यूरोपीय इतिहास लेखन एवं आधुनिक इतिहास लेखन में संबन्ध - European historiography and modern historiography
यूरोपीय इतिहास लेखन एवं आधुनिक इतिहास लेखन में संबन्ध - European historiography and modern historiography
उन्नीसवीं शताब्दी के यूरोप में आधुनिक इतिहास लेखन का आरम्भ हुआ. इस
समय लियोपोल्ड वॉन रैंक ने प्राथमिक स्रोतों के आधार पर इतिहास लिखने पर बल दिया.
उनका विश्वास था कि समकालीन तथ्यों की रोशनी में ऐतिहासिक सत्य को पुनः प्राप्त
किया जा सकता है. लार्ड एक्टन तथा उनके अनुनायियों नें मूल स्रोतों के आधार पर
इतिहास को पुनर्गठित करने की जोरदार वकालत की. फलस्वरूप यूरोप सहित पूरी दुनिया
में राष्ट्रीय अभिलेखागारों की स्थापना की जाने लगी. ताकि, मूल
स्रोतों को एकत्रितकर उनका अध्ययन किया जा सके. भारत सहित उपनिवेशों में भी
अभिलेखागारों, संग्राहालयों, पुस्तकालयों
और पुरातत्व विभागों की स्थापना का यही प्राथमिक उद्देश्य था.
प्राच्यवादियों द्वारा भारतीय अतीत की खोज
प्रख्यात प्राच्यविदों विल्किन्स तथा विलियम जोंस ने प्राचीन
साहित्यिक एवं विधि की संस्कृत कृतियों के अनुवाद किये ताकि प्राचीन भारत के बारे
में जाना जा सके. चार्ल्स विल्किन्स ने भगवतगीता तथा हितोपदेश का अनुवाद किया.
विलियम जोंस की साहित्यिक अभिरुचि उनके बहुप्रसिद्ध अनुवाद शकुंतला से अभिव्यक्त
हुयी. जोंस ने मनुस्मृति का अंग्रेज़ी अनुवाद किया जोंस ने भारत आने से पूर्व ही
फ़ारसी व्याकरण की एक पुस्तक भी लिखी थी. प्राच्यवादियों की खोजों ने भारतीय
इतिहास के कुछ महत्वपूर्ण तथ्य प्रकाश में ला दिये. जोंस ने ग्रीक विवरणों में
उल्लिखित सैंड्रोकोटस का समीकरण संस्कृत स्रोतों में वर्णित चंद्रगुप्त से किया.
चूकिं ग्रीक स्रोतों में सेल्यूकस के साथ चंद्रगुप्त के युद्ध एवं संधि की तिथियाँ
दी गयीं थी, अत: पहली बार प्राचीन भारतीय इतिहास में मौर्यकाल के
आरम्भ का कालनिर्धारण संभव हो सका. एक अन्य प्राच्यविद जेम्स प्रिंसेप ने प्राचीन
ब्राह्मी लिपि को सफलतापूर्वक पढ़ लिया. इससे न केवल मौर्यकालीन महान शासक अशोक,
बल्कि पालि ग्रंथों में लिखित बौद्ध धर्म का इतिहास भी सामने आ गया.
इन प्रारम्भिक उपलब्धियों के बावजूद प्राच्यविद भारत का क्रमबद्ध ऐतिहासिक विवरण
नहीं दे सके और यह कार्य उनके वैचारिक विरोधियों उपयोगितावादियों के ज़िम्मे आया.
उपयोगितावादी इतिहास लेखन
बेंथम का विचार था कि यूरोप ने तर्क एवं बुद्धि के आधार पर प्रगति की
है, बेंथम के
अनुयायी एवं मित्र उपयोगितावादी जेम्स मिल का मानना था कि भारतीय संस्कृति पतित है
तथा भारत के उद्धार की एकमात्र आशा तर्क बुद्धिवाद के आधार पर निर्मित कठोर
कानूनों से ही संभव है, उपयोगितावादी इतिहासकार के रूप मे
जेम्स मिल ने बारह वर्षों (1806 से 1818 के मध्य) के कठोर परिश्रम द्वारा छः खण्डों में हिस्ट्री ऑफ ब्रिटिश
इंडिया नामक पुस्तक लिखी. भारत का संपूर्ण इतिहास लिखने का यह पहला प्रयास था.
