संचार और भाषा - Communication and Language
संचार और भाषा - Communication and Language
सामाजिक प्राणी होने के नाते मनुष्य स्वभावतः अपन भाव अपने विचार दूसरे मनुष्य तक पहुँचाता और दूसरे के भावों को स्वयं समझना चाहता है। इसके लिए वह जिन माध्यमों को अपनाता है, भाषा उनमें सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है, मानव के क्रियाकलापों और व्यवहार का साधन, उसकी प्रत्येक वाचिक क्रिया का आधार और विचारों का माध्यम होने के कारण यो अपने व्यापक अर्थ में भाषा वह साधन है जिसके द्वारा एक प्राणी दूसरे प्राणी तक अपने भाव, विचार या अभिप्राय प्रेषित करे और दूसरे के भाव विचार या अभिप्राय स्वयं ग्रहण करे भाषा के दो रूप हो सकते हैं-
1. मूक भाषा,
2 मुखर भाषा
मूक भाषा से तात्पर्य अभिव्यक्ति के उन माध्यमों से हैं, जिनमें वाणी का प्रयोग नहीं होता। हम अंग विक्षेप (Gesture) अर्थात् हस्त संचालन द्वारा गर्दन हिलाकर, नेत्रों के द्वारा और संकेतों (sign or signal) द्वारा जो भी अभिव्यक्ति करते हैं, उसका माध्यम मूक भाषा मुखर साधनों (Spoken language) में पशु-पक्षियों की भाषा हमारे लिए अव्यक्त बाक होने के कारण व्याख्यायेय नहीं है। अव्यक्त वाक' से तात्पर्य अस्पष्ट और अनिश्चित वाणी से है अभिप्राय यह कि पशु-पक्षियों की भाषा हमारे लिए भावाभिव्यंजना में असमर्थ है, क्योंकि हम उनकी भाषा नहीं समझते। तुलसी के शब्दों में कह सकते हैं खग जाने खग ही की भाषा मानवेतर प्राणियों की अपेक्षा मनुष्य की बोली के पीछे चिन्तन होने के कारण उसका स्वरूप निश्चित है। उसका अध्ययन विश्लेषण किया जा सकता है। यहीं मानव द्वारा बोली जाने वाली 'भाषा' वस्तुतः भाषा के अन्तर्गत आती है। इस तरह भाषा का प्रयोजन वाणी द्वारा प्रयुक्त ऐसी ध्वनियों से है, जो अध्ययन द्वारा विश्लेषित हो और जिनके हेर फेर से शब्द बन सकें।
व्याकरणिक दृष्टि से भाषा शब्द का यदि हम विश्लेषण करें तो ज्ञात होता है कि 'भाषा' शब्द संस्कृत की 'भाष धातु से निष्पन्न है, जिसका अर्थ हैव्यक्त वाणी। इसके आधार पर भाषा की परिभाषा है- व्यक्त वाणी में बोलना। किन्तु भाषा की यह परिभाषा भाषा के स्वरूप को पूर्णतः स्पष्ट नहीं करती क्योंकि भाषा केवल विचाराभिव्यक्ति का साधन ही नहीं है विचारों का माध्यम भी है। भाषा विचारों की अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम है; मानव के उच्चारणयोग्य अवयवों से निःसृत सार्थक ध्वनिसमूह है; यादृच्छिक है; प्रतीकों की व्यवस्था है, समाजसापेक्ष है और भाषा का प्रयोजन वक्ता के विचारों को श्रोता तक पहुँचाना है।
भाषा एक ओर वर्णनात्मक ध्वनि (सार्थक ध्वनियों) से सम्बद्ध है और दूसरी ओर भाव और विचारों से इस प्रकार हमारी भाषा का आधार भौतिक और मानसिक है। यहाँ हम यह व्याख्या नहीं करेंगे कि भाषा क्या है? यहाँ हम भाषा के व्यावहारिक प्रयोग पर विचार करेंगे कि किस तरह भाषा हमारे लिए अपरिहार्य है, किस तरह भाषा का सही सही प्रयोग हमारे भावों और विचारों को पूर्ण रूप से प्रेषित करने में समर्थ होता है। संस्कृत में एक स्थान कहा गया एकः शब्दः