संचार प्रक्रिया - Communication Process
संचार प्रक्रिया - Communication Process
संचार एक व्यक्ति से दूसरे तक अर्थपूर्ण संदेश प्रेषित करने वाली प्रक्रिया है। यह प्रक्रिया जटिल और वैज्ञानिक है। यदि संचार सम्यक रूप से नहीं होता तो संदेश ठीक-ठीक रूप से श्रोता-वक्ता तक नहीं पहुँच सकता। वस्तुतः संचार प्रक्रिया में बाधा होने पर अनेक प्रकार की गलतफहमियां, क्रोध, नैराश्य, ईष्या, द्वेष आदि उत्पन्न हो जाते हैं। स्पष्ट है कि अभिव्यक्तिक नैपुण्य नैपुण्य किसी भी क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने की कुंजी है। Good communication skills are absolutely vital in any successful workplace. लिहाजा संचार संसाधनों का सशक्त होना बहुत जरूरी है। यदि संचार यदि संचार सुचारू रूप होगा तो श्रोता उसे ठीक से ग्रहण करेगा, उसका सम्यक उत्तर देगा एक उदाहरण से हम अपनी बात स्पष्ट कर सकते हैं। यदि किसी भी दिन बिजली नहीं आती है, तो हमारी बहुत सी गतिविधियां पड़ जाती हैं। हम मोबाइल, इन्टरनेट का प्रयोग नहीं कर सकते, रेडियो, टी.वी के कार्यक्रम नहीं देख सकते यहाँ तक कि पानी की सप्लाई बन्द हो जाती है और कुछ समय बाद हमें एक खालीपन लगने लग सम्प्रेषक और सम्प्रेष्य का आपसी तालमेल ठीक होगा, समय की बचत होगी और सूचनाएँ अधिकाधिक एकत्र होंगी। संचार सुचारू रूप से हो, इसके लिए सक्ता को अपने विचारों को स्पष्टतः तथा विस्तारपूर्वक अभिव्यक्त करना चाहिए ताकि वह श्रोता के समक्ष एक स्पष्ट चित्र खींच सके कहने का आशय यह है कि संचार प्रक्रिया अर्थ है एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक अर्थपूर्ण संदेश का सम्प्रेषण हमारे अनुभवों, विचारों, संदेश, दृष्टिकोण, मत, सूचना, ज्ञान आदि का परस्पर मौखिक, लिखित या सांकेतिक आदान-प्रदान संचार के अन्तर्गत आ जाता है। कोलंबिया इन्साइक्लोपीडिया ऑव कम्युनिकेशन में संचार के विषय में कहा गया है— The transfer of thoughts and message as contrasted with transportation of goods and persons' स्पष्टतः सम्प्रेषण की प्रक्रिया जटिल और वैज्ञानिक है। प्रेषक और प्रेष्य वक्ता और श्रोता में परस्पर तालमेल सम्प्रेषण के लिए अत्यावश्यक है। इसके लिए जरूरी है कि वक्ता का संदेश स्पष्ट हो, श्रोता उस संदेश को ग्रहण करने के लिए तत्पर हो, योग्य हो संदेश के माध्यम ठीक ठाक हों; और साथ साथ समय, परिस्थिति, स्थान सब अनुरूप हो। सम्प्रेषक का संदेश प्रभावशाली होने पर निश्चित रूप से श्रोता तक पहुंचेगा और संदेश तब प्रभावशाली होता है, जब वक्ता का उद्देश्य स्पष्ट हो, वह अपनी बात मन से कह रहा हो। स्वामी विवेकानन्द ने एक बार अपनी माँ से पूछा कि 'माँ! तू इतना स्वादिष्ट खाना कैसे बनाती हैं? जबकि तेरा खाना बनाने का तरीका, खाने में मिलाई गई सामग्री वही है जो अन्य लोग भी प्रयोग करते हैं। माँ ने उत्तर दिया बेटे में इस खाने में खाना बनाते समय सामग्रियों के अलावा मन भी मिलाती हूँ। वस्तुतः मन डालकर शब्दों को भी सार्थक और प्रभावशाली