत्र 1603 में प्रकाशित हुआ था और इसका आकार बहुत छोटा था। इसमें विदेश की खबरें ही छपती थीं। स्वदेश की खबरें छापने की तब अनुमति नहीं थी। सन् 1666 में लंदन गजट प्रकाशित हुआ। यह सप्ताह में दो बार छपता था सत्रहवीं शताब्दी के अंत में एकाएक लेखकों और पत्रकारों की संख्या में वृद्धि हुई और टैटलर, स्पेक्टेटर, एग्जामिनर, गार्जियन, इंग्लिश मैन, लवर आदि अनेक साप्ताहिक प्रकाशित हुए ग्रब जर्नल उस समय का सबसे अधिक प्रसिद्ध पत्र था।


'पत्रकारिता से अधिक मनोरंजक, अधिक चुनौतीपूर्ण, अधिक रसमयी और अधिक जनहितकारी कोई दूसरी बात मुझे दिखाई नहीं देती। एक स्थान पर बैठकर प्रतिदिन हजारों-लाखों लोगों तक पहुंच जाना, उनसे अपने मन की बात कह देना, उन्हें सलाह देना, उन्हे शिक्षा देना- परामर्श देना, उन्हें विचार देना, उनका मनोरंजन करना, उन्हें जागरूक बनाना सचमुच बेहद आश्चर्यजनक होता है। - एडीसन


सबसे पहला समाचारपत्र यूरोप से निकला। हालैंड में 1526 में पहला समाचार पत्र प्रकाशित हुआ। इसके बाद 1610 में जर्मनी में, 1622 में इंग्लैंड में, 1660 में अमेरिका में 1703 में रूस में और 1737 में फ्रांस में पहला पत्र निकला। इंग्लैंड में पोस्टमैन नाम से पहला साप्ताहिक समाचार पत्र 21 सितंबर 1622 को लन्दन से निकला। उसके 80 साल बाद लंदन से ही 11 मार्च 1702 को पहला दैनिक पत्र प्रकाशित हुआ। जिसका नाम डेली करेंट था।







पत्रकारिता का क्षेत्र न केवल विविधात्मक है बल्कि व्यापक भी है। जीवन का कोई भी विषय, कोई भी पक्ष ऐसा नहीं है जो पत्रकारिता से अछूता हो। आज हर विषय से जुड़ी पत्र पत्रिकाएं बाजार में उपलब्ध है। विशेषज्ञ जानकारी देने वाली पत्रिकाओं से लेकर जनसामान्य तक के लिए अपनी पसंद के हिसाब से पत्र पत्रिकाएं उपलब्ध हैं। यह जानना काफी रोचक है कि लगभग साढ़े तीन सदी में पत्रकारिता की विकास यात्रा ने इतनी लम्बी दूरी तय कर ली है कि आज प्रारम्भिक दौर की पत्र पत्रिकाएं किसी दूसरी दुनिया के लोगों का काम नजर आती हैं। कुछ सूचनाओं, कुछ किस्सों, कुछ गपों और कुछ जानकारियों के साथ शुरू पत्रकारिता आज विशेषज्ञता के चरम उत्कर्ष तक पहुंच चुकी है। इस यात्रा में तकनीक के विकास का भी बेहद अहम रोल है मगर असल योगदान पत्रकारिता को दिशा देने वाले पत्रकारों का हैं, जिन्होंने तमाम व्यक्तिगत कष्ट झेलते हुए भी पत्रकारिता के आदर्शों की स्थापना की, उसके मूल्यों को जीवित बनाए रखा।


आधुनिक विश्व में तमाम जन क्रान्तियों में पत्रकारिता का महत्वपूर्ण योगदान रहा। चाहे अमेरिका की आजादी की लड़ाई हो या भारत का स्वाधीनता संग्राम, अफ्रीका में जातीय स्वतंत्रता का मोर्चा हो या एशियाई देशों के आंतरिक मसले, हर जगह पत्रकारिता ने राष्ट्रीयता से उपर उठकर वैश्विक दृष्टिकोण को सामने रखा और जन अभिव्यक्ति का साथ दिया। 


