सामाजिक आन्दोलन रिपोर्टिंग का लक्ष्य और योग्यताएं - Goals and Qualifications of Social Movement Reporting

सामाजिक आन्दोलन रिपोर्टिंग का लक्ष्य और योग्यताएं - Goals and Qualifications of Social Movement Reporting


प्रिंट मीडिया शुरू से ही संवेदनाओं को अभिव्यक्त करने का सबसे सशक्त माध्यम बन गया था। उत्तराखण्ड में ही देखें तो ब्रिटिश काल में विभिन्न सामाजिक आन्दोलनों की सही रिपोर्टिंग के कारण शक्ति, गढ़वाली आदि के सम्पादक जेल गये। अनेक अखबारों के सम्पादकों को सरकारी दमन का सामना करना पड़ा, अनेक अखबार इसी कारण बन्द करवा दिए जाए । वस्तुतः उस दौर में पत्रकारिता का लक्ष्य मानवीय मूल्यों के रक्षार्थ लड़ना था।


आजाद भारत का इतिहास भी अनेक सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक आंदोलनों का गवाह रहा है और उन आन्दोलनों के परिप्रेक्ष्य में मीडिया की अहम भूमिका रही है। आज भी उत्तराखण्ड में अनेक आंदोलन लंबे समय से चल रहे हैं। कोई भी संवेदनशील पत्रकार इन आदोलनों के वास्तविक कारणों की पहचान कर और आन्दोलन से जुड़े हर पक्ष की पड़ताल कर एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट तैयार कर सकता है।


असल चीज है तथ्य, उसकी प्रस्तुति का ढंग और संवाददाता का खबर के अन्दर तक पहुंचना। सामाजिक आन्दालनों की रिर्पोटिंग करने वाले पत्रकार का संवेदनशील होना बेहद जरूरी है मगर उसे इतना भावुक भी नहीं होना चाहिए कि वो रिपोर्ट तैयार करते समय भावनाओं में बह जाए। सामाजिक आंदोलन की रिर्पोटिंग करने वाले पत्रकार में कुछ विशेष योग्यताएं जरूर होनी चाहिए। 


• उसे राजनीतिशास्त्र, समाजशास्त्र एवं इतिहास की मूलभूत संकल्पनाओं का ज्ञान होना चाहिए।


• उसे विविध सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक आन्दोलनों के इतिहास की भी सामान्य जानकारी जरूर होनी चाहिए ।


•  उत्तराखण्ड में सामाजिक आन्दोलन की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकार को उत्तराखण्ड के इतिहास, संस्कृति, भूगोल एवं यहाँ पर हुए विविध आन्दोलनों का ज्ञान अवश्य होना चाहिए।


पत्रकार के लिए पूर्व में हुए आन्दोलनों का ज्ञान इसलिये भी जरूरी है कि पूर्व में हुए आन्दोलनों के परिप्रेक्ष्य में वह वर्तमान में हो रहे आन्दोलनों को समझकर भविष्य में होने वाली घटनाओं का अंदाजा लगा सकता है। 

रिपोर्टर को चाहिए कि वह भूगोल के साथ मनुष्य के रिश्तों को भी समझे क्योंकि भूगोल का मनुष्य की संवेदनशीलता से गहरा रिश्ता है। उदाहरणार्थ किसी बांध परियोजना में हिमालय की किसी भीतरी दुर्गम घाटी से जिन गांव वालों को उजाड़ कर तराई भाबर में बसाया जाएगा, विस्थापन को लेकर उनकी पीड़ा उन विस्थापितों से निश्चित रूप से भिन्न होगी जिन्हें टिहरी से उजाड़कर नई टिहरी शहर में बसाया गया है। यानी भूगोल के कारण ही विस्थापन का दर्द तक बदल सकता है। पत्रकार को इस रिश्ते को गम्भीरता से समझने की कोशिश करनी चाहिए।