सम्यकुज्ञातः सुप्रयुक्तः स्वर्गे लोके च कामधुग् भवति। यानी यदि एक शब्द भली प्रकार जानकर सही ढंग से प्रयोग किया जाय तो स्वर्गलोक में कामधेनु (सभी इच्छाओं को पूरा करने वाली) की तरह प्रभावशाली होता है। भाषा की अपरिहार्य महत्ता को समझकर ही हमारे वेद वाक् की वन्दना करते हैं। हमारे चिन्तक यह मानते हैं कि यदि भाषा नहीं होती तो यह संसार अंधकारमय ही रह जाता; भाषा के विस्तार से ही संसार का विस्तार होता है
वाचामेव प्रसादेन लोकयात्रा प्रवर्तते ।
इदमन्धतमः कृत्स्नं जायते भुवनत्रयम्,
यदि शब्दावड्यज्योतिरासंसारं न दीप्यते ।। काव्यादर्श (दण्डी) 1/41
कुछ क्षण के लिए भाषाविहीन समाज की परिकल्पना कीजिए, आपकी सारी गतिशीलता तुरन्त बाधित हो जाएगी, आप अपनी अनुभूतियों को अभिव्यक्त करने में असमर्थ हो जाएंगे। एक छटपटाहट, एक घुटन, एक विवशता आप पर हावी होती जाएगी और आपकी स्थिति उस गूँगे की तरह हो जाएगी, जो गुड खाता है पर उसकी मिठास को बाँट नहीं सकता। इसीलिए हमारा सारा वैदिक वाङ्मय भाषा के महत्व को स्वीकार करता है। ऋग्वेद में प्रार्थना की गई है कि हे इन्द्र ! तू हमें अन्न दे, बल दे, सत्य दे और मननशक्ति से सम्पन्न वाणी दे। वेदों में ऋषि ऐसी वाणी को प्राप्त करने की कामना करते हैं जो मननशक्ति और विद्या से सम्पन्न हो, जिसमें सबको प्रकाश देने वाली सूर्य की सी दृष्टि हो, वायु सी प्राणदायिनी शक्ति हो, अन्तरिक्ष से कान हों और सब कुछ आत्मसात करने में समर्थ पृथ्वी सा शरीर हो।
सूर्याच्चक्षुरन्तरिक्षत्छ्रोत्रं पृथिव्याः शरीरम् ।
सरस्वत्यावाचमुप ह्वयामहे मनोयुजा- अथर्ववेद, 5/10/8
'न्यू टेस्टामेन्ट' में भी कहा गया है In the beginning was the word and the word was with God, and the word was God. यह माना जा सकता है कि सारे विश्व में भाषा की शक्ति के विषय में विचार किया गया है। हमारा काव्यशास्त्र, व्याकरण, दर्शन यदि भाषा के वैशिष्ट्य पर विचार करता रहा है तो पश्चिम में रूसी रूपवाद, संरचनावाद, शैलीविज्ञान, नई समीक्षा उत्तर आधुनिक समीक्षा दृष्टियाँ भी इस पर विचार करती आई हैं। पश्चिमी चिन्तक रोमन याकोब्सन भाषा के घटक और उसके प्रकार्य के विषय में जो अभिमत प्रस्तुत करते हैं, वह इस बात का प्रमाण है। उनके अनुसार भाषा के छः घटक और उसके छः प्रकार्य हैं
वक्ता श्रोता संदर्भ संदेश सम्पर्क संहिता
(भाषा के घटक)
वक्ता सम्पर्क स्थापक माध्यम अर्थात् भाषा द्वारा सन्दर्भयुक्त संदेश जिसके पीछे एक संहिता होती है- भेजता है और श्रोता उस संदेश को ग्रहण करता है। सन्देश भेजने में वक्ता के मनस्तत्व का भी योगदान रहता है, श्रोता के प्रति उसके रुख की भी प्रतीति होती है। उसका उद्देश्य संदेश द्वारा श्रोता का ध्यानाकर्षण करना होता है। (Linguistics and Poetics, P 299-300)