बनाया जा सकता है। सम्यक संचार के सन्दर्भ में हमारे भारतीय विनाकों ने प्राचीन समय से बहुत गंभीरता से विचार किया है। यह हम सब जानते हैं कि भाषा संचार का सबसे सशक्त माध्यम है। हमारा वैदिक साहित्य वाकू अर्थात् वाणी के विषय में विचार करते हुए यह मानता है कि वाकू तीन स्थानों हृदय सिर और कप्त पर बंधा है। आशय यह है कि भाषा केवल कण्ठ का व्यापार नहीं है. हृदय के रोग का प्रस्तोता भी है और बुद्धि का नियंत्रण भी इस पर है। इन तीनों के द्वारा निर्देशित भाषा ही सम्प्रेषण में सर्वाधिक सशक्त होती है। संस्कृत काव्यशास्त्रियों का मानना है कि कोई भी वाक्य तब ठीक ठीक सम्प्रेषण करने में समर्थ होता है जब उसने तीन विशेषताएँ होती हैं- आकांक्षा, योग्यता और सन्निधि जब वक्ता अपनी बात शुरू करता है तो पहले शब्द के उच्चारण के साथ ही श्रोता के मन में उत्सुकता होती है कि आगे क्या? वक्ता कहता है पुस्तकालय, श्रोता के मन में तुरंत जिज्ञासा होती है पुस्तकालय क्या? फिर वक्ता कहता है पुस्तकालय में मेरी इच्छित पुस्तक नहीं मिल रही।
एक उदाहरण से हम अपनी बात स्पष्ट कर सकते हैं। यदि किसी भी दिन बिजली नहीं आती है, तो हमारी बहुत सी गतिविधियां ठप पड़ जाती हैं। हम मोबाइल, इन्टरनेट का प्रयोग नहीं कर सकते, रेडियो, टी.वी के कार्यकम नहीं देख सकते यहाँ तक कि पानी की सप्लाई बन्द हो जाती है और कुछ समय बाद हमें एक खालीपन लगने लगता है।
श्रोता के मन में जागी जिज्ञासा वाक्य के नहीं मिल रही अंश तक बनी रहती है और वाक्य की समाप्ति पर ही यह जिज्ञासा शांत होती है। यह है आकांक्षा योग्यता से मतलब है कि वक्ता द्वारा बोले जाने वाले वाक्यों में एक पदार्थ का दूसरे से निर्वाध सम्बन्ध होना चाहिए। यह आग से खेत सींचता है इस वाक्य में आग और सींचना में परस्पर सम्बन्ध नहीं है, अतः यह वाक्य अभीष्ट अर्थ का सम्प्रेषण ठीक से नहीं करता। शब्दों में परस्पर समय आदि के व्यवधान के बिना होने वाला अविच्छिन्न प्रवाह सन्निधि है। उदाहरणतः यदि पहले दिन कहा जाय विश्वविद्यालय और दूसरे दिन कहा जाय जाना है, तो शब्दों में सन्निधि नहीं हो सकती एक गुरुजी ने अपने विद्यार्थी को समझाया कि बेटे जल्दी जल्दी नहीं बोलना चाहिए। धीरे धीरे सोच समझकर ही बोलना चाहिए। शिष्य ने उनकी आज्ञा का पालन करते हुए अगले दिन आकर कहा गुरुजी और चुप हो गया। कुछ देर बाद फिर से कहा- गुरुजी और फिर चुप हो गया। गुरुजी ने कहा आगे तो बोल, शिष्य ने फिर अटकते हुए कहा गुरुजी आपके घर में आग लग गई है जब तक वाक्य पूरा हुआ, गुरुजी का घर जलकर राख हो चुका था संचार का यह रुप स्वीकार्य नहीं है। पश्चिमी विचारक अरस्तू का कहना था कि किसी भी नाट्यप्रस्तुति में संगठनत्रय (Three Unities unity of time, action and place) का होना अत्यावश्यक है अन्यथा सम्प्रेषण में बाधा होगी। यह संगठनत्रय संचार के श्रेष्ठ रूप को ही व्यक्त करता है। यहाँ यह भी ध्यान देने योग्य है संदेश भेजने का लक्ष्य है संदेश ग्रहण करने वाले तक वक्ता का अभिप्राय अच्छी