उत्तराखण्ड में पत्रकारिता का वर्तमान परिदृश्य - Current Scenario of Journalism in Uttarakhand
उत्तराखण्ड में पत्रकारिता का वर्तमान परिदृश्य - Current Scenario of Journalism in Uttarakhand
स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व प्रकाशित पत्रों में से कुछ ही समाचार पत्र 1947 के बाद प्रकाशन जारी रख सके क्योंकि स्वाधीनता पूर्व के अधिकांश पत्रों का जो उद्देश्य था वह हासिल हो चुका था। फिर भी ठीक 15 अगस्त 1947 को भगवती प्रसाद पांथरी, गोपेश्वर कोठियाल आदि ने देहरादून से "युगवाणी" का प्रकाशन आरम्भ किया यह पत्र मूलतः प्रजामंडल का पत्र था। इसका महत्व टिहरी रियासत के अंतिम दो सालों के आंदोलनों के संदर्भ में अधिक है। यह पत्र मासिक पत्रिका के रूप में आज भी निकल रहा और उत्तराखण्ड की अग्रणी पत्रिकाओं में से एक है।
इसी क्रम में 1947 - 1952 के बीच देहरादून से हिमाचल, देश सेवक, अंगारा तथा अल्मोड़ा कुमाऊँ राजपूत, रूपा, प्रदीप आदि पत्र पत्रिकाएं निकलीं। 1956 में कोटद्वार से ललिता प्रसाद नैथाणी ने "सत्यपथ" का प्रकाशन किया। इस पत्र ने स्थानीय विषयों को प्रमुखता से उठाने की कोशिश की इसी दौर में विष्णुदत्त उनियाल का नैनीताल से "पर्वतीय" नामक पत्र निकला। लम्बे समय तक जीवित रहे इस अखबार ने उत्तराखण्ड में नए दौर की पत्रकारिता को बहुत कुछ सिखाया। हिन्दी के कई नामी लेखकों और पत्रकारों के लिए यह अखबार एक पाठशाला की तरह था। 1957 में हीरालाल बड़ोला ने मुनि की रेती टिहरी गढ़वाल से तथा राधाकृष्ण कुकरेती ने देहरादून से क्रमशः “उत्तराखण्ड" और "नया जमाना" साप्ताहिक शुरू किये। पिथौरागढ़ से "उत्तराखण्ड ज्योति" साप्ताहिक पत्र 1961 में निकला तो उत्तराखण्ड की तराई (उधमसिंह नगर ) से बिगुल, चौराहा, लोकतंत्र आदि साप्ताहिक अखबार निकले। 1962 दौरान मसूरी से "सीमान्त प्रहरी, देहरादून से "जन लहर", ऋषिकेश से "हिमालय 1977 के की आवाज", उत्तरकाशी से "पर्वतवाणी,", "गढ़रैवार", पिथौरागढ़ से "पर्वत पीयूष" आदि पत्र निकलने प्रारम्भ हुए। 1955 में काशीपुर से प्रकाशित अखबार “जन जागृति" तथा कोटद्वार से 1965 में प्रकाशित "आवाज" वामपंथी प्रभाव वाले पत्र थे । 1974 में देहरादून से प्रकाशित "लपराल" नामक अखबार ने किसानों मजदूरों के दुःख दर्दों को समझने का प्रयास किया। इस दौर में साहित्यिक पत्र - पत्रिकाएं भी निकलीं। परन्तु अपना खास प्रभाव नहीं छोड़ पायीं । प्रतिनिधित्व के तौर पर अल्मोड़ा से "माद्री", "शिल्पी", टिहरी से "नैतिकी", पिथौरागढ़ से "पथिक" आदि का जिक्र किया जा सकता है।
आठवें दशक के बाद पूंजीवादी अखबार, पत्रिकाओं, रेडियो, दूरदर्शन और दर्जनों टीवी चैनलों ने धीरे - धीरे यहां की क्षेत्रीय पत्रकारिता की रीढ़ तोड़नी शुरू की। फिर भी अपने सीमित संसाधनों के बावजूद कुछ समाचार पत्र - पत्रिकाएं निरन्तर प्रकाशित होते हुए अपना पाठक वर्ग बनाए हुए हैं। ये हैं युगवाणी, पर्वतजन, नया जमाना, सीमान्त प्रहरी, मसूरी टाइम्स, आज का पहाड़, नैनीताल समाचार, आधारशिला, उत्तरा, पहाड़ आदि ।
परन्तु व्यावसायिक रूप से देखें तो उक्त में से अधिकांश पत्र पत्रिकाओं की हालत दयनीय है और एक सीमित पाठक वर्ग तक ही इनकी पहुंच है। यही हाल यहां की साहित्यिक - सांस्कृतिक पत्र पत्रिकाओं का भी है। अल्मोड़ा से - कुमाऊँनी भाषा में "पहरू" पत्रिका निकल रही है और पौड़ी से गढ़वाली में उत्तराखण्ड खबरसार पाक्षिक निकलता। गढ़वाल से गढ़वाली भाषा में एकाध और पत्रिकाएं भी निकल रही हैं, इन सभी की प्रसार संख्या कम है एवं संसाधन सीमित हैं।
वर्तमान में देखें तो अमर उजाला, दैनिक जागरण, दैनिक हिन्दुस्तान जैसे समाचार पत्रों को उत्तराखण्ड में सबसे ज्यादा पढ़ा जाता है। पूंजी, आकर्षक, साज सज्जा क्षेत्रीयकरण (क्षेत्रीय संस्करण), कुशल प्रबन्ध तन्त्र, सरकारी, प्रतिष्ठानों, संस्थानों एवं व्यक्तिगत विज्ञापनों के बल पर इनका दबदबा बना हुआ है। त्वरित संचार तंत्र, उन्नत तकनीक के माध्यम से सही समय पर यह समाचार पत्र लोगों को उपलब्ध हो जाते हैं और क्षेत्रीयकरण के कारण लोग अन्तर्राष्ट्रीय, राष्ट्रीय विषयों से लेकर अपने गाँव, शहर की सभी छोटी-मोटी सूचनाएं इन अखबारों में पढ़ सकते हैं। इसके अलावा गढ़वाल पोस्ट, उत्तर उजाला, दून दर्पण, जन लहर आदि छोटे स्थानीय दैनिक पत्र भी अपने अस्तित्व के संघर्ष में निरन्तर जुटे हुए हैं। उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद तो उत्तराखण्ड में नई पत्र पत्रिकाओं की बाढ़ ही आ गई है। सिर्फ देहरादून से ही प्रकाशित होने का दावा करने वाले दैनिक पत्रों की संख्या 45 से अधिक हो गई है। यही हाल वहां से प्रकाशित होने वाली पत्रिकाओं का भी है।
वार्तालाप में शामिल हों