अज्ञेय लिखते हैं - 'भाषा की शक्ति वह नहीं कि उसके सहारे सम्प्रेषण होता है। शक्ति इसमें है कि उसके सहारे, पहचान का सम्बन्ध बनता है, जिसमें सम्प्रेषण सार्थक होता है। आपके शब्द और आपका व्यवहार आपके विषय में दूसरों के मन में एक अवधारणा बनाते हैं कि आप किस प्रकार के व्यक्ति हैं, सकारात्मक सोच वाले हैं, नकारात्मक सोच वाले हैं या निर्णयात्मक व्यक्तित्व वाले हैं। विद्वानों का कहना है कि आपके व्यवहार के तीन पक्ष हैं- 1. सहिष्णु (यहाँ दब्बू के अर्थ में इस शब्द हो लें) (Submissive behaviour) 2. आक्रामक (Aggressive behaviour ) और 3. निश्चयात्मक (Assertive behaviour)। प्रभावशाली संचार के लिए आपका निश्चयात्मक होना बहुत आवश्यक है। यदि आप दब्बू हैं तो अपने विचारों और अनुभूतियों को सम्यक् रूपेण प्रेषित नहीं कर सकेंगे; यदि आक्रामक हैं तो आपकी अभिव्यति दूसरे को चोट पहुँचाएगी और यदि आप विश्वास के साथ, दूसरों को चोट पहुँचाए बिना अपने विचारों, अनुभूतियों और विश्वासों को प्रेषित करते हैं, तो आपका संचार सर्वाधिक सफल है। हम कह सकते हैं कि अपने आप को अभिव्यक्त करने के लिए सहिष्णुता और आक्रामकता का सन्तुलन बनाते हुए अपनी बात कहनी चाहिए।
The Essence of Effective Communication, Adrien Buckley, और इसके लिए शब्दचयन में सावधानी रखना जरूरी है। संस्कृत में एक श्लोक है -
दूरात शोभते मूर्खः लम्ब शाटपटावृतः ।
निर्गन्धा इव किंशुकाः यावत्किंचिन्नभाषते ।। -
रेशमी वस्त्रों से सुसज्जित मूर्ख व्यक्ति दूर से ही तब तक सुशोभित होता है, जब तक कुछ बोलता नहीं है। वह किंशुक के फूलो के समान है, जो देखने में बहुत सुन्दर हैं, पर जिनमें गन्ध नहीं है।
जनसंचार और भाषा :-
जनसंचार में एक या एकाधिक व्यक्तियों द्वारा या किसी माध्यम द्वारा किसी सन्दर्भ में संदेश प्रेषित किया जाता है और श्रोता उस संदेश को ग्रहण करता है, उससे प्रभावित होता है और अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करता है। जनसंचार के लिए माध्यमों की भूमिका अपरिहार्य है। जनसंचार और उसके माध्यम एक के बिना अधूरे हैं, अपर्याप्त हैं जनसंचार और उसके वाहक माध्यम में अंगांगिभाव है। हम समाचार पत्र पढ़ते हैं, रेडियो सुनते हैं, दूरदर्शन देखते हैं कम्प्यूटर में अपने भाव और विचार, अपने लेख टाइप करते हैं, अपनी कलात्मकता को आकार देते हैं, ई-मेल द्वारा अपने संदेश भेजते हैं, ब्लॉग द्वारा अपने विचारों को परस्पर बाँटते हैं, ट्विटर, फेसबुक द्वारा अपने विचारों को पूरे विश्व में पहुंचाते हैं यानी सन्देश को पाठकों, श्रोताओं और दर्शकों तक सम्प्रेषित करने के लिए विभिन्न स्रोत मौजूद हैं और इन माध्यमों की महत्ता के विषय में हम अच्छी तरह से परिचित हैं। यहाँ तक मार्शल मैक्लुहान का तो सूत्रवाक्य ही है कि 'माध्यम ही संदेश है'। फिर भी मुख्य तो संदेश ही है और संदेश और भाषा एक दूसरे के लिए अपरिहार्य हैं। हम यह भी कह सकते हैं कि संचार को व्यवस्था देने वाला पहला माध्यम भाषा ही है। प्रेस हो या मुद्रित शब्द, रेडियो हो या चलचित्र या दूरदर्शन जनसंचार का प्रत्येक माध्यम भाषा से जुड़ा है।