तरह पहुँच जाय और यह तभी सम्भव है जब वक्ता श्रोता में परस्पर तालमेल हो, वक्ता की कण्ठध्वनि, उसका अभिप्रेत, देश, काल, प्रस्ताव सभी में परस्पर सन्निधि हो। वक्ता क्या कह रहा है? क्या कहना चाहता है? उसकी कण्ठध्वनि कैसी है? किस स्थान पर वह अपनी बात कह रहा है? देश कौन सा है? समय क्या है? श्रोता की मनःस्थिति क्या है? उसका बौद्धिक स्तर क्या है? यह सब बातें सम्प्रेषणीयता को सफल या असफल बनाती है।
संचार की प्रक्रिया वैज्ञानिक भी है और जटिल भी संचार की एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक अर्थपूर्ण संदेश प्रेषित करना यह परिभाषा संचार के विषय में स्पष्ट और ठीक ठीक जानकारी नहीं दे सकती। यहाँ हम अमेरिकी विद्वान् पर्सिंग (Bobbye Sorrels Persing) की परिभाषा उदधृत करना चाहते हैं पसिंग का कहना है Human communication may be defind as the spiralling process of the transaction of meanings through symbolic action involving all elements associated with sending and receiving written, oral, and non-verbal messages. अर्थात् मानव संचार को प्रतीकात्मक क्रिया द्वारा अर्थों के कार्यव्यापार की सर्पिल या कुण्डलीदार प्रक्रिया द्वारा पारिभाषित कर सकते हैं। इसमें लिखित, मौखिक या शब्देतर संदेश भेजने और प्राप्त करने से जुड़े सभी तत्व शामिल है। परिंग की उस परिभाषा में आए निम्नांकित छः घटक मानव संचार के स्वरूप को वैज्ञानिक तरीके से स्पष्ट करते हैं-
1. सर्पिल प्रक्रिया (Spiralling Process)
2. कार्यव्यापार (Transaction)
3. अर्थ (Meaning)
4 प्रतीकात्मक क्रिया या व्यवहार Symbolic action)
5. संदेश प्रेषण तथा ग्रहण करने से जुड़े सभी तत्व (All elements associated with sending and recieving)
16. लिखित, मौखिक एवं शब्देतर संदेश (Written Oral and non-verbal messages)
पर्सिंग का मानना है कि संचार प्रक्रिया गत्यात्मक प्रकृति की है। इस प्रक्रिया में जो संदेश भेजा जाता है यह संदेश पाने वाले के पास सीध-सीधे नहीं पहुँचता अपितु घुमावदार तरीके से पहुंचता है। संदेश पहुंचने के बाद संदेश पाने वाले की प्रतिक्रिया होती है जिसे फीडबैक कहा जाता है, संचार की प्रक्रिया तभी पूरी होती है जब फीडबैक मिलता है। आपने देखा होगा कि यदि श्रोता वक्ता की ओर मुखातिब नहीं होता तो वक्ता का बात करने का सारा उत्साह खत्म हो जाता है और यदि श्रोता बात सुनने को उत्सुक होता है तो वक्ता का उत्साह बढ़ता है और वह और भी अच्छे तरीके से अपनी बात कहने का प्रयत्न करता है।
1. सर्पिल प्रक्रिया (Spiraling Process)
संचार की वास्तविक प्रक्रिया सर्पिल है। इस बात को हम ऐसे भी समझ सकते हैं यदि एक पत्थर तालाब में डाला जाय तो उसके चारों तरफ व्रत बनते हैं। व्रत पहले छोटा, फिर बड़ा फिर और बड़ा होता जाता है। इसी तरह संदेश वक्ता द्वारा अभिव्यक्त होता है और फिर पूरे परिवेश में फैलता जाता है। इस बात को हम इस रूप में प्रदर्शित कर सकते हैं
संदेश