हलांकि, प्राचीन एवं मध्यकाल को प्रथम तीन खण्डों में समेटा
गया था, तथा शेष तीन खण्डों में ब्रिटिश भारत की चर्चा थी. 1818
से 1840 के मध्य चार बार इसे पुनर्मुद्रित
किया गया. 1850 के पश्चात भी इसे एक महान कृति माना जाता
रहा. आधुनिक जा भारतीय इतिहास लेखन पर इस पुस्तक के दूरगामी प्रभाव को नज़रअन्दाज़
नहीं किया जा सकता, मिल का इतिहास तथ्यसम्मत एवं तर्कसम्मत
भी नहीं था. मिल ने बिना भारत की यात्रा किये और केवल विदेशी विवरणों के आधार पर
ही अपना कार्य किया था. इस इतिहास में मूल स्रोतों की उपेक्षा की गयी थी. वास्तव
में मिल का इतिहास साम्राज्यवाद के नये युग की उद्घोषणा थी.
उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य साम्राज्यावादी इतिहास लेखन
उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य तक मिल के इतिहास की आलोचना होने लगी थी.
यूरोपीय इतिहासकारों ने अब भारतीय इतिहास को भारतीय स्रोतों के आधार पर लिखने का
बीड़ा उठाया, मॉउंटस्टुअर्ट एल्फिंसटन ने मूल ऐतिहासिक स्रोतों के
अनुवादों के आधार पर अपने ग्रंथ हिस्ट्री ऑफ हिन्दू एंड मुहम्मडन इंडिया की रचना 1841
में की. इस श्रेणी में ग्रांट डफ नें मूल मराठा स्रोतों के आधार पर 1825
मे ए हिस्ट्री ऑफ दी मराठाज़ प्रकशित की, जेम्स
टॉड ने राजपूत स्रोतों एवं लोकश्रुतियों के आधार पर एनल्स एंड एंटीक्वीटीज़ ऑफ
राजस्थान की रचना की. फारसी मूल स्रोतों के आधार पर मध्यकालीन भारत के इतिहास को
पुनर्लिखित करने के प्रयास स्वरूप आठ खंडों में रचित दी हिस्ट्री ऑफ इंडिया ऐज
टोल्ड बाई इट्स ओन हिस्टोरियन्स सामने आई. इसे डाउसन की सहायता से ईलियट द्वारा
लिखा गया था तथा यह 1857 की क्रांति के पश्चात लिखी गयी,
हलांकि यह श्रृंखला वस्तुत: फ़ारसी मूल स्रोतों का अनुवाद थी,
परंतु इसके प्राक्कथन में ईलियट ने तुर्क एवं मुग़ल शासकों के
विरुद्ध खूब विषवमन किया. ब्रिटिश भारतीय शासकों एवं परिवर्ती भारतीय इतिहासकारों
को इस ग्रंथ ने काफी प्रभावित किया. इस ग्रंथ श्रृंखला ने पहली बार वे तर्क दिये
जो आज तक साम्प्रदायिक शक्तियों द्वारा प्रयोग किये जाते हैं.
