बाल कल्याण - Child welfare



बाल कल्याण - Child welfare


भारत के संविधान में बाल कल्याण से सम्बंधित विभिन्न संवैधानिक प्रावधान इस प्रकार हैं :- 


(i) अनुच्छेद 24 : चौदह वर्ष से कम आयु का कोई भी बालक किसी फैक्टरी या खान या खतरनाक रोजगार में काम करने के लिए नियुक्त नहीं किया जाएगा। 


(ii) अनुच्छेद 39 (e): कर्मचारियों, पुरुषों और महिलाओं के स्वास्थ्य और शक्ति और बच्चों की नाजुक उम्र का दुरुपयोग नहीं किया जाएगा और नागरिकों का उनकी आर्थिक मजबूरी के कारण अनुचित लाभ उठाकर उनकी आयु और शक्ति के लिए अनुपयुक्त उप-व्यवसायों में लगाने में जबरदस्ती नहीं की जाएगी।


(iii) अनुच्छेद 39 (1): बच्चों को स्वस्थ ढंग से, और स्वतंत्रता और सम्मान के वातावरण में विकास करने के अवसर और सुविधाएं दी जाएगी और सुविधाएं दी जाएंगी, और उनके बचपन और युवावस्था को शोषण से तथा नैतिक और भौतिक उपेक्षा से बचाया जाएगा। 


(iv) अनुच्छेद 41: शासन अपनी आर्थिक सामर्थ्य और विकास की सीमाओं के अन्तर्गत, काम करने के अधिकार, शिक्षा पाने के अधिकार और बेरोजगारी, वृद्धावस्था बीमारी और अपंगता और जरूरतमंदों की आवश्यकताओं के मामले में सार्वजनिक सहायता अन्य उपलब्ध कराने के प्रभावकारी इंतजाम करेगा।


(v) अनुच्छेद 45: शासन संविधान के लागू होने से दस वर्ष की अवधि के भीतर सभी बच्चों को उनके चौदह वर्ष की आयु पूर्ण होने तक, निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने का प्रयत्न करेगा।


(vi) अनुच्छेद 47: शासन अपने लोगों के पोषण के स्तर को बढ़ाने और जीवन स्तर को ऊंचा उठाने और जनता के स्वास्थ्य में सुधार लाने को उसके प्राथमिक कर्तव्य समझेगा और विशेष रूप से शासन मदिरापान और नशीली दवाइयों के प्रयोग, सिवाय औषधि के रूप में निषेध की पूरी कोशिश करेगा। शासन की यह जिम्मेदारी है कि वह यह सुनिश्चित करें कि बच्चों का दुरुपयोग न किया जाए और नागरिकों काम करने के लिए मजबूर न किया जाए।







बाल मजदूरी (निषेध और विनियम) अधिनियम :- 


1986 यह अधिनियम बाल मजदूरी पर रोक लगाने के लिए लागू किया गया था। यह कानून यह प्रावधान करता है कि 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को फैक्ट्रियों में खतरनाक काम करने से दूर रखा जाए। इसमें 18 उद्योगों की एक सूची तैयार की गई है जो खतरनाक है। क्योंकि वे स्पष्ट रूप से बच्चों के लिए हानिकारक है। इनमें बीड़ी बनाना, कालीन बुनना, सीमेंट उत्पादन, माचिस, विस्फोटक पदार्थ और पटाखे आदि शामिल हैं। इस अधिनियम के अनुसार अन्य स्थापनाओं में काम करने वाले बच्चों के लिए काम का समय (घंटे) काम की अवधि साप्ताहिक छुट्टियों आदि को भी नियंत्रित किया गया है। एन० जी० ओ० के कार्यकर्ताओं को अवश्य ही सरकारी कर्मचारियों के साथ सहयोग करना चाहिए, और बच्चों को खतरनाक काम की परिस्थितियों से हटाने के लिए सृजनात्मक तरीके ढूँढने चाहिए। ग्रास रूट स्तर पर लोगों को बाल मजदूरी को समाप्त करने और बाल मजदूरों के पुनर्वास के लिए स्वयं काम करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।


हिन्दू दत्तक और संरक्षण अधिनियम, 1956 (Hindu Adoption and Protection Act, 1956)


इस अधिनियम के प्रावधानों (धारा 20) के तहत एक हिन्दू व्यक्ति (पुरुष / स्त्री) अपने जीवन काल में अपने वैध / अवैध बच्चों के भरण-पोषण के प्रति बाध्य हैं। एक वैध / अवैध बच्चा जब तक नाबालिग (18 वर्ष से कम आयु का) होता है तब तक अपने पिता या माता से भरण-पोषण (संरक्षण) की मांग कर सकता है। 'भरण-पोषण' (संरक्षण) की परिभाषा में खाद्य सामग्री, वस्त्र रिहायश, शिक्षा और चिकित्सा देखभाल और उपचार शामिल हैं। अविवाहित पुत्री के मामले में उसके विवाह पर होने वाला उपयुक्त खर्च भी इसमें शामिल हैं।