पसिंग के अनुसार प्रेषक और प्रेष्य एक ही स्तर पर संचार किया आरम्भ नहीं करते संदेश का विकास अलग-अलग होता है। हमने पहले भी इस और इंगित किया है कि संदेश यदि व्यवधान रहित होगा तो अधिकाधिक सफल होगा कोई भी व्यवधान या हस्तक्षेप होने पर संचार में रुकावट आ सकती है।
पसिंग ने संचार प्रक्रिया के विषय में बताने के साथ-साथ संचार के विभिन्न स्तरों की भी चर्चा की है। उनके अनुसार मानव संचार के पाँच स्तर होते हैं
क. अन्तः वैयक्तिक (स्वगत) संचार (Intrapersonal Communication)
ख. अन्तरवैयक्तिक संचार (Inatarpersonal Communication )
ग. मध्य संचार (Medio Communication)
घ. व्यक्ति से समूह संचार (Person to Group Communication)
ङ. जनसंचार (Mass Communication)
(क) अन्तः वैयक्तिक संचार (Intrapersonal Communication ) - संचार की प्रक्रिया सबसे पहले हमारे अन्दर ही आरम्भ होती है जब हम किसी भी विषय में अपने आप से बातचीत करते हैं, किसी विषय में विचार करते हैं, यह अन्तःवैयक्तिक संचार है। पश्चिमी साहित्य शास्त्री क्रोचे का कहना है कि रचनाकार किसी दृश्य को देखता है, किसी घटना के बारे में सुनता है तो सबसे पहले उसके मन में उस घटना दृश्य आदि का एक बिम्ब बनता है, यह उसका सहजानुभूत ज्ञान है। इसके उपरांत वह उस बिम्ब को भाषा आदि माध्यमों से अभिव्यक्ति के लिए तैयार करता है। उनका कहना है कि प्रत्यक्षीकरण सहानुभूति है। वस्तुतः हम जब कोई कार्य करते हैं उदाहरणतः कुछ लिखते है तो जिस कमरे में हम लिख रहे हैं, जिस कलगी का प्रयोग कर रहे है, जिस कागज आदि पर लिख रहे हैं, जिन वस्तुओं को छू रहे हैं, जिन्हें हम अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बना रहे हैं, सब सहज अनुभूतियों है ये सहज अनुभूतियों श्रेष्ठ संचार के लिए भूमिका तैयार करती हैं।
आत्मविश्लेषण, आत्मनिर्णय आत्म प्रेरण के विकास के लिए अन्तः वैयक्तिक संचार अति आवश्यक है। अपने चिंतन अपने भाव अपने विचार को व्यवस्थित रूप में अपने हृदय में बिम्बित करने के उपरान्त ही उसका ठीक ठीक संचार हो सकता है। यह मानव संचार का प्रथम स्तर है। हमारे प्राचीन मनीषी आत्म साधना को बहुत महत्व देते रहे हैं। जन जिस 'सोऽहम्' का निरंतर जाप करने के लिए प्रेरित करते हैं, वह आत्मविश्लेषण ही तो है जिस सम्प्रेषण में आप स्वयं संदेश भेजने वाले हों और आप ही संदेश ग्रहण करने वाले, वह अन्तः वैयक्तिक संचार है।
मानव संचार के स्तर
(ख) अन्तर वैयक्तिक संचार (Interpersonal Communication )
जहाँ दो व्यक्ति या कुछ लोग परस्पर बातचीत कर रहे हो, गपशप कर रहे हों, संक्षिप्त समूह चर्चा कर रहे हो, किसी समिति की बैठक में विमर्श कर रहे हों यहाँ संचार का अन्तरवैयक्तिक रूप होता है। संचार के इस रूप में जरूरी है कि वे परस्पर विचार विमर्श करने वाले एक-दूसरे से परिचित हों, उनके अनुभवक्षेत्र समान हो, समान भाषाभाषी हो। जैसे किसी साहित्यकार का साक्षत्कार लेने के लिए यह जरूरी है कि साक्षात्कार लेने वाला उस साहित्यकार के विषय में पूरी पूरी जानकारी रखे साहित्यकार के साक्षात्कार के लिए यदि किसी ऐसे वैज्ञानिक को बैठा दिया जाय, जो साहित्य विषयक जानकारियों से अनभिज्ञ हो, तो यह साक्षात्कार सफल और प्रभावशाली नहीं हो सकेगा।
