अनुच्छेद 32 और 226 के संवैधानिक प्रावधान - Constitutional Provisions of Article 32 and 226
संवैधानिक प्रावधान Constitutional Provision
संविधान के अनुच्छेद 32 और 226 के द्वारा प्रत्येक नागरिक को यह अधिकार प्राप्त है कि वह जहां भी कहीं मूल अधिकारों का उल्लंघन होते देखें तो वह सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालयों में न्याय की गुहार कर सकता है। सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की जा सकती है। अनुच्छेद 32 (2) में बताया गया है कि संविधान के भाग III में प्रदान किए गए किसी भी अधिकार को लागू करने के अनुच्छेद 32(1) में मूल अधिकारों को लागू करने के लिए उपयुक्त प्रक्रिया अपना कर लिए सर्वोच्च न्यायालय को उपयुक्त निर्देश देने आदेश देने या रिट जारी करने, जिनमें बन्दी प्रत्यक्षीकरण, परमाधिदेश निषेध अधिकार पृच्छ और उत्प्रेषण लेख जैसी रिट शामिल हैं, का अधिकार है।
अनुच्छेद 226 में कहा गया है कि अनुच्छेद 32 में दी गई किसी भी व्यवस्था के होते हुए भी प्रत्येक उच्च न्यायालय को अपने क्षेत्राधिकार में आने वाले सभी क्षेत्रों में भाग III में दिए गए किसी अधिकार (मूल अधिकार) को लागू करने के लिए किसी भी व्यक्ति या प्राधिकरण को उपयुक्त निर्देश देने आदेश देने या रिट जारी करने, जिनमें बन्दी प्रत्यक्षीकरण परमाधिदेश निषेध अधिकार पृच्छा और उत्प्रेक्षा लेख जैसी रिट शामिल हैं, का अधिकार रखता है।
संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 32 के अर्थ और प्रसार क्षेत्र की कमजोरी वर्गों के हक में व्यापक व्याख्या दी गई है। "जीवन जीने के के अधिकार की व्याख्या का अर्थ जीवन यापन के अधिकार से भी हैं। इसी प्रकार अनुच्छेद 14 के तहत गारंटीशुदा समानता के अधिकार की व्याख्या के अन्तर्गत निर्णय लेने में कार्यकारी और प्रशासनिक अधिकारियों की स्वेच्छाचारीता के विरुद्ध अधिकार प्रदान किया गया है।
वैध स्थिति की नई व्याख्या वैध स्थिति की नई व्याख्या के मुताबिक, जब किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के एक वर्ग के अधिकारों का उल्लंघन होता है, और गरीबी या अशक्तता के कारण वे स्वयं अदालत नहीं जा पाते तो कोई भी सामाजिक भावना रखने वाला व्यक्ति या संगठन, बदले की भावना से नहीं, बल्कि मलाई की भावना से न्यायिक राहत प्राप्त करने के लिए अदालत जा सकता है।
एस० पी० गुप्ता Vs भारत गणतंत्र (AIR 1982 SC 149) मामले में सात जजों की संविधान बैंच ने बहुमत से यह फैसला दिया कि अगर जनता का कोई व्यक्ति सच्चे मन से और जनता के साथ दुर्व्यवहार या चोट पहुंचाने पर उसके लिए सुधारात्मक कदम उठाने और क्षतिपूर्ति कराने में दिलचस्पी रखता है, और मात्र व्यस्त संस्था या हस्तक्षेप की नीयत से काम नहीं कर रहा, तो वह मामले को अदालत में ले जा सकता है। अगर कोई एक व्यक्ति या व्यक्तियों के एक वर्ग को कानूनी दुर्व्यवहार के कारण मुसीबत का सामना करना पड़ता है और वे गरीबी, बेसहारा या सामाजिक पिछड़ेपन के कारण अदालत नहीं जा सकते तो अगर कोई अन्य व्यक्ति उनकी तरफ से याचिका दायर करता है, तो अदालत नियमबद्ध प्रक्रिया अपनाने की मांग नहीं करेगी।
जजों के स्थानांतरण के मामले में [AIR 1982 SC 149 and (1994)4 Sec .305] सर्वोच्च न्यायालय ने यह व्यवस्था दी है कि जनता का कोई व्यक्ति अगर "पर्याप्त रुचि रखता है तो वह अन्य व्यक्तियों की सामान्य परेशानियों, मुसीबतों को दूर करने और उन्हें संवैधानिक या कानूनी प्राधिकार दिलाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है।
जब संवैधानिक या कानूनी अधिकार के उल्लंघन के कारण किसी एक व्यक्ति या व्यक्तियों के एक विशिष्ट वर्ग के साथ गलत काम होता है या उसको कानूनी तरीके से चोट पहुंचाई जाती है, और वह व्यक्ति गरीबी, बेसहारा या विकलांगता या सामाजिक या आर्थिक रूप से असमर्थता की स्थिति होने के कारण राहत पाने के लिए अदालत में गुहार नहीं कर सकता / सकते, तो जनता में से कोई भी व्यक्ति उपयुक्त निर्देश या आदेश प्राप्त करने या रिट के लिए याचिका दायर कर सकता है।

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