समसामयिक पत्रकारिता औऱ राजनैतिक पत्रकारिता - Contemporary Journalism or Political Journalism
समसामयिक पत्रकारिता औऱ राजनैतिक पत्रकारिता - Contemporary Journalism or Political Journalism
समसामयिक पत्रकारिता - Contemporary Journalism
पत्रकारिता का यह सबसे विशद क्षेत्र है। समसामयिक अर्थात् जो वर्तमान में हो रहा है, उस पर नजर उसकी खबर यही समसामयिक पत्रकारिता है। अपने आस-पास घट रही हर घटना, चाहे वह कितनी ही छोटी क्यों न हो, उसका पूरा विवरण, उसका पूरा विश्लेषण समसामयिक पत्रकारिता का हिस्सा है। आज के दौर में इसमें भी अनेक बदलाव आ रहे हैं और इसका अंदाज, प्रस्तुति तथा तेवर सभी कुछ बदल रहे हैं। एक उदाहरण से इसे समझा जा सकता है।
22 मई 2010 को मंगलोर हवाई अड्डे पर एयर इण्डिया के विमान की भीषण दुर्घटना हुई। इसका समाचार जब टीवी और अखबारों में आया तो वह इस दुर्घटना का समाचार भर ही नहीं था। भारत में हवाई दुर्घटनाओं का इतिहास, भारत में विमान दुर्घटनाओं की वजह, हवाई अड्डों का हाल, दुर्घटनाओं की जांच के तौर-तरीके, उपकरणों का विवरण दुर्घटना में हताहत लोगों का हाल, उनके परिजनों की संवेदनाएं, दुर्घटना का तात्कालिक व दीर्घकालिक प्रभाव आदि तमाम विषयों से जुड़ी जानकारियां भी इस समाचार के साथ थीं। बीस-पच्चीस साल पहले के समाचार पत्रों की फाइलें देखें तो ऐसी ही किसी विमान दुर्घटना की खबर में जानकारियों, सूचनाओं और भावनाओं का इतना विस्तार देखने को नहीं मिलता। यानी आज समसामयिक पत्रकारिता का दायरा और दायित्व काफी विस्तृत हो गया है।
इसी उदाहरण को उत्तराखण्ड में आए दिन होने वाली सड़क दुर्घटनाओं के कवरेज में प्रयोग किया जा सकता है। मसलन किसी सड़क दुर्घटना के तकनीकी पहलू, इतिहास और माननीय पहलू इन सब पर पत्रकार की समग्र नजर उसके समाचार को अधिक पठनीय और अधिक उपयोगी बना सकती है। समसामयिक पत्रकारिता, पत्रकारिता का सबसे महत्वपूर्ण विषय है तो यह पत्रकारिता की प्राथमिक पाठशाला भी है। पत्रकार इस क्षेत्र में जितनी महारत हासिल करेगा उसकी नीवं उतनी ही मजबूत हो जाएगी, नगर क्षेत्र हो या ग्रामीण क्षेत्र छोटी-छोटी जन समस्याओं को लेकर स्थानीय बड़े सवालों पर गहराई से नजर डालने वाला पत्रकार समसामयिक पत्रकारिता का महारथी बन सकता है।
राजनैतिक पत्रकारिता - Political Journalism
राजनीति एक ऐसा विषय है जिसनें पत्रकारिता को सबसे अधिक समृद्ध किया है चाहे वह अमेरिकी स्वाधीनता का युद्ध हो, यूरोप में विश्वयुद्धों का दौर हो अथवा भारत में आजादी की लड़ाई का युग हर जगह राजनैतिक पत्रकारिता निए-नए मानदण्ड स्थापित किये।
भारत में पत्रकारिता का दूसरा चरण आजादी के संघर्ष के दौर में शुरू हुआ। इस दौर ने भारत के नगरीय इलाकों से लेकर ग्रामीण अंचलों तक हर कहीं राजनैतिक पत्रकारिता को खुराक दी। देश की आजादी की ललक, आधुनिक भारतीय राजनीति के विकास से जुड़ी थी। आजादी का संग्राम भारतीय राजनीति का इतिहास भी है और भारत विभाजन की कथा भारतीय राजनीति की कथा भी है। राजनीति के इस दौर ने भारत में बीसवीं सदी की पत्रकारिता को सींचा, उसे विकसित किया और उसे एक उद्देश्य भी दिया। भारतीय स्वाधीनता संग्राम का हर छोटा-बड़ा योद्धा कहीं न कहीं पत्रकार भी था। गणेश शंकर विद्यार्थी से लेकर महात्मा गांधी तक, बद्री दत्त पाण्डे से लेकर भैरवदत्त धूलिया तक संग्रामी पत्रकारों या पत्रकार संग्रामियों की एक लम्बी सूची है।
