विज्ञापन का आर्थिक व सामाजिक पक्ष - Economic and Social Aspect of Advertising
विज्ञापन का आर्थिक व सामाजिक पक्ष - Economic and Social Aspect of Advertising
विज्ञापन मूलतः एक प्रकार की प्रचार प्रक्रिया है। किसी भी प्रकार के दो प्रभाव हो सकते हैं। एक सकारात्मक और दूसरा नकारात्मक विज्ञापन के प्रभाव के दो प्रमुख पक्ष हैं। एक आर्थिक पक्ष और दूसरा सामजिक पक्ष ।
आर्थिक पक्ष :
सच तो यह है कि विज्ञापन आधारभूत रूप से आर्थिक क्रियाकलाप है। यह विज्ञापनदाता की बात कहता है, विज्ञापन देखने-सुनने या पढ़ने वालों के आर्थिक निश्चयों को प्रभावित करता है और इस रूप में अर्थ तंत्र का अभिन्न अंग है। इसलिए विज्ञापन के आर्थिक पक्ष की ओर पहले विचार विमर्श करना समीचीन होगा। इसमें खरीदार को सूचना प्रदान करने, नयी वस्तुओं के विकास में योगदान, प्रचार प्रसार माध्यमों की सहायता वितरण लागत पर प्रभाव, व्यापार का चक्र चालू रखना, वस्तु विशेष के ब्रांड नाम की लोकप्रियता तथा वस्तु की उपयोगिता का प्रसार आदि बातें आ जाती हैं।
मीडिया (समाचार पत्र पत्रिकाओं तथा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया) जीवन रक्त विज्ञापन ही है। लोकतंत्रीय राष्ट्रों के मीडिया इसी कारण आर्थिक दृष्टि से सुसम्पन्न होते हैं कि यहां पर अध्ययन के लिए यदि पत्रों को लिया जाय तो प्रायः पत्रों के विक्रय से प्राप्त धन और विज्ञापन की आय में 1 : 2 का अनुपात हो तो पत्र की आर्थिक स्थिति अच्छी मानी जाती है। प्रेस कमीशन की संस्तुति के अनुरूप पत्रों में पाठ्य सामग्री और विज्ञापन 60 : 40 का अनुपात होना चाहिए। भारतीय प्रेस आयोग ने कहा है कि विज्ञापनों की अधिकतम सीमा 40 प्रतिशत निर्धारित करने के लिए हमने केवल तत्कालीन प्रथा को ही दृष्टि में नहीं रखा है वरन् इस भावी मनोवृत्ति को भी ध्यान में रखा है जिससे हमें प्रतिपृष्ठ मूल्य निर्धारण होने पर उभरने की आशा है। हमें इस बात की आशा है कि जब समाचार पत्रों की पृष्ठ संख्या कम करने या प्रति का मूल्य बढ़ाने पर बाध्य होना पड़ेगा तब समाचारों व सम्पादकियों का संक्षेप में प्रस्तुत करने का आकर्षण गम्भीर रूप से बढ़ जाएगा।
संक्षेप में कहें तो विज्ञापन बिक्री का एक साधन है। विज्ञापन के माध्यम से बहुसंख्यक लोगों तक वस्तु या सेवा का नाम एवं उपयोगिता को पहुंचाने का काम किया जाता है। विज्ञापन वास्तव में सेल्समैन का स्थान तो नहीं लेता, हां उसकी इस काम में मदद करता है। विज्ञापन से ग्राहक को वस्तु की उपयोगिता तथा लाभ के विषय में पहले ही जानकारी हो जाती है।
अंततः कहे तो विज्ञापन ने वर्तमान युग के आर्थिक जगत को काफी प्रभावित किया है। विज्ञापन से जहां विज्ञापन एजेंसियों में कार्य कर रहे युवाओं को रोजगार मिल रहा है वहीं विज्ञापन पर खर्च करने के बहाने से उत्पादक संस्था पर वास्तविक उपभोक्ता वस्तुओं के खर्चे से कई गुना अधिक पैसा ग्राहकों से वसूल रहे
सामाजिक पक्ष :
विज्ञापन को सामाजिक पक्ष से देखें तो लगेगा कि विज्ञापन व्यक्ति के स्वतंत्र निर्णय को प्रभावित करता है। कभी-कभी यह अरूचिकर होता है और जीवन मूल्यों तथा जीवन शैली पर अवांछनीय प्रभाव डालता है। यदि हम इन्हीं तर्कों के आधार पर विज्ञापन की उपयोगिता को परखें तो विज्ञापन का पक्ष लेना ही कठिन हो जाएगा हालांकि कुछ विज्ञापन मनोरंजक, कलात्मक तथा सार्वभौम कल्याण भावना से युक्त होते हैं।