जनसंचार की भाषा के मुख्य दो रूप हैं- मुद्रित और श्रव्य मुद्रित भाषा के लिए साक्षर होना आवश्यक है श्रव्य के लिए नहीं। आपको यह तो ज्ञात ही है कि भाषा के मुद्रित रूप के विकसित होने के पहले से भाषा के श्रव्य रूप अस्तित्व है। हमारी वैदिक परम्परा श्रुत परम्परा ही है। सहस्रों पद, भजन- गेय परम्परा से ही संरक्षित हुए हैं। शब्द के अलावा ध्वनियों, संकेतों, अभिनयादि के द्वारा भी भाव समझ सकते हैं, मौन की भी एक भाषा होती है। पुस्तकों, सन्दर्भग्रन्थों, पत्रिकाओं, समाचारपत्रों में मुद्रित शब्द का ही सारा खेल है, तो आकाशवाणी, दूरदर्शन, आदि में भाषा का श्रव्य दृश्य रूप प्रयुक्त होता है। संक्षेप में जनसंचार के मुख्य घटक- समाचारपत्र, रेडियो, दूरदर्शन तथा चलचित्र भाषा के विविध रूपों का व्यवहार करते हैं। क्योंकि भाषा ही वह संचार व्यवस्था है जिसमें मानव के सारे क्रियाकलाप आ जाते हैं। भाषिक आचरण ने ही मनुष्य को मनुष्येतर प्राणियों से अलग प्रमाणित किया है। इसलिए संचार माध्यमों - चाहे वह प्रेस हो या इलैक्ट्रॉनिक माध्यम- उनके विकास की कल्पना भाषा के बिना नहीं की जा सकती है। जनसंचार माध्यमों के विकास के साथ साथ भाषा का विकास और भाषा के विकास के साथ संचार माध्यमों का विकास होता चलता है। भाषिक प्रयोगों में समय और संसाधनों के अनुरूप परिवर्तन होते जाते हैं। आज नये भाषिक प्रयोग, नई शैलियाँ, नये अर्थ भाषाकोश में जुड़ रहे हैं। द्विभाषिकता या बहुभाषिक ज्ञान की महत्ता अब अच्छी तरह समझ में आने लगी है। अनुवाद का तो महत्व इस बात से ही सिद्ध हो जाता है कि आज अनुवाद को एक विज्ञान के रूप में देखा जाता है। तकनीकी विकास ने 'यूनीकोड' द्वारा भाषा की अपरिहार्यता को सिद्ध किया है।
यहाँ भारत की भाषाओं और जनसंचार माध्यमों में प्रयुक्त हिन्दी का उल्लेख करना आवश्यक है। हमारे संविधान की आठवीं अनुसूची में असमी, बांग्ला, बोडो, डोगरी, गुजराती, हिन्दी, कन्नड़, कश्मीरी, कोकणी, मैथिली, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, सन्थाली, सिन्धी, तमिल, तेलगु, उर्दू आदि 22 भाषाएँ शामिल हैं हमारे बहुभाषी राष्ट्र में अनेक सरकारी और गैरसरकारी संस्थान भाषाओं के प्रचार-प्रसार में जुटे हैं। यहाँ एक सार्वदेशिक प्रचार भाषा के रूप में हिन्दी को प्रचारित प्रसारित किया जाता रहा है। हिन्दी के सन्दर्भ में बात करते हुए हमें यह भी ध्यान रखना है कि सभी भारतीय भाषाओं के समानान्तर अंग्रेजी भाषा का भी प्रचार-प्रसार भारत में निरन्तर हो रहा है।
किसी भी समाज में भाषा के विविध रूपों की एक सीमा होती है और इसका निर्धारण और नियन्त्रण समाज द्वारा होता है। भारत में औद्योगीकरण के प्रभाव से अंग्रेजी के प्रयोग का आधिक्य होने लगा है तो वैश्विक परिदृश्य में हिन्दी का भी प्रभाव बढ़ा है। हिन्दी के प्रयोग में आज अंग्रेजी के शब्दों का बाहुल्य है। हमारे भाषाविदों, चिन्तकों, विचारकों का एक वर्ग इस स्थिति से चिन्तित है तो दूसरा इसे स्वीकार करने की बात करता है। हम यहाँ भाषा विषयक विवाद में न पड़ते हुए जनसंचार माध्यमों में प्रयुक्त होने वाली भाषा की ही चर्चा करेंगे।