आरम्भिक बीसवीं शताब्दी का साम्राज्यवादी इतिहास लेखन
भारत का संपूर्ण इतिहास पाठ्यपुस्तक के रूप में लिखने की श्रृंखला का
अगला अध्याय विसेंट ए. स्मिथ की कृतियों के माध्यम से सामने आया. उसकी अली
हिस्ट्री ऑफ इंडिया (1904) एवं ऑक्सफोर्ड हिस्ट्री ऑफ इंडिया (1919)
सबसे महत्वपूर्ण कृतियाँ थीं. स्मिथ ने अपने इतिहास ग्रंथों में उस
काल तक हो चुके सभी शोधों को समाहित किया. स्मिय के ग्रंथों का महत्व इस बात से
पता चलता है कि उसकी इतिहास कृतियों को सभी भारतीय विश्वविद्यालयों में, जिनकी स्थापना पिछले पचास वर्षों में हुई थी, पाठ्यपुस्तकों
की भाँति पढाया जाता था. मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चंद्रगुप्त तथा गुप्त
साम्राज्य की तो स्मिथ ने कुछ प्रशंसा की, परंतु इन शासकों
को निरंकुश' एवं 'सर्वसत्तावादी'
माना. स्मिथ ने प्राच्य निरंकुशता" को ही साम्राज्यों के पतन
का मूल कारण माना. स्मिथ ने इस तथ्य की ओर ध्यान खींचा कि प्रत्येक साम्राज्य के
पतन के पश्चात भारत सदैव अराजकता के एक लम्बे युग में प्रवेश कर गया, अतः भारत में शांति एवं समृद्धि के लिये ब्रिटिश शासन जैसी उदार निरंकुश'
व्यवस्था का बना रहना आवश्यक था. अल्फ्रेड लावल ने अपनी रचना दी
राईज़ एंड एक्सपेंशन ऑफ ब्रिटिश डोमिनियन इन इंडिया में भारत में ब्रिटिश शासन के
आरम्भ का कारण भारतीयों में राष्ट्रीयता के अभाव को माना. दूसरी ओर, उन्होंने प्राचीन एवं मध्यकालीन भारतीय इतिहास में हुए विद्रोहों की तीखी
निन्दा की भारत में ब्रिटिश शासन की उपस्थिति को उचित ठहराने के लिये जॉन सील ने
एक्सपेंशन ऑफ इंग्लैंड मे यह साबित करने का प्रयास किया कि भारत पर अंग्रेजों की
विजय पूर्वनियोजित न होकर आकस्मिक थी, राष्ट्रवादियों द्वारा
प्रस्तुत आर्थिक दोहन के सिद्धांत को अनुचित साबित करने के लिये वेरा एन्सटे नामक
महिला इतिहासकार ने दी इकानामिक डेवलपमेंट इन इंडिया (1929) लिखी
जिसमें ब्रिटिशकाल में भारतीय धन सम्पदा के दोहन के राष्ट्रवादी तक़ों को काटा गया
था. कालांतर में इस विषय पर भारतीय मार्क्सवादी इतिहासकारों और साम्राज्यवादी
इतिहासकारों के मध्य लम्बी बहस चली..
यूरोपीय इतिहास लेखन में कैम्ब्रिज स्कूल
1960 के दशक में जॉन गैलावर एवं उनके छात्र अनिल सील
के अध्ययनों में कैम्ब्रिज स्कूल की आधारशिला रखी गैलाघर के पर्यवेक्षण में अनिल
सील द्वारा किया गया शोध अध्ययन इमरजेंस ऑफ इंडियन नेशनलिज्म (1968) के नाम से प्रकाशित हुआ. सील ने भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन को अभिजात
वर्गों की आपसी प्रतिस्पर्धा एवं संघर्ष के रूप में दिखाने की चेष्टा की. अनिल सील
द्वारा किया गया किया गया राष्ट्रीय आन्दोलन का यह विश्लेषण कैम्ब्रिज स्कूल के
इतिहासकारों के लिये दिशानिर्देशक सा बन गया. कैम्ब्रिज स्कूल इतिहास लेखन की
