इलैक्ट्रॉनिक माध्यम : रेडियो - Electronic Medium : Radio
इलैक्ट्रॉनिक माध्यम : रेडियो - Electronic Medium : Radio
आधुनिक संचारक्रान्ति ने समाचार जगत में उथल-पुथल कर दी है। इस क्रान्ति ने पहले चरण में रेडियो तथा दूसरे चरण में टेलीविजन के आविष्कार ने जनसंचार के पारम्परिक मुद्रणमाध्यमों को पीछे छोड़ते हुए समाचार प्रेषण की नई पद्धति को विकसित किया। यही नहीं पूरे विश्व के राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जगत में इस नई तकनीक ने चमत्कार कर दिया है। रेडियो, इलैक्ट्रानिक मीडिया का महत्वपूर्ण श्रव्य माध्यम है।
जनसंचार के विभिन्न माध्यमों में रेडियो की विशेष भूमिका रही है। सम्प्रेषण के एक सशक्त लोकप्रिय और प्रभावी माध्यम के रूप में रेडियो अत्यधिक उपयोगी सिद्ध हुआ है। इसका प्रसारण समाज के उस वर्ग तक भी होता है, जो शिक्षित नहीं हैं। इसे जनसंचार का दृश्यरहित, नेत्ररहित अन्धा माध्यम के नाम से भी जाना जाता है। रेडियो विद्युत ऊर्जा द्वारा ध्वनितरंगों को हजारों मील दूर चन्द सैकेन्ड में संदेश प्रेषित कर देता है। ट्रांजिस्टर के आविष्कार ने तो विद्युत ऊर्जा की अनिवार्यता को भी समाप्त कर दिया है। शैक्षिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक प्रत्येक पक्ष से जुड़े प्रत्येक वर्ग तक इस जनमाध्यम की पहुँच है। प्रिंट मीडिया की सीमा यह है कि वह समाचारपत्र प्रकाशित होने और जनता तक पहुँचने में समय अधिक लगता है। दैनिक समाचार का प्रकाशन चौबीस घण्टों के अन्तराल में ही हो सकता है। जबकि रेडियो द्वारा प्रसारित सामाचार में बिल्कुल समय नहीं लगता। जवरीमल्ल पारेख का कहना है- 'रेडियो निरक्षरों के लिए भी एक वरदान है। जिसके द्वारा वे सिर्फ सुनकर अधिक से अधिक सूचना, ज्ञान और मनोरंजन हासिल कर लेते हैं। रेडियो और ट्रांजिस्टर की कीमत भी बहुत अधिक नहीं होती। इस कारण वह सामान्य जनता के लिए भी कमोबेश सुलभ है। यही कारण है कि टी.वी. के व्यापक प्रसार के बावजूद तीसरी दुनिया के देशों में रेडियो का अपना महत्व आज भी कायम है। और अब तो एफ एम रेडियो ने रेडियो को नया जीवन ही दे दिया है। हम रेडियो की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि आज प्रायः मोबाइल तक में एफ.एम. रेडियो का प्रसारण होने लगा है।
इटली के सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक गुग्लियो मारकोनी द्वारा 2 जून, 1896 को वायरलेस टेलीग्राफी का पेटेन्ट हासिल करने के साथ रेडियो की कहानी आरम्भ होती है। तब से लेकर आज तक सम्प्रेषण के इस माध्यम ने ध्वनि तरंगों द्वारा अनन्त आकाश में यात्रा करते हुए जनसंचार को विस्तार दिया है। भारत में आकाशवाणी से व्यवस्थित प्रसारण का आरम्भ 1920 के बाद हुआ। सन् 1922 में ब्रिटेन में ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कम्पनी की स्थापना के बाद नवम्बर 1923 में कलकत्ता, जून 1924 में बम्बई और 31 जुलाई 1924 में मद्रास में रेडियो क्लब द्वारा भारत में आकाशवाणी की शुरुआत हुई। भारत में इन्डियन ब्रॉडकास्टिंग कम्पनी' द्वारा 23 जुलाई 1927 से व्यवस्थित प्रसारण आरम्भ हुआ। तदुपरान्त जून 1935 में इस कम्पनी को 'ऑल इन्डिया रेडियो' नाम दिया गया। आकाशवाणी नाम से प्रचलित तथा सूचना और प्रसार मन्त्रालय द्वारा संचालित ऑल इन्डिया रेडियो का मुद्रालेख 'सर्वजनहिताय, बहुजन सुखाय' है जो जनसंचार विशेषज्ञ डॉ. विल्वर के इस कथन को चरितार्थ करता है प्रभावी जनसंचार माध्यम देश के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। अतएव मुक्त और समुचित सूचना उपलब्ध कराना मात्र ही जनसंचार माध्यमों का अन्तिम ध्येय नहीं है, बल्कि इच्छित सामाजिक परिवर्तन अन्तिम लक्ष्य है।
निस्सन्देह रेडियो की पहुँच आज महानगरों से लेकर सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों तक हो गई है। संगीत और संगीत प्रेमियों के लिए रेडियो आज एक वरदान साबित हुआ है। आम आदमी की कलाओं, कवियों, लेखकों, चिन्तकों की रचनाओं और राष्ट्रीय चेतना से जुड़े कार्यक्रमों, खेलकूद विषयक कार्यक्रमों तथा मनोरंजक कार्यक्रमों के प्रसारण ने रेडियो की पैठ गली मोहल्ले, चौराहे तक की है। एफ. एम. प्रसारण ने तो आज भी रेडियो को अत्यधिक लोकप्रिय बना रखा है।

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