आज की दुनिया को विज्ञापनी दुनिया कहा जाता है। एक व्यवसाय के रूप में विज्ञापन आज अपनी गहरी पकड़ बना चुका है। वास्तव में विज्ञापनों ने जनसंचार माध्यमों का आश्रय लेकर पूरे विश्व को अपने प्रभाव में जकड़ा हुआ है। विज्ञापन की भाषा बनावटी होती है। क्योंकि विज्ञापनों में अतिरंजना द्वारा अपने उत्पाद को अधिकाधिक लोकप्रिय बनाने का प्रयत्न विज्ञापनदाताओं द्वारा किया जाता है। एक सक्षम और सफल विज्ञापन के लिए आकर्षक गुण, श्रवणीयता एवं सुपाठ्यता, स्मरणीयता तथा विक्रय की शक्ति का होना जरूरी है और इसके लिए शब्द की सामर्थ्य को पहचानकर उसकी प्रयुक्ति की जाती है। समाचारपत्र, रेडियो तथा दूरदर्शन के विज्ञापनों की भाषा अलग अलग होती है। समाचार पत्रों के विज्ञापनों की भाषा में स्थानीय उपभोक्ता की आवश्यकता के अनुसार सामाजिक या सांस्कृतिक सन्दर्भ होते हैं, रेडियो में श्रव्यता पर आधारित होने के कारण शब्द चयन और उच्चरण पर बल दिया जाता है और दूरदर्शन में दृश्य-श्रव्य दोनों का प्रयोग होने से शब्दों के उच्चारण के साथ साथ दृश्यों के प्रस्तुतीकरण की ओर ध्यान दिया जाता है। भाषायी लचीलापन, कोमलता, संक्षिप्तता तथा प्रभावोत्पादकता प्रचार माध्यमों के विज्ञापनों की भाषा का वैशिष्ट्य है।
समाचार पत्रपत्रिकाओं की भाषा विज्ञापनी भाषा से अलग होती है। भाषायी औजार किस तरह से जनमन को प्रभावित करते हैं, हिन्दी की स्वतन्त्रतापूर्व की पत्रकारिता पर नज़र डालते ही वह स्पष्ट हो जाता है। आज समाचार पत्रों की भाषा के वे तेवर तो नहीं हैं, अनेकशः भाषा का हिंग्लिशी प्रयोग हावी हाता जा रहा है, तब भी भाषिक प्रयोग पत्रपत्रिकाओं के तेवर व्यक्त करने में समर्थ हैं। रंगमंच की भाषा लिखित भाषा और बोली हुई भाषा के बीच की कड़ी कही जाती है। हिन्दी के सन्दर्भ में रंगमंच की भाषा का कोई मुहावरा या अंदाज नहीं बन पाया है। सिनेमा की भाषा ने भाषाई विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। सिनेमा की भाषा ने हिन्दी को देश देशान्तर में प्रसारित किया है।
रेडियो ने जनसंचार और भाषा के सन्दर्भ में अहम भूमिका निभाई है। रेडियो की प्रकृति मुद्रण माध्यमों तथा श्रव्य-दृश्य माध्यमों से अलग है। वहाँ वाक् ध्वनि प्रभाव तथा चुप्पी- ये तीन कारक मिलकर भाषा का निर्माण करते हैं। श्रोताओं का ध्यान आकर्षित करने के लिए वक्ता को सुर pitch) ताल (tempo) और स्वर (tone), में विविधता रखनी होती है। हिन्दी वार्ता, नाटक, एकांकी, रूपक, कविताएँ, अनुवाद, आँखों देखा हाल, कमेन्ट्री आदि के माध्यम से भाषा का प्रचार प्रसार बहुत बढ़ा है। हालाँकि दृश्य माध्यमों का विस्तार होने से श्रव्य माध्यम अब पीछे छूटने लगे हैं, पर भाषा के प्रचार प्रसार में आकाशवाणी के योगदान को नकारा नहीं जा सकता।
दूरदर्शन ने भाषा के प्रसार प्रचार को नए आयाम दिये हैं। मेकबोय का कहना है- दुनियाभर के टेलीविजन नेटवर्क देखते हुए मैं हमेशा महसूस करता हूँ कि टेलीविज़न में भाषा पक्ष ही सबसे ज्यादा हावी रहता है। भाषा का प्रयोग टेलीविज़न से भले किसी भी रूप में शब्द, वाक्य, ध्वनि में हो, टेलीविज़न की भाषा पर ध्वनि के साथ भाषा का जो असर देखा गया है, वही शायद इस मीडिया की सबसे बड़ी ताकत है। कम्प्यूटर, इन्टरनेट आदि ने भाषा की अपार सम्भावनाओं के दरवाजे खोल दिये हैं।
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