सामाजिक दृष्टि से विज्ञापन के विरुद्ध अधिकांशतः ये आरोप लगाये जाते हैं:
1. विज्ञापन से प्रभावित होकर ग्राहक गलत चीज खरीद सकते हैं और उन पर अधिक खर्च करते हैं।
2. विज्ञापन से लोगों में ऐसी वस्तुएं खरीदने की इच्छा जागृत होती है, जो उनकी क्रय शक्ति के बाहर होती है और,
3. एक ही जैसी विभिन्न वस्तुओं के विज्ञापनों किये गये विरोधी दावों को ध्यान में रखकर ग्राहक यह तय ही नहीं कर पाता कि वह किसकी बात सही माने और किस वस्तु को खरीदे।
'गलत' चीज खरीदने के आरोप का एक अर्थ यह भी लगाया जाता है कि विज्ञापन के जरिए ग्राहक के मन में भ्रांति पैदा करके उसके किसी चीज को खरीदने के निर्णय को प्रभावित किया जाता है। स्वतन्त्र समाज में यह भ्रांति पैदा होने की गुंजाइश हालांकि कम होती हैं क्योंकि आर्थिक प्रजातंत्र में व्यक्ति को यह छूट है कि वह सुलभ वस्तुओं में से अपनी पसंद की चीज चुन ले। यहां विज्ञापन प्रायः वस्तुओं के गुणों का बखान करते हैं, जिनमें प्रायः बढ़ा-चढ़ाकर वस्तु की प्रशंसा की जाती है। विज्ञापन में वस्तुओं के जिन गुणों की प्रशंसा रहती है, वे वास्तव में हानिकारक भी हो सकती हैं। हालांकि विज्ञापनों के लिए भी खाद्य पदार्थों अथवा औषधियों के नियंत्रण विषयक कानून हैं। लेकिन इन कानूनों का पालन भी
ऐसे चालाकी-भरे तरीके से होता है कि वह कानून पालन एक मजाक बन जाता है। जैसे सिगरेट, बीड़ी, तम्बाकू, खैनी आदि मादक पदार्थों के हर विज्ञापन के नीचे एक चेतावनी अवश्य छापने का सरकारी निर्देश था। इन नशीले पदार्थों के उत्पादक इस चेतावनी को प्रकाशित तो करते थे लेकिन उसका आकार इतना छोटा होता था कि उसे पढ़ पाना या देख पाना तक सम्भव नहीं होता था। इस तरह वे कानून का पालन न करने के आरोप से भी बच जाते थे और उपभोक्ता को विज्ञापित पदार्थ के खतरों की जानकारी भी नहीं हो पाती थी। हालांकि अब अदालती हस्तक्षेप के बाद वर्तमान में इस पर कड़ा रुख अपनाते हुये सरकार ने ऐसे पदार्थों के उत्पादकों को कडे निर्देश दिये हैं कि उत्पादों के बाहरी आवरण पर मोटे अक्षरों में लिखने के साथ-साथ उससे होनी वाली बीमारी से सम्बन्धित चित्र भी दिया जाय।
दिसम्बर, 2010 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने सिगरेट व तम्बाकू उत्पादों पर नई चित्र चेतावनी के बजाय पुरानी चित्र चेतावनी ही जारी रखने का फैसला किया। कानून के प्रावधानों के मुताबिक इस चित्र चेतावनी को हर वर्ष बदला जाना था मगर अब सरकार ने फैसला किया है कि चित्र चेतावनी की बदलने की अवधि अब दो वर्ष होगी।
औषधियों के विषय में तो यह चेतावनी भी नहीं होती। दर्दनाशक औषधियों का विज्ञापन इतनी धूमधाम से होता है कि उन औषधियों का व्यक्ति अंधाधुध प्रयोग करता है, जिसका समग्र स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ता है। औषधि के निरन्तर सेवन के बाद ही जब तक उपभोक्ता को क्षति का चता चलता है मगर तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। वस्त्रों के विज्ञापन का प्रभाव भी इसी प्रकार का होता है कि व्यक्ति आवश्यकता न होते हुये भी नवीनता की झौंक में वस्त्र खरीदता है और इस प्रकार वह आवश्यकता से अधिक खर्च कर जाता है। ऐसा ही अन्य अनेक उपभोक्ता वस्तुओं के मामले भी होता है।