उत्तराखण्ड के सन्दर्भ में देखें तो दो बड़ी घटनाएं राजनैतिक पत्रकारिता का अप्रतिम उदाहरण हैं :
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1. अल्मोड़ा अखबार प्रकरण
अल्मोड़ा अखबार उत्तराखण्ड का दूसरा सबसे पुराना अखबार था। इसका प्रकाशन 1871 में अल्मोड़ा से शुरू हुआ था। 1913 तक यह अखबार सरकारपरस्त बना रहा और अपनी सीमाओं में समाज को जागरूक करने का प्रयास करता रहा। 1913 के बाद इसके रूख में देश भर में फैल रहीं राष्ट्रीयता की भावनाओं के कारण बदलाव आया और 1871 में संयुक्त प्रान्त के गवर्नर की प्रेरणा से शुरू हुए इस अखबार के बागी तेवरों के चलते 1918 में ब्रिटिश सरकार ने इस पर सरकार विरोधी लेखों के कारण कई तरह के प्रतिबन्ध लगा दिये अल्मोड़ा अखबार के संचालकों ने प्रतिबन्ध स्वीकार कर लिए लेकिन सरकार के सामने झुकना मंजूर नहीं किया। इसी टीम के कुछ सदस्यों ने प्रतिबन्धों के कारण अल्मोड़ा अखबार के बन्द हो जाने पर अल्मोड़ा से ही 'शक्ति' नामक साप्ताहिक निकाला, जिसने उत्तराखण्ड की आजादी की लड़ाई में एक उत्प्रेरक के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
2. गढ़वाली प्रकरण
गढवाली मासिक पत्र का प्रकाशन 1905 में देहरादून से शुरू हुआ था। गिरिजा दत्त नेथाणी और तारादत्त गैरोला के बाद विश्वम्भर दत्त चन्दोला इसके सम्पादक बने। हालांकि इस अखबार का तत्कालीन टिहरी नरेश के प्रति श्रद्धा भाव था लेकिन 1930 में उत्तरकाशी के तिलाड़ी में वन अधिकारों की मांग कर रही जनता पर राजशाही ने जिस बर्बरता के साथ गोलाबारी की, 'गढ़वाली' ने उस पूरी घटना का पूरा विवरण छाप कर राजशाही के दमन की सारी पोल खोल दी। रियासत ने चन्दोला से खबर देने वाले संवाददाता का नाम बताने को कहा। मगर चन्दोला ने इन्कार कर दिया। रियासत ने उन पर मुकदमा चलाया। उन्हें दो साल की कैद सुना दी गई। चन्दोला ने जेल जाना मंजूर किया मगर पत्रकारिता के आर्दशों की रक्षा करते हुए खबर देने वाले स्रोत का खुलासा नहीं किया। भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में यह अपनी तरह का एक दुर्लभ उदाहरण है।
वर्तमान में राजनीति का रूप जिस तरह बदला है वैसे ही राजनैतिक पत्रकारिता का भी स्वरूप बदल रहा है। 'स्टिंग ऑपरेशन' जैसे नए तरीकों ने इसको नए आयाम दिए हैं। आज नेताओं के इर्द-गिर्द घूमने वाली खबरों का महत्व कम हो गया है मगर राजनैतिक पत्रकारिता का महत्व आज भी वैसा ही है जैसा पत्रकारिता के आरम्भिक दौर में था। आज राजनैतिक पत्रकारिता करने वाले पत्रकार को नेताओं के भाषणों वक्तव्यों के बजाय उनके कार्यों के विश्लेषण और जन भावनाओं की गहरी समझ विकसित करनी होती है। जमीनी जानकारी के साथ, विश्लेषण करने की क्षमता और संकेतों की समझ किसी भी पत्रकार को सफल राजनैतिक पत्रकार में बदल सकती है।
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