(ग) मध्य संचार (Medio Communication)
मध्य संचार तब होता जब दो या अधिक लोग अपने संदेश प्रेषित करने के लिए कुछ माध्यमों का प्रयोग करते हैं। इस माध्यम का प्रयोग प्रायः तब होता है, जब लोग आमने सामने नहीं होते। पुराने समय में मेघों को आधार बना कर जो संदेश भेजे जाते थे, वे तो काल्पनिक मध्य संचार के माध्यम थे, कबूतरों द्वारा संदेश भेजने की परम्परा बहुत प्रचलित रही है। आज किसी यान्त्रिक या इलैक्ट्रॉनिक माध्यम- डिवाइस का प्रयोग संदेश भेजने के लिए किया जाता है, वह मध्य संचार का विषय है। दूरभाष सेल्यूलर, क्लोज सर्किट टेलीविजन, मोबाइल रेडियो पेजर रडार, टेलेटाइप मूवी कैमरा, प्रोजेक्टर, ई-मेल, आदि मध्य संचार प्रेषित करने वाले संसाधन हैं।
(घ) व्यक्ति से समूह संचार (Person-to-group Communication) - जहाँ एक वक्ता हो और श्रोता समूह में हों वहाँ व्यक्ति से समूह संचार होता है। संचार के इस स्तर में वक्ता प्रायः सभा से मुखातिब होता है। माइक्रोफोन, टेपरिकार्डर, प्रोजेक्टर, कम्प्यूटर, आदि वे तकनीकी यंत्र हैं जो व्यक्ति से समूह संचार में प्रयुक्त होते है। रामचरितमानस में एक पंक्ति आती है वक्ता श्रोता ज्ञान निधि वक्ता अपने अनुभव संसार को श्रोताओं के समूह में अभिव्यक्त करके जो कुछ सम्प्रेषित करता है, उसका प्रभाव जन समूह के मन पर अक्षुण्ण होता है। किसी साधु संत-महात्मा के दिये गए सम्भाषणों के प्रभाव से तो आप भिज्ञ ही हैं, नेताओं द्वारा सभाओं में दिए गए भाषणों के प्रभाव के विषय में भी आप जानते हैं, यह सभी समूह संचार के रूप हैं।
(ङ) जन संचार (Mass Communication)
जनसंचार व्यक्ति से समूह संचार का अगला चरण है। जनसंचार में संदेश प्रेषण व्यापक जनसमूह के बीच होता है। उपग्रह प्रणाली के जरिए होने वाले संचार को प्रत्येक वर्ग, स्थान, देश, समाज के लोग ग्रहण कर सकते हैं। आपको ज्ञात होगा कि पुराने समय में सुबह-शाम प्रायः प्रत्येक शहर में एक खबर आकर समाचार सुनाता था। वह अपने साथ एक ढोल रखता था पहले ढोल बजाता था, फिर एक समाचार पढ़ता था, फिर ढोल बजाता था और दूसरा समाचार पढ़ता था। इस तरह वह जन समुदाय को अपना संदेश प्रेषित करता था। इसके माध्यम से प्रायः सभी सरकारी समाचार जनता तक प्रेषित किये जाते थे। अब यह कार्य लाउडस्पीकर, रेडियो, टेलीविजन आदि के द्वारा सम्पन्न होता है। मुद्रित, लिखित इलेक्ट्रॉनिक माध्यम जनसंचार के लिए महत्वपूर्ण उपकरण हैं।
संचार का दूसरा घटक कार्यव्यापार है -
2. कार्यव्यापार (Transaction) -