विज्ञापन का एक कार्य नयी नयी वस्तुओं की जानकारी ग्राहकों तक पहुंचाना होता है। ग्राहक के मन में नयी वस्तु के प्रति 'सुप्त इच्छा को विज्ञापन जाग्रत ही नहीं कर देता वरन् सत्त विज्ञापन से यह उस इच्छा को अत्यधिक तीव्र बना देता है। विलासिता वाली वस्तुओं तथा समय बचाने वाले अत्याधुनिक साधनों की इच्छा होती है लेकिन 'जेब' अगर साथ नहीं देती तो दो रास्ते अपनाए जाते हैं।
(1) अधिक मेहनत करके अधिक कमाना या
(2) बेइमानी के साधन अपनाना।
इनमें से पहला रास्ता तो समाज कल्याण की दृष्टि से ठीक है लेकिन दूसरा साधन या रास्ता सामाजिक जीवन में कदाचार, भ्रष्टाचार आदि को जन्म देने वाला बनता है। हालांकि इसका पूरा दोष विज्ञापन को ही नहीं दिया जा सकता। विज्ञापन तो सभी के लिए है। जो स्वयं को साधन-सम्पन्न समझे, वही अपेक्षित वस्तुएं खरीदे विज्ञापनकर्ता ग्राहक की क्रयशक्ति को देखकर विज्ञापन नहीं देते हालांकि वे माध्यम का चयन अवश्य ही अपनी वस्तु के संभावित ग्राहकों को ध्यान में रखकर करते हैं। जैसे इंजीनियर वस्तु के विज्ञापन इंजीनियरी की पत्रिकाओं में या बच्चों के खिलौने आदि के विज्ञापन बच्चों की पत्रिकाओं में, लेकिन आम उपभोक्ता के काम की चीजों के विज्ञापन तो सामान्य पत्रिकाओं में ही छपते हैं या रेडियो, टेलीविजन पर प्रसारित होते हैं। यहां व्यक्ति को स्वयं अपने साधनों और अपनी इच्छाओं के बीच उपयुक्त तालमेल करना ही सर्वोत्तम उपाय है।
विज्ञापन पर सही अध्ययन करने के पश्चात ही ग्राहक को कोई वस्तु लेनी चाहिए। यदि ग्राहक समझदारी से सभी प्रकार के विज्ञापनों का अध्ययन करे तो उसे एक प्रकार की वस्तुओं के विभिन्न पक्षों का ज्ञान हो सकता है। जब विज्ञापनदाता अपनी-अपनी वस्तु के गुणों की चर्चा करते हैं तो वस्तु का समग्र विवरण ग्राहक के सामने होता है। यहां भी ग्राहक को अपनी समझ का प्रयोग करना होगा। यदि ग्राहक चौकस नजर नहीं रखेगा तो किसी भी विज्ञापन के भ्रम में आना, उसकी अपनी ही कमजोरी होगी।
सामाजिक दृष्टि से देखें तो एक ही तरह की चीजें बनाने वाले लोग अपनी वस्तु को बेहतर बनाने की प्रक्रिया के लिए अनुसंधान एवं परीक्षण कराते रहते हैं जिससे समाज को नयी और अच्छी वस्तुएं प्राप्त हो पाती हैं। इससे कुल मिलाकर समाज को लाभ होता है। वैसे भी ग्राहक को यह अधिकार तो है ही कि उसे सही दाम पर उत्कृष्ट किस्म की सही वस्तु प्राप्त हो ।
अतः कुल मिलाकर कहें तो विज्ञापनों का समाज पर प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से नकारात्मक व सकारात्मक प्रभाव पड़ता है, नकारात्मक प्रभाव को रोकने के लिए यह आवश्यक है कि ग्राहक सचेत रहे। ग्राहक को चाहिए कि वह समझ से पूरा अध्ययन करने के पश्चात् ही किसी वस्तु के विज्ञापन पर निर्णय ले सिर्फ विज्ञापन में कही गई बातों पर पर ही आंख बंद कर निर्णय न कर ले।
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