जनमत की प्रभावोत्पादकता - Effectiveness of Public Opinion
जनमत की प्रभावोत्पादकता - Effectiveness of Public Opinion
लोकतंत्रात्मक शासन प्रणाली में पक्ष-विपक्ष के समर्थकों या इसके विरोधियों की तुलनात्मक गिनती को ही निर्णायक माना जाता है। इसलिए यह विश्वास बन गया है कि जिस पक्ष को बहुमत का समर्थन प्राप्त हो जाए, वह अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल हो जाता है, किन्तु इतिहास साक्षी है कि समाज में जितने भी बड़े-बड़े निर्णय हुए या क्रांतियां हुई, उनके प्रवर्तक प्रायः बहुत थोड़े लोग थे। इसका कारण स्पष्ट है। मात्र विचार रखना एक बात है उसके लिए कुछ कर गुजरना कुछ और फिर यह भी महत्वपूर्ण होता है कि इस मामले में हमारा विश्वास कितना दृढ़ है, हम अपने पक्ष को कहाँ तक समझते हैं और हम उसके लिए कितने समर्थकों को सक्रिय कर पाते हैं।
जनमत के विश्लेषण में यह अवश्य देखा जाता है कि अपनी बात को मनवाने के लिए व्यक्ति या समुदाय की भावना कितनी प्रबल, गहरी, सशक्त अथवा सक्षम है। यदि इसके लिये कोई आन्दोलन या संघर्ष करना पड़े तो उसके लिये वह कहा तक तैयार है। यही कारण है कि संगठन और चेतना के अभाव में अनेक बार समाज सुधार के लिये उठाए गये महत्वपूर्ण कदम भी धरे के धरे रह जाते हैं।
भारत में अस्पृश्यता निवारण कानून लागू है। किसी के साथ छुआछूत का बर्ताव करना अपराध घोषित किया जा चुका है। फिर भी हम विश्वासपूर्वक नहीं कह सकते कि अस्पृश्यता के अभिशाप से हमारा समाज सर्वथा उन्मुक्त हो चुका है जब हम देखते हैं कि प्रायः सब भारतवासी छुआछूत को खत्म करना चाहते हैं तो यह विडम्बना भी दिखाई देती है कि लोकमत इतना अनुकूल होते हुए भी हम इस कुरीति को पूरी तरह समाप्त नहीं कर पाए हैं। यह स्थिति इसलिए है कि हमारे देशवासियों ने अस्पृश्यता निवारण के सिद्धांत को स्वीकार करते हुए भी इस सिद्धांत के अनुसार क्रियात्मक रूप से कुछ करने का पूरा पूरा साहस नहीं दिखाया है।
जनमत में प्रभावोत्पादकता लाने के लिए यह आवश्यक है कि किसी मांग को पेश करने वाले पर्याप्त संख्या में होने चाहिए और उनका विश्वास अडिग और अचल हो। इसके साथ-साथ वह अपनी मांग को पूरी कराने के लिए अपेक्षित आन्दोलन करने के लिए भी तैयार हो इस आन्दोलन को चलाने के लिए किसी संगठन, दल या पार्टी का होना भी आवश्यक है। कोई भी दल, नेता या नेताओं के बिना खड़ा नहीं हो सकता क्योंकि प्रभाव रखने वाले सुयोग्य व्यक्ति ही किसी कार्यक्रम को सफल बना सकते हैं। नेताओं और उनके अनुगामियों के बीच परस्पर विश्वास और तालमेल भी पूरा-पूरा होना चाहिए, क्योंकि इससे दोनों पक्षों को बल मिलता रहता है। नेता की शक्ति अपने अनुगामियों द्वारा निरन्तर समर्थन प्राप्त करते रहने से बढ़ती है, और जनता भी नेताओं को अपने बीच काम करते देख उत्तरोत्तर उत्साहित होती है।
अधिकारपूर्वक तो यह नहीं कहा जा सकता कि जनमत द्वारा स्वीकृत कोई कार्यक्रम सफल होगा कि नहीं, अथवा उसे सफल होने में कितना समय लगेगा क्योंकि जनमत विज्ञान अन्य विज्ञानों जैसे गणित, भौतिकी आदि के समान यथातथ्य विज्ञान नहीं है। यह तो राजनीति या अर्थशास्त्र की तरह आदर्शक विज्ञान है।
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