सामाजिक आन्दोलन रिपोर्टिंग की अवधारणा एवं कार्य पद्धति - Concept and Methodology of Social Movement Reporting
सामाजिक आन्दोलन रिपोर्टिंग की अवधारणा एवं कार्य पद्धति - Concept and Methodology of Social Movement Reporting
भारत में पत्रकारिता के विकास की प्रक्रिया राष्ट्रीय भावना एवं विविध सामाजिक आन्दोलनों की विकास के समानान्तर और पूरक रही है। प्रेस ही तब एक महत्वपूर्ण साधन था जो जनता को शिक्षित करने एवं राष्ट्रीयता के प्रसार का सशक्त माध्यम बन सकता था और निश्चित ही भारत के राष्ट्रीय आन्दोलनों से जन मानस को जोड़ने का प्रयास सर्वप्रथम समाचार पत्रों के माध्यम से ही हुआ।
परन्तु यहाँ पर यह भी महत्वपूर्ण है कि किसी भी सामाजिक आन्दोलन को अलग अलग समाचार पत्र पत्रिकाएं अपने अपने चश्में से देखती हैं। उस घटना के प्रति उस पत्र पत्रिका के रिपोर्टर का का दृष्टिकोण एवं अन्ततः उसके सम्पादक का दृष्टिकोण निर्णायक तत्व बनता है। फिर भी यह तत्थ्य नजरअंदाज नहीं करना चाहिए कि रिपोर्टर ही पत्र पत्रिका / चैनल / वैबसाइट / रेडियो के लिये आँख, नाक, कान, हाथ और पैर है। डेस्क पर बैठा आदमी लाख प्रयास कर ले, घटना स्थल के माहौल, दृश्य या आवाज को न तो महसूस कर सकता है, न ही कॉपी में पैदा कर सकता है। इसलिये रिपोर्टर का दायित्व है कि वह घटना के सभी पहलुओं को जानने समझने एवं उसे कैमरे में कैद करने की कोशिश करे, जिससे खबर की वस्तुनिष्ठता बनी रहे। उदाहरण के तौर पर किसी आन्दोलन में कहीं जनता और पुलिस के बीच संघर्ष होता है, पुलिस जनता पर लाठियां भांजती है और फिर जनता पुलिस पर पत्थर बरसाती है तो रिपोर्टर को चाहिए कि वह दोनों तरफ के दृश्य अपने कैमरे में कैद करे। पुलिस पक्ष के किसी आदमी से इन्टरव्यू ले कि उसने लाठीचार्ज क्यों किया, और जनपक्ष के नेता का भी इन्टरव्यू ले कि आंखिर जनता इतनी उद्वेलित क्यों हुयी ? फिर दोनों तरफ के तथ्यों को ध्यान में रख अपनी रिर्पोट प्रस्तुत करे -
• सामाजिक आन्दोलनों की रिपोर्टिंग हेतु रिपोर्टर को भरसक प्रयास करना चाहिए कि वह घटना स्थल पर जरूर मौजूद रहे।
• उसे शासन और जनता के बीच संघर्ष की स्थिति में दोनों पक्षों का दृष्टिकोण जानना चाहिए और दोनों तरफ के तत्थ्य इकट्ठे करने चाहिए तथ्य लिखित रूप में, मौखिक इन्टरव्यू के रूप में, घटना के फोटोग्राफ्स के रूप में या ऑडियो वीडियो रिकार्डिंग के रूप में एकत्र किए जा सकते हैं । इससे खबर की वस्तुनिष्ठता बनी रहती है।
• यदि रिपोर्टर घटना स्थल पर न जा सके तो उसे चाहिए कि वह विभिन्न माध्यमों से प्राप्त सूचनाओं की प्रमाणिकता की उचित जांचपरख करके ही अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत करे ।
• प्रायः सामाजिक आन्दोलन एकाएक उत्पन्न नहीं होते। वे एक दो लोगों से आरम्भ होकर सैकड़ों, हजारों लाखों लोगों की भागीदारी के गवाह बनते हैं। अतः किसी भी आन्दोलन की रिपोर्टिंग के समय रिपोर्टर को चाहिए कि वह उस आन्दोलन की पृष्ठभूमि भी जानने का भरसक प्रयास करे।
सामाजिक आन्दोलनों की रिपोर्टिंग हेतु कुछ सावधानियां भी जरूरी हैं। एक लोकतांत्रिक देश में लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करना, उन्हें बढ़ावा देना भी एक पत्रकार का कर्तव्य होना चाहिए। उदाहरण के तौर पर अगड़ी - पिछड़ी जातियों या विभिन्न धार्मिक मान्यताओं वालें लोगों के बीच होने वाले विवादों या इस तरह की अन्य संवेदनशील घटनाओं की रिपोर्टिंग के समय पत्रकारों को बहुत संयम से काम लेना चाहिए इसके लिए पत्रकार का जातीय, भाषायी, धार्मिक, क्षेत्रीय या अन्य पूर्वाग्रहों से मुक्त होना जरूरी है।
जिस तरह से तत्थ्य इतिहासकार के लिए कच्चा माल हैं, वैसे ही किसी भी आन्दोलन के समय हुयी घटनाएं एवं तत्थ्य रिपोर्टर के लिए कच्चा माल होते हैं। जब एक पत्रकार किसी घटना या आन्दोलन से सम्बन्धित तत्थ्य इकट्ठा करता है तो तत्थ्यों के चुनाव में उसका अपना दृष्टिकोण काम आता है। फिर वह उन्हें अपनी समझ या अपने दृष्टिकोण के आधार पर समाज के सामने पेश करता है।
◆ इस तरह रिपोर्टर हर रोज इतिहास लिखता है या पेश करता है । अतः सामाजिक आन्दोलन की सही रिपोर्टिंग के लिए जरूरी है कि अधिक से अधिक तत्थ्य इकट्ठे किये जांय।
◆ इन तत्थ्यों में से जिन तत्थ्यों का रिपोर्टिंग के लिए इस्तेमाल किया जाए, समाज पर उनका कैसा और क्या प्रभाव पड़ेगा ? इसका पहले ही आंकलन कर लिया जाना चाहए। सभी तत्थ्यों की व्याख्या लोकतांत्रिक मूल्यों और जनपक्षीय दृष्टिकोण के आलोक में की जानी चाहिये।
ऐसी रिपोर्टो का शीर्षक छोटा होना चाहिए और ऐसा होना चाहिए कि उससे की कहानी की आत्मा प्रकट होती हो । उदाहरण के तौर पर 1918 की एक घटना है। ब्रिटिश उत्तराखण्ड में डिप्टी कमिश्नर लोमस एक महिला के साथ अल्मोड़ा के स्याही देवी जंगल में शिकार खेलने के लिए गये, जहाँ शराब देर से लाने पर उन्होंने एक कुली को गोली मारकर घायल कर दिया। तत्कालीन प्रमुख समाचार पत्र "अल्मोड़ा अखबार ने इस घटना का कड़ा विरोध किया। फलतः 1871 से प्रकाशित "अल्मोड़ा अखबार" को सरकार का कोप भाजन बनना पड़ा और उसका प्रकाशन बन्द करना पड़ा। गढ़वाल से प्रकाशित पत्र “पुरुषार्थ" ने जिस शीर्षक से इस घटना को व्यक्त किया वह सरल और आकर्षक तो था ही साथ ही वह पूरी कहानी को भी कह जाता था। वह शीर्षक था - "एक फायर के तीन शिकार - कुली, मुर्गी और अल्मोड़ा अखबार"।
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