कार्यव्यापार संचार का बेहद महत्वपूर्ण उपकरण है। हमने देखा कि कोई भी अभिव्यक्ति फीडबैक की अपेक्षा करती है। यदि फीडबैंक न हो तो अभिव्यक्ति का कोई मूल्य नही होता किसी सभागार में किसी वक्ता के भाषण के दौरान यदि श्रोता उसे सुनने के लिए तत्पर नहीं हैं, या समझ नहीं पा रहे है या अपनी आँखों चेष्टाओं, हाव-भाव से यह नहीं दिखाते कि वह जो कुछ सुन रहे हैं, सीख रहे हैं, वह उन्हें समझ में आ रहा है तो ऐसे श्रोताओं और सभागार में रखी कुर्सी मेजो में कोई अन्तर नहीं रह जाता है। क्योंकि जैसे कुर्सी मेजों पर वक्ता के भाषण का कोई असर नहीं होता वैसे ही ऐसे श्रोताओं पर भी कोई असर नहीं होता और यह संचार एकतरफा और इसलिए निरर्थक भी हो जाता है। तुलसीदास ने भले ही लिखा हो कि उन्होंने रामचरितमानस को स्वान्तः सुखाय लिखा परन्तु हम जानते हैं कि उनकी कृति उनके ही नहीं बहुत से जिज्ञासुओं के लिए आज भी सुखद है। कहने का आशय यह है कि संचार दोतरफा व्यापार है। वक्ता संदेश देता है, श्रोता सुनता है। देना और सुनना दोनों ही समान रूप से महत्व रखते हैं। यह संदेश सार्थक होता है। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि संचार का कार्य अर्थोद्दीपन (stimulatind meanings) करना है। पर्सिंग संचार के तीसरे घटक के रूप में इसी दृष्टि से अर्थ की चर्चा करते हैं
3. अर्थ (Meaning)
वक्ता जैसे ही किसी शब्द का उच्चारण करता है, हम तुरन्त उसका अर्थ ग्रहण कर लेते हैं। वस्तुतः संचार के कार्यव्यापार से आशय है अर्थ का स्थानान्तरण तुलसीदास कहते हैं गिरा अरथ जल बीचि सम कहियत भिन्न न भिन्न- यानी शब्द और अर्थ पानी और पानी में उठने वाली लहर की तरह एक दूसे से जुड़े हुए हैं। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि हमारा मस्तिष्क अपने आसपास की वस्तुओं की व्याख्या करता है । इस व्याख्या को अर्थ कह सकते हैं। संचार का कार्य व्यापार वह अर्थप्रणाली ही है, जो समय, स्थान, काल, परिस्थिति परिवेश आदि के आधार पर निर्धारित होता है। हम रात शब्द का उच्चारण करते हैं। यह शब्द उच्चरित होने के साथ एक सामान्य अर्थ बताता है दिन की समाप्ति पर सुनने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए रात शब्द का अर्थ अलग अलग होता है। यदि किसी ने यह तय किया है कि रात हो घूमने जाना है, तो रात का अर्थ है घूमने जाने का समय हो गया। किसी को अविलंब कहीं पहुंचना था तो रात का अर्थ है देर हो गई। किसी को अपना काम पूरा करना है, तो रात का अर्थ बहुत थकान हो गई भी हो सकता है और अब रात है, काम जल्दी से पूरा हो जाएगा भी हो सकता है। मतलब यह कि अर्थ हमारे मस्तिष्क में रहते हैं और हम प्रसंगानुसार विषयों की वस्तुओं की अनोखी व्याख्याएँ करते रहते हैं। स्पष्ट है कि अर्थ की प्रकृति गत्यात्मक है। हम पाते है कि बहुत सारे शब्द जो पहले किसी और अर्थ में प्रयुक्त होते थे, आज दूसरे अर्थ में प्रयुक्त होने लगे हैं। उदाहरण स्वरूप हम रेडियो जौकी शब्द का उल्लेख कर सकते हैं। जौकी (Jockey) शब्द घुड़दौड़ के सवार के रूप में प्रयोग होता है और रेडियो जौकी में यह शब्द निरन्तर जोक (गजाक) करने वाला के अर्थ में प्रयुक्त होने लगा है।
4. प्रतीकात्मक क्रिया (Symbolic action )