एक दौर था जब यह माना जाता था कि पत्रकारिता वास्तव में एक चुनौती है, जिसके आवश्यक तत्व हैं- उत्तरदायित्व अपनी स्वतंत्रता बनाए रखना, सभी दबावों से परे रहना, सत्य प्रकट करना, निष्पक्षता और समान एवं सभ्य व्यवहार। आज के दौर में बाजारीकरण के दबाव के चलते पत्रकारिता के इन तत्वों में कुछ बदलाव जरूर हो गया है लेकिन अभी भी यह माना जाता है कि पत्रकारिता एक पेशा नहीं बल्कि एक जीवन शैली है और इस राह पर चलने वाले की रीढ़ मजबूत होनी जरूरी है।


पत्रकारिता यानी समाचार पत्रों को आज की स्थिति तक पहुंचने में बहुत से पड़ावों से गुजरना पड़ा है। वर्तमान की बात यदि हम छोड़ दें तो छापेखाने से समाचार पत्रों का सीधा सम्बंध है। लेखन के लिए कागज का निर्माण चीन में 105 ई० में हुआ था। यद्यपि इससे पूर्व मिश्र में पेपीरस के उत्पादन का प्रमाण मिलता है। भारत में भोजपत्र और ताड़ पत्रों का प्रयोग लेखन के लिए किया जाता था। चीन में पांचवी या छठी शताब्दी में लकड़ी के ठप्पों से छपाई का कार्य आरम्भ हुआ। 11वीं शताब्दी में पत्थर के ठप्पों का प्रयोग होने लगा। 1390 ई० में कोरिया में धातु के टाइप का प्रयोग करके पहली पुस्तक छापी गई थी। इसके बाद चीन के माध्यम से यह कला यूरोप पहुंची। सन् 1400 ई. में मेनज नगर में जन्मे जोहान गुटेनबर्ग ने टाईप (अक्षरों का टाइप फेस) तैयार किया और 1445 में पहली बार इस टाईप से पुस्तक छपी। 1458 में इटली के मैसोफिनी ग्वेरा ने तांबे पर खुदाई करके छपाई का काम आरम्भ किया। 1477 ई० में इंग्लैंड में विलियम कैक्सटन ने अपने छापेखाने से पुस्तकें छापनी आरम्भ की। इंग्लैण्ड में सन् 1561 में न्यूज आउट ऑफ केंट नामक एक पृष्ठ का पत्र और 1575 ई० में 'न्यू न्यूज' का प्रकाशन हुआ माना जाता है। 1620 में हालैंड के एमस्टर्डम से नियमित निकलने वाला अंग्रेजी पत्र प्रकाशित हुआ।


अमेरीका में पहला पत्र 'पब्लिक अकरेंसेस बोथ फारेन एण्ड डोमेस्टिक नाम से प्रकाशित हुआ। 1609 में असवार्ग से जर्मन भाषा में 'अविश' और 'जीटुंग' और स्टासवर्ग से 'रिलेशन' नामक पत्र प्रकाशित हुए। 1776 में प्राग से एलोयस सेने फेल्डर ने छपाई की एक नई प्रणाली लिथोग्राफी प्रारम्भ की।


स्वीडन में पहला पत्र ऑर्डिनरी पोस्ट टिजडेंटर नाम से 1665 में प्रकाशित हुआ। चैकोस्लोवाकिया में जर्मन प्रकाशक जे० अर्नाल्ट ने जर्मन भाषा में 1672 में एक पत्र प्रकाशित किया। चैक भाषा का प्रथम समाचार पत्र 1719 में कारेल फैटीसेक रोजनमूलर ने चेस्की पोस्टीलियन नेवोलिजिट्टू नोविनी चेस्के नाम से प्रकाशित किया।


लंदन के 'दि टाइम्स' पत्र की स्थापना 1785 में हुई। 1881 में 'गार्जियन' की शुरुआत हुई, जो मैनचेस्टर गार्जियन' के नाम से विख्यात था 'डेली टेलीग्राफ' की 1855 में, 'ईवनिंग न्यूज: 1881 में, फाइनेंशियल टाइम्स' 1888 में 'डेली मेल' 1896 में 'डेली एक्सप्रेस' 1900 में, 'डेली मिरर' 1903 में शुरू हुए। रविवारीय पत्रों में आब्जर्वर' 1791 में 'न्यूज ऑफ दि वर्ड' 1853 में, 'संडे टाइम्स' 1822 में, संडे पीपल 1881 में शुरू हुए। पत्रकारिता के एक रूप को रोमन गणराज्य के जन्म के साथ विकसित हुआ माना जा सकता है।








