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समाज कार्य शोध
सामाजिक ज्ञान प्राप्ति के लिए शोध विधियों का अनुप्रयोग ही समाज कार्य शोध है जिसकी आवश्यकता एक समाज कार्यकर्ता को समाज कार्य करते समय आने वाली समस्याओं का सामना करने के लिए होती है। समाज कार्य की विधियों और तकनीकों को समझने के लिए यह ज्ञान अत्यंत उपयोगी है। यह वह ज्ञान प्रस्तुत करता है जिस पर एक समाज कार्यकर्ता उन निर्णयों को लेने से पूर्व विचार कर सकता है जो उसके ग्राहकों, कार्यक्रमों अथवा संस्थाओं पर प्रभाव डाल सकती है जैसे- कार्यक्रम में परिवर्तन/रूपांतरण, वैकल्पिक तकनीकों का उपयोग आदि। सभी समाज कार्यकर्ताओं के लिए समाज कार्य शोध उनके व्यवहार में परिवर्तन अथवा रूपांतरण करने के लिए मार्ग प्रशस्त करता है। यह कोई संदेहास्पद तथ्य नहीं है कि समाज कार्य शोध के परिणामों द्वारा समाज कार्यकर्ता का मार्गदर्शन अधिक होता है। अतः समाजकार्य शोध उन्हीं मानवीय लक्ष्यों की आपूर्ति का प्रयत्न करता है जो समाज कार्य विधि के होते हैं।
समाज कार्य अनुसंधान का लक्ष्य
एक व्यावहारिक व्यवसाय के रूप में समाज कार्य को जाना जाता है। अतः समाज कार्य शोध का मुख्य लक्ष्य समाज कार्य व्यवहार अथवा उपचार की प्रभाविता से संबंधित प्रश्नों के उत्तरों की खोज करना है। दूसरों शब्दों में, इसके विषय में जानकारी प्रदान करने का प्रयास समाज कार्य शोध द्वारा किया जाता है कि समाज कार्य के लक्ष्यों के लिए कौन-से हस्तक्षेप अथवा उपचार वास्तव में सहायक अथवा अवरोधक हैं। इसके अलावा, यह समाज कार्यकर्ताओं द्वारा अपने कार्य को करने के दौरान आने वाली परेशा अथवा समस्याओं के निवारण तलाशने में भी सहायक होता है और साथ ही साथ यह समाज कार्य सिद्धांत और व्यवहार के लिए जानकारी के आधार निर्माण में भी सहायक होता है।
समाज कार्य शोध प्रक्रिया
समस्या की पहचान और लक्ष्यों को निर्धारित करने से समाज कार्य शोध आरंभ होता है। इसके बाद समस्याओं के मूल्यकन अथवा मूल्यांकन की आवश्यकता का चरण आता है। समस्या की पहचान हो जाने और आवश्यकताओं के मूल्यांकन के पश्चात, अगली प्रक्रिया उन लक्ष्यों का निर्धारण है जिन्हें प्राप्त किया जाना है। यहाँ ध्यान रखा जाता है कि लक्ष्य विशिष्ट, यथार्थ रूप से स्पष्ट किए गए और मापने योग्य होने चाहिए। इस प्रक्रिया में तीसरा चरण हस्तक्षेप से पहले मापन करने की प्रक्रिया है, हस्तक्षेप पूर्व मापन का प्रयोग उस आधार के रूप में किया जाता है जिससे सेवार्थी अथवा संबंधित की परिस्थिति की तुलना हस्तक्षेप को लागू करने के पश्चात की जाती है। प्रक्रिया में अगला चरण हस्तक्षेप को क्रियान्वित करना है। यहाँ यह उल्लेख करना महत्वपूर्ण है कि किसी भी हस्तक्षेप अवस्था के दौरान केवल एक संगत हस्तक्षेप किया जाना चाहिए। अंतिम चरण में, दो मापनों यानी हस्तक्षेप का उपयोग करना चाहिए और हस्तक्षेप के पश्चात के मापन की तुलना करके हस्तक्षेप के प्रभावों का मूल्यांकन किया जाता है।
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