यह संचार का चौथा घटक है। भाषा की एक परिभाषा है Language is a system of signs यानी भाषा प्रतीकों की व्यवस्था है। प्रत्येक शब्द के लिए एक प्रतीक निर्धारित है। वस्तुतः संचार की वास्तविक प्रक्रिया प्रतीकात्मक क्रिया है। ये प्रतीक वाचिक, लिखित और संकेतात्मक हो सकते हैं। हम यह भी जान चुके हैं कि मनुष्य एक मस्तिष्क से दूसरे मस्तिष्क तक आसानी से अर्थ का सीधा स्थानान्तरण नहीं कर सकता। इस स्थानान्तरण के लिए वह प्रतीकों का सहारा लेता है। प्रतीकों के द्वारा वह अपनी बात अच्छी तरह से सम्प्रेषित कर सकता है। साहित्य प्रतीकों का समृद्धतम प्रयोग करने के कारण सम्प्रेषण की दृष्टि से सर्वोत्कृष्ट होता है। हम प्रकृति के विभिन्न उपादानों से प्रभावित होते हैं, उनका वर्णन करते हैं जैसे- देखो, शाम कितनी अच्छी लग रही है। सूर्य पश्चिम दिशा में है। आकाश उसकी लालिमा से लाल हो गया है। यही बात कवि कहता है इस रूप में दिवस का अवसान समीप था, गगन था कुछ लोहित हो चला तरू शिखा पर अवराजती कमलिनी कुल बल्लभ की प्रभा (प्रियप्रवास, हरिओ) तो यही वर्णन कितना सार्थक हो जाता है, कितना सम्प्रेषणीय बन जाता है। वक्ता की वक्तृता भी इस बात पर निर्भर करती है कि वह अपने संदेश को कितने अच्छे तरीके से कह सकता है। प्रतीक अभिव्यक्ति की कला के लिए आवश्यक उपादान है।
5. संचार में प्रेषण तथा ग्रहण (Sending and recieving) - यह पहले ही स्पष्ट हो चुका है कि संदेश भेजना और ग्रहण करना- ये दोनों कार्य संचार के लिए आवश्यक हैं। संदेश भेजने के साथ संचार की प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती, संदेश पाने वाला संदेश ग्रहण करके उस पर अपनी प्रतिक्रिया करता है, तभी यह प्रक्रिया पूरी हो पाती है। विद्वानों ने संचार के जो निर्देश दिये हैं, उनमें से कोडिंग, डीकोडिंग के माध्यम से इस स्थिति को समझाते हैं।
6. लिखित, मौखिक एवं शब्देतर संदेश (Written, Oral and non verbal messages)
संचार का छठे घटक में सभी प्रकार के लिखित, मौखिक या संकेतात्मक संदेश आ जाते हैं। संदेश भेजने वाला पहले एक मानसिक प्रतीक निर्मित करता है, तदुपरान्त उन मानसिक प्रतीकों को बाह्य संदेश प्रतीकों के रूप में परिवर्तित करके प्राप्तकर्ता तक भेजता है। प्राप्तकर्ता का सजग मस्तिष्क इन बाह्य प्रतीकों को ग्रहण करता है और फिर उसका मानसिक प्रतीक निर्मित हो जाता है। इस तरह संदेश भेजने और ग्रहण करने की स्थिति से वक्ता का अभिप्रेत श्रोता तक पहुँच जाता है। संक्षेप में कहा जा सकता है कि
• संचार का अर्थ है अपने भाव, विचार, संदेश, ज्ञान, सूचना को दूसरों तक पहुंचाना
• अपने अनुभवों का परस्पर आदान-प्रदान करना
• संचार की प्रक्रिया सर्पिल है। इसमें संदेश पाने वाले की प्रतिक्रिया आवश्यक है।
• संचार प्रक्रिया केवल शब्दों के आदान प्रदान से सम्भव नहीं है। शब्दों के साथ वक्ता श्रोता के हाव-भाव, अंग संचालन आदि भी संचार प्रक्रिया में सहायक होते हैं।
मानव संचार के पाँच स्तर हैं- अन्तः वैयक्तिक अन्तरवैयक्तिक, मध्यसंचार, व्यक्ति से समूह संचार और जन संचार।
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