रोमन साम्राज्य में संवाद लेखकों की व्यवस्था के प्रमाण मिलते हैं। ईसा से पांचवीं शताब्दी पूर्व ये संवाद लेखक हाथ में लिख कर समाचारों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाया करते थे। इसके उपरांत जूलियस सीजर ने 60 ई. पू. 'एक्टा डोएना' नाम से दैनिक बुलेटिन निकाला जो राज्य की जरूरी सूचनाओं का एक हस्तलिखित पोस्टर होता था। भारतीय इतिहास में अशोक ने सुदृढ़ शासन व्यवस्था को कायम रखने के लिए विशेष प्रयत्न किए। राजकार्य के कुशल संचालन के लिए उपयोगी सूचनायें विभिन्न स्रोतों से प्राप्त करने हेतु व्यवस्था की थी साथ ही शिला लेखों की परम्परा ने भी इसे आगे बढ़ाया। आज से करीब 1350 वर्ष पूर्व चीन में विश्व का पहला पत्र तिंचाओं शुरू हुआ था। यह हस्तलिखित पत्र था । विश्व का सबसे पुराना नियमित समाचार पत्र स्वीडन का पोस्ट ओच इनरिक्स ट्रिडनिंगर था जिसे रायल स्वीडिश अकादमी ने 1644 में छापना शुरू किया था। विश्व का सबसे पुराना व्यावसायिक समाचार पत्र 8 जनवरी 1658 को हालैंड में 'बीकेलिक कूरंत बात यूरोप नाम से शुरू हुआ था। आज इसका नाम 'हार्लेक्स दोगब्लेडे हारलमेशे कूरंत' है। छापेखाने के आविष्कार के बाद प्रारम्भिक मुद्रक एक कागज पर समाचार छाप कर फेरी वालों को मुफ्त में दे देते थे। विश्व का पहला दैनिक समाचार पत्र 'मार्निंग पोस्ट' था, जो 1772 में लंदन से प्रकाशित होना शुरू हुआ था। इसके कुछ ही दिनों बाद लन्दन से ही 'टाइम्स' नामक समाचार पत्र प्रकाशित होना शुरू हुआ।


सोलहवी और सत्रहवीं शताब्दी में फ्रांस में 'सोलोन' और ब्रिटेन में काफी हाउस इस बात के लिए लोकप्रिय हो गए थे कि वहां लेखक व बुद्धिजीवी एकत्र होते थे और समाचारों का आदान-प्रदान करते थे हमारे देश में भी प्राचीन काल से ही लोग गांवों की चौपालों में बैठ कर समाचारों, विचारों का आदान-प्रदान किया करते थे। आज भी कमोवेश यह क्रम जारी है।


भारत में मुगल साम्राज्य की स्थापना के साथ ही संवाद सेवा के युग का आरम्भ हुआ। मुगलों ने संचार सेवाओं के लिए सूचनाधिकारियों की नियुक्ति की। औरंगजेब (1658-1707) ने शासकीय व्यवस्था को चौकस रखने के लिए सूचनाओं के आदान-प्रदान का प्रबंध किया। संवाद लेखकों की वाकियानवीस व खुफियानवीस के तौर पर नियुक्ति की 18वीं शदी के पहले चरण में ईस्ट इंडिया कम्पनी ने भी इन संवाद लेखकों की सेवायें हासिल की हमारे देश में पत्रकारिता अंग्रेजों ने शुरू की। जेम्स आगस्टस हिकी और विलियम ड्यूएन जैसे पत्रकारों ने तत्कालीन कम्पनी सरकार की काली करतूतों का भंडाफोड़ किया। वारेन हेस्टिंग्ज (1772-1785) जैसे तानाशाहों को मजबूर कर दिया कि वह या तो उन्हें जेल भिजवा दे या हिन्दुस्तान से निर्वासित कर दे। यद्यपि ये झगड़े उनके आपसी थे, जनहित से उनका कोई सरोकार नहीं था, फिर भी पत्रकारिता में निर्भीकता के उदाहरण समझे जाते हैं।