परम्परा का विधिवत शुभारम्भ जॉन गैलायर, अनिल सील एवं गार्डन
जॉनसन द्वारा 1973 में संयुक्त रूप से संपादित लोकॅलिटी,
प्रॉविंस एंड नेशन: एसेज आन इंडियन पॉलिटिक्स 1870-1940 से हुआ. इस ग्रंथ ने भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के संबन्ध में कुछेक एकदम
नयी अवधारणाओं को जन्म दिया. एक, इसमें राष्ट्रीय आन्दोलन को
स्थानीय एवं गुटीय राजनीति के छ बाह्य आवरण की भाँति देखा गया था, वास्तविक राजनीतिक संघर्ष स्थानीय स्तर पर नये संविधानिक सुधारों से
उत्पन्न अवसरों को लेकर हो रहे थे. दूसरे, राष्ट्रीय तथा
स्थानीय नेताओं के आपसी संबन्धों की व्याख्या सोपानवत आश्रयदाता आश्रित
(पैट्रॅन-क्लॉइंट) संबंधों के रूप में की गयी थी. अनिल सील की शोधछात्र ज्यूडिथ
ब्रॉउन ने गाँधीजी पर किये गये अपने अध्ययन (गाँधीज राइज़ टू पॉवर, 1972) में उनके राजनीतिक उत्कर्ष को ब्रिटिश राज से मोल-तोल कर सकने की उनकी
क्षमता से जोड़कर देखा इस अवधारणा के तहत नेहरू, पटेल,
मालवीय तथा आज़ाद को स्थानीय या अपने धर्मों के बिचोलियों की भाँति
प्रस्तुत किया गया. यह विश्लेषण आश्रयदाता-आश्रित की अवधारणा की ही पुष्टि करता था,
यूरोपीय इतिहास लेखन के सामान्य लक्षण
यूरोपीय इतिहास लेखन के सामान्य लक्षणों में कुछेक अपवादों को छोड़कर
संपूर्ण यूरोपीय इतिहास लेखन में साम्राज्यवादी विचारधारा की मौजूदगी को आसानी से
पहचाना जा सकता है भले ही प्राच्यवादियों ने प्राचीन भारतीय संस्कृति के प्रति
रुचि, सहानुभूति
एवं प्रशंसा का प्रदर्शन किया था, परंतु समकालीन भारत को
पतित बताया. इसप्रकार कम्पनी राज को उचित ठहराने की कोशिश की गई, उपयोगितावादियों ने तो संपूर्ण भारतीय इतिहास को ही ख़ारिज कर दिया,
जहाँ मिल ने तथाकथित हिन्दू राज को निन्दनीय एवं निकृष्ट बताया,
वहीं ईलियट ने तथाकथित मुस्लिम शासनकाल को अपनी आलोचना का मुख्य
पात्र बनाया. उपयोगितावादियों के निष्कर्ष उनके विचार से उदार निरंकुशता पर आधारित
साम्राज्यवाद को उचित ठहराने के प्रयास मात्र ही थे. उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम
दशकों या आरम्भिक बीसवीं शताब्दी के यूरोपीय इतिहासकारों ने उभरते राष्ट्रीय
आन्दोलन की या तो अनदेखी की या तीखी आलोचना की. उनके अनुसार राष्ट्रीय आन्दोलन
अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त अभिजात वर्ग का संघर्ष था जो सत्ता में भागीदारी के अधिक
अवसर के लिये चलाया जा रहा था. इसप्रकार इसका साम्राज्यवाद से कोई वैचारिक अथवा
आर्थिक अंतर्विरोध नहीं था. कैम्ब्रिज स्कूल के इतिहास लेखन में इस मत को और भी
तर्कसंगत एवं तथ्यपरक ढंग से पुष्ट करने का प्रयास किया. इसप्रकार यूरोपीय इतिहास
लेखन अंतत: भारत में ब्रिटिश राज के वर्चस्व को बनाए रखने के वैचारिक प्रयास ही
थे.
यूरोपीय इतिहास लेखन के प्रभाव
यूरोपीय इतिहास लेखन के भारतीय इतिहास लेखन पर पड़े दुष्परिणामों को
कम करके नहीं आंका जा सकता. यूरोपीय इतिहासकारों की अनेक स्थापनाओं ने भारतीयों के
मस्तिष्क पर दूरगामी परिणाम छोड़ा. प्राच्यवादियों की स्थापनाओं ने भारतीयों को
अपने विलुप्त अतीत के प्रति केवल जागरुक ही नहीं किया अपितु उनमें प्राचीन भारत की
उपलब्धियों के लिये गौरव की एक भावना भी भर दी. जहाँ उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भ
में इसने बंगाली पुनर्जागरण को प्रभावित किया, वहीं इसी शताब्दी के अंत में
उभरते हिन्दू राष्ट्रवाद के दंभ को पोषित किया.. हिन्दू साम्प्रदायिक इतिहासकारों
ने इन इतिहासों के आधार पर भारत की गुलामी को पीछे ले जाकर दिल्ली सल्तनत की
स्थापना से जोड़कर देखा. भारत की आज़ादी की लड़ाई को हज़ार वर्षों की दासता से
मुक्ति का संघर्ष बताया जाने लगा. दूसरी ओर मुस्लिम साम्प्रदायिक इतिहासकारों ने
प्राचीन भारत की तमाम उपलब्धियों को तुच्छता की दृष्टि से देखा, भारत में मुस्लिम शासन की स्थापना को ही सभ्यता एवं संस्कृति के आरम्भ का
हेतू बताया गया. यहाँ हम जार्ज ऑरवेल के लेखों तथा एडवर्ड थाम्पसन एवं जी. टी.
गैरेट के इतिहास (राईज़ एंड फुलफ़िलमेंट ऑफ ब्रिटिश रूल इन इंडिया, 1934) को साम्राज्यवादी लेखन के अपवाद के रूप में देख सकते हैं. फिर भी, यूरोपीय इतिहास लेखन का अधिकांश भाग साम्राज्यवादी ही था.
सारांश
भारत पर यूरोपीय इतिहास लेखन का आरम्भ अट्ठारहवीं सदी के अंत में
प्राच्यवादी (Orientalist) विद्वानों के लेखों द्वारा हुआ, उपयोगितावादी (Utilitarian) विचारधारा उन्नीसवीं
शताब्दी के ब्रिटेन में उपस्थित उदारवादी (Liberalism) विचारधारा
का ही विस्तार थी. आर्थिक जगत में यह विचारधारा एडम स्मिथ के मुक्त बाज़ार के
सिद्धांत में अभिव्यक्त हुयी. परंतु इसका दार्शनिक आधार प्रसिद्ध विद्वान जेरेमी
बेंथम ने दिया बेंधम के अनुयायी एवं मित्र उपयोगितावादी जेम्स मिल का मानना था कि
भारतीय संस्कृति पतित है तथा भारत के उद्धार की एकमात्र आशा तर्क बुद्धिवाद के
आधार पर निर्मित कठोर कानूनों से ही संभव है, जहाँ
प्राच्यवादियों ने प्राचीन भारतीय संस्कृति की प्रशंसा की थी, वहीं उपयोगितावादियों ने उसकी तीखी आलोचना की. उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य
तक मिल के इतिहास की आलोचना होने लगी थी. यूरोपीय इतिहासकारों ने अब भारतीय इतिहास
को भारतीय स्रोतों के आधार पर लिखने का बीड़ा उठाया, परंतु
उनमें साम्राज्यवादी विचारधारा को स्पष्ट पहचाना जा सकता है. भारत का संपूर्ण
इतिहास पाठ्यपुस्तक के रूप में लिखने की श्रृंखला का अगला अध्याय विसेंट ए. स्मिथ
की कृतियों के माध्यम से सामने आया, सबअल्टर्न अध्ययन एकदम
भिन्न प्रकार का इतिहास लेखन था तथा इसका कैम्ब्रिज इतिहास लेखन से कोई प्रत्यक्ष
संबन्ध नहीं था. कालांतर में क्षेत्रीय स्रोतों को प्रकाश में लाने का कार्य
कैम्ब्रिज स्कूल के इतिहासकारों ने भी बड़े पैमाने पर किया. कालांतर में
राष्ट्रवादी एवं मार्क्सवादी इतिहासकारों ने यूरोपीय इतिहास लेखन की अनेक
मान्यताओं को चुनौती दी, फिर भी यूरोपीय इतिहास लेखन के
भारतीय इतिहास-लेखन पर पड़े दुष्परिणामों को कम करके नहीं आंका जा सकता.
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