भारत में तत्कालीन अंग्रेज शासकों का भारतीय पत्रकारों और पत्रकारिता के प्रति क्या दृष्टिकोण था, यह टॉमस मुनरो (19वीं शताब्दी के तीसरे दशक में मद्रास के गवर्नर) के इस कथन से स्पष्ट होता है- "हमने हिन्दुस्तान में अंग्रेजों के साम्राज्य की नीव इस नीति पर रखी है कि हमने अपनी प्रजा को न तो कभी प्रेस की आजादी दी है और न देंगे। यदि यहां की पूरी जनता हमारी तरह अंग्रेज होती तो मैं प्रेस की स्वतंत्रता की मांग स्वीकार कर सकता था लेकिन ये तो हमारे उपनिवेश के रहने वाले यहां के नेटिव हैं। इनको प्रेस की आजादी देना हमारे लिए खतरनाक है। दोनों एक साथ नहीं चल सकते हैं।"


हिन्दुस्तानी, प्रेस यानी छपाई की मशीन का प्रयोग सीख कर कहीं अखबार छापना शुरू न कर दें और ब्रिटिश साम्राज्य को एक नया खतरा पैदा न हो जाए. अंग्रेजी सरकार इस बात से डरती थी। कहा जाता है कि हैदराबाद निजाम के दरबार में नियुक्त ईस्ट इंडिया कम्पनी के एजेंट ने निजाम को मुद्रित पत्र का एक नमूना उपहार में दिया तो कम्पनी सरकार ने उस एजेंट की भर्त्सना की कि ऐसी खतरनाक मशीन निजाम को क्यों दिखाई। नतीजा यह हुआ कि एजेंट ने अपने कारिन्दों से उस मशीन को तुड़वाकर फिंकवा दिया।


यूरोप में पुनर्जागरण तथा अमेरिका में लोकतंत्र की स्थापना, फ्रांस की क्रांति के बाद शुरू हुई औद्योगिक क्रांति से लोगों का जन जीवन धीरे-धीरे पेचीदा व जटिल होता गया। पूंजीवाद के विकास के साथ साम्यवाद ने भी पैर पसारने शुरू कर दिए। विज्ञान ने एक साथ ढेर सारी तरक्की कर ली और संचार के साधन विकसित हो गए। इन परिवर्तनों से पत्रकारिता भी प्रभावित हुई। सबसे पहले प्रभाव यह हुआ कि परिवर्तनों तथा शिक्षा के फैलाव से लोगों में जागृति आने लगी और वे दुनिया में तेजी से आ रहे बदलाव तथा घटित हो रही घटनाओं को जल्द से जल्द जानने के लिए उत्सुक रहने लगे। इस प्रवृत्ति के कारण जहां एक ओर समाचार पत्र पत्रिकाओं के प्रकाशन में वृद्धि हुई, वहीं उनकी प्रसार संख्या भी बढ़ी। प्रसार संख्या बढ़ने के साथ-साथ अब पत्र पत्रिकाओं में खेल जगत, अर्थजगत, शिक्षा, विज्ञान, फोटोग्राफी, फिल्म उद्योग, साहित्य सृजन आदि क्षेत्रों को भी पत्रकारिता अपना अभिन्न अंग बना लिया अब पत्रकारिता को चलाना मात्र मिशन नहीं रह गया, बल्कि प्रसार संख्या बढ़ने, नये नये विषयों के समावेश, डाक के द्वारा पत्र पत्रिकाओं को दूरस्थ स्थानों को भेजे जाने आदि ने पत्रकारिता को व्यवसाय बना दिया। वर्तमान में यह व्यवसाय खूब फल-फूल रहा है। नये-नये औद्योगिक और व्यापारिक संस्थान उभरने लगे हैं। अब समाचार पत्रों तथा पत्रिकाओं में अपने उत्पादन को विश्व बाजार में पनपाने के लिए विज्ञापनों की भरमार देखने को मिलती है। दूल्हा चाहिए, दुल्हन चाहिए, शिक्षाविद् चाहिए, वैज्ञानिक चाहिए आदि के इस कम्प्यूटराइज्ड युग ने पत्र-पत्रिकाओं की पृष्ठ संख्या बढ़ाने में मदद दी है और इस सब का परिणाम है बड़े-बड़े व्यवसायियों द्वारा उच्चकोटि के लेखकों व सम्पादकों को खरीदा जाना ताकि पत्र पत्रिकाएं सम्पादक की नीति के अनुसार नहीं, मालिक की नीति के अनुसार